शादी समारोह से बच्चे ने चुराया 3 लाख का बैग !    फर्जी अंगूठा लगाकर मनरेगा के खाते से उड़ाये लाखों !    गुरु की तस्वीरों पर प्रकाश अाभा न दिखाने पर एतराज !    हरियाणा में 2006 के बाद के कर्मियों को भी ग्रेच्युटी !    पहले दिया समर्थन, अब झाड़ा पल्ला !    सप्ताह भर में न भरा टैक्स तो टावर होंगे सील !    पेंशन की दरकार, एसडीएम कार्यालय पर प्रदर्शन !    परियोजना वर्करों की देशव्यापी हड़ताल कल !    आईएस का हाथ था कानपुर रेल हादसे में !    आज फिर चल पड़ेगी नेताजी की कार !    

आर्थिक समृद्धि कितनी हकीकत, कितना फसाना

Posted On January - 1 - 2011

चित्रांकन संदीप जोशी

लोकमित्र लेखक विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में वरिष्ठ संपादक हैं

जबसे अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने भारत की संसद में यह कहा कि भारत उभरती हुई नहीं बल्कि उभर चुकी ताकत है तब से हर तरफ यह चर्चा छिड़ गयी है कि भारत वाकई सुपर पावर है या फिर अपने निजी फायदों के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति हमें बरगला रहे हैं। वैसे भारत को ताकतवर मानने या सुपरपावर होने न होने को लेकर यह कोई पहली बार बहस नहीं शुरू हुई बल्कि पिछले एक दशक से दुनिया दो तरह के आर्थिक राजनीतिक विशेषज्ञों में बंटी रही है। एक वह जो भारत को सुपर पावर मानते हैं और दूसरे वह जो उसे ऐसा नहीं मानते। आश्चर्य की बात यह है कि इनमें कोई भी गलत नहीं है और दोनों ही पक्ष अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रख पाने में सक्षम साबित होते हैं, अगर वास्तव में वह ऐसा करते हैं।
कहने का मतलब यह काफी उलझा हुआ और जटिल सवाल है कि भारत को सुपर पावर माना जाये या न माना जाये? इस जटिलता की वजह यह है कि भारत एक साथ तमाम तरह के विरोधाभासों से लैस है मसलन एक तरफ जहां भारत की विशाल आबादी बहुत बड़ा संसाधन है वहीं यह तमाम सामाजिक मापदंडों में अभिशाप भी है। हम आबादी को संसाधन इसलिए मान सकते हैं क्योंकि हमारी बहुत बड़ी आबादी न केवल नियंत्रण में हैं बल्कि हमारे उपलब्ध संसाधन इसके विकास और पेट भरने के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन कुशल प्रबंधन के अभाव में ऐसा व्यवहार में नहीं दिखता। भारत को सुपर पावर मानने का एक बड़ा कारण हमारी राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक एकता भी है। दुनिया में भारत के अलावा कोई ऐसा देश नहीं है जहां 17 अधिकृत भाषाएं हों और 22,000 बोलियां। इसके साथ ही दुनिया का कोई ऐसा प्रमुख धर्म नहीं है जिसके अनुयायी भारत में न रहते हों और मिलजुल कर न रहते हों।
भारत को सुपर पावर मानने के जो प्रमुख दिखाई पडऩे वाले कारक हैं उनमें हमारी दिन पर दिन मजबूत होती और अपना आकार बड़ा करती अर्थव्यवस्था है। आज भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अगले 20 सालों में हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होंगे। दुनिया में भारत बहुत तेजी से न सिर्फ मजबूत मध्य वर्ग के देश के रूप में उभर रहा है बल्कि अभिजात्य उत्पादों के सबसे बड़े बाजार के रूप में भी भारत बड़े देश के रूप में सामने आ रहा है। भारत में इस समय 30 अरब डॉलर से भी बड़ा लग्जरी सामानों का बाजार है और शायद ही दुनिया का कोई बड़ा ब्रांड हो जो भारत में अपने कारोबार को फोकस न करना चाहता हो। ओमेगा, रोलैक्स, टैग ह्यूवर, कार्टियर, टॉमी हिलफिगर, गुक्की, डोल्स और गब्बाना जैसे अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड आज भारत के महानगरों में ही नहीं छोटे-छोटे शहरों में भी मिल जाते हैं। लगभग 70 करोड़ मोबाइल फोनों के साथ हम न सिर्फ दुनिया में तकनीकी रूप से ही दूसरे नम्बर पर हैं बल्कि बहुत ही जल्द चीन से हमारी कनेक्टिविटी ज्यादा बड़ी होगी। भारत छोटी कारों का हब है। दुनिया की 95 फीसदी बड़ी कारें अपने शोरूम भारत में खोल रही हैं और जल्द ही हम बड़ी कारों के भी दुनिया में सबसे बड़े ग्राहक होंगे।
भारत को सुपर पावर होने का भान कराने वाली यहां की विशाल कुशल श्रम-शक्ति है। भारत कुशल श्रमिकों का न सिर्फ आज सबसे बड़ा गढ़ बनकर उभर रहा है बल्कि पूरी दुनिया विशेषकर आज विकसित देश भी भारत की तकनीकी कुशल श्रम-शक्ति की बदौलत ही अपनी श्रेष्ठता और विकसित स्थिति को बचाये हुए हैं। आने वाले 20 सालों में भारत पूरी दुनिया के लिए कुशल श्रम-शक्ति का सबसे बड़ा निर्यातक देश साबित होगा। जिस तेजी से हमने आईटी इंडस्ट्री में नाम कमाया है उसको देखते हुए भविष्य का तकनीकी ताज हमारे तकनीशियनों के माथे पर ही बंधने जा रहा है। किसी देश की सुपर सत्ता तब तक नहीं अस्तित्व पाती जब तक वह सैन्य मामले में भी ताकतवर न हो। यही कारण है कि दुनिया के कई देश जिन्होंने अपना आर्थिक विकास तो तेजी से किया मगर सैन्य विकास और ढांचे के मामले में वह बड़े नहीं बन पाये तो उनकी सुपर सत्ता हमेशा प्रश्नवाचक रही, पर भारत के साथ ऐसा नहीं है।
भारत सैन्य शक्ति के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे ताकतवर देश के रूप में उभर रहा है। हम भले अभी सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य न बने हों लेकिन आज दुनिया के सर्व स्वीकृत आणविक शक्ति हैं। इसके अलावा मिसाइल शस्त्रीकरण में भी भारत दुनिया के पहले पांच प्रमुख देशों में आता है। हमारे पास मिसाइलों की एक पूरी शृृंखला है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह उधार की तकनीक पर आधारित नहीं बल्कि हमारे देशी वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीक पर आधारित है। यही कारण है कि हमारा मिसाइल शस्त्रीकरण कार्यक्रम अमेरिका, चीन और रूस जैसे देशों की तरह आला दर्जे का है।
हालांकि हाल के दिनों में जिस तरह से हमारे लोकतंत्र की सभी प्रमुख दीवारें चाहे वह कार्यपालिका हो या न्यायपालिका अथवा चौथा खम्भा यानी मीडिया तक में गंदगी और भ्रष्टाचार की दीमक दिखी है। वह दिल दहला देने वाली है और यह खतरा पैदा होता लग रहा है कि कहीं हम बनाना रिपब्लिक में न तब्दील हो जायें। लेकिन इसके साथ ही यह मजबूत आधार है कि हम पिछले 64 सालों से निरंतर लोकतंत्र हैं और इस निरंतरता में हमारे पूरे समाज को भरोसा है।
किसी देश के ताकतवर होने का एक बड़ा सबूत यह होता है कि दुनिया में उसको कितना महत्व मिल रहा है? पिछले एक दशक में भारत में जितने प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्ष या शासनाध्यक्ष आये हैं उतने और किसी देश में नहीं गए। अकेले वर्ष 2010 के अंतिम 6 महीनों को ही देख लें। दुनिया के सभी प्रमुख देशों के राजनेता भारत का दौरा करके गये हैं। जुलाई में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून अपने विशाल शिष्टमंडल के साथ भारत की यात्रा पर आये तो नवम्बर में तीन दिनों की यात्रा पर अमेरिका के राष्ट्रपति 300 से ज्यादा महत्वपूर्ण सदस्यों के साथ आये। अभी बराक हुसैन ओबामा को गये एक महीना भी नहीं हुआ था कि फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी चार दिन की यात्रा पर भारत पहुंच गये। उनके महज एक हफ्ते बाद ही चीन के प्रधानमंत्री वेन जिया बाओ तीन दिन की भारत यात्रा पर आये और साल के आखिर में दो दिन की यात्रा पर रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव भारत आये। गौरतलब यह कि यह यात्राएं महज शिष्टाचार यात्राएं भर नहीं थीं बल्कि इन सभी यात्राओं के बड़े आर्थिक और राजनीतिक लक्ष्य थे। मसलन अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी यात्रा के पहले दिन ही मुम्बई में कार्पोरेट दिग्गजों को सम्बोधित करते हुए कहा कि वह अपने देश के लिए नौकरियों का जुगाड़ करने आये हैं। पहले दिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने 10 अरब डॉलर के समझौते किये तो निकोलस सरकोजी उनसे भी दो कदम आगे रहे और 20 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार समझौते करके गये। वेन जिया बाओ के साथ भी 20 अरब डॉलर के समझौतों पर दस्तखत हुए तो डेविड कैमरून और दिमित्री मेदवेदेव की यात्राओं के लक्ष्य भी अरबों डॉलर के द्विपक्षीय आर्थिक समझौते थे।
भारत की अर्थव्यवस्था जिस तेजी से विकास के पथ पर दौड़ रही है उसे दुनियाभर के अर्थशास्त्रियों और आर्थिक अनुमान लगाने वाली संस्थाओं मसलन गोल्डमैन सैक्स की भविष्यवाणी है कि सन् 2050 तक भारतीयों की प्रति व्यक्ति आय मौजूदा आय के मुकाबले 35 गुना ज्यादा हो जायेगी और भारतीय अर्थव्यवस्था जापानी अर्थव्यवस्था के मुकाबले 500 फीसदी बड़ी हो चुकी होगी। इटली, ब्रिटेन और फ्रांस की साझा अर्थव्यवस्था से भी भारत की अर्थव्यवस्था बड़ी होगी। भारत की आर्थिक मजबूती और उसका बढ़ता कद हमारे लोगों के रहन-सहन में भी दिखता है। पिछले एक दशक में भारत में हवाई सफर करने वाले यात्रियों की संख्या में 400 फीसदी का इजाफा हुआ है और सालाना पर्यटन के लिए निकलने वाले लोगों की संख्या में 300 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है। करोड़पति बढ़े हैं, लखपति धीरे धीरे इतने ज्यादा हो रहे हैं कि गिनना मुश्किल है और दुनिया के किसी भी देश में भारतीयों की मौजूदगी, चाहे पर्यटक के रूप में हो या प्रोफेशनल के रूप में, दिखना भारत की मजबूती का सबूत है। वैसे भी दुनिया का एक पुराना विचार है कि हर कोई उगते सूरज को सलाम करता है। भारत जिस अंदाज में अपना आर्थिक, राजनीतिक और तकनीकी वर्चस्व कायम कर रहा है उससे किसी को शक नहीं है कि दुनिया क्यों उभरते हुए भारत को सलाम करना चाहती है?
मगर रुकिये जैसा कि हमने शुरू में ही जिक्र किया है कि भारत विचित्र विरोधाभासों का देश है। एक तरफ जहां हमारे पास अपने महाशक्ति होने के मजबूत तर्क हैं वहीं दूसरी तरफ इस बात में भी कोई दो राय नहीं हैं कि भारत के साथ अभी भी तमाम ऐसी मूलभूत खामियां जुड़ी हुई हैं जो हमें एक कमजोर और लाचार देश साबित करती हैं। इतिहासकार और समाजशास्त्री रामचन्द्र गुहा ऐसे 10 बिन्दुओं की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं जो हमारे सुपर पावर बनने में बहुत बड़ी बाधा साबित हो सकते हैं। गुहा के मुताबिक सबसे पहला और प्रमुख बिन्दु यह है कि भारत जबरदस्त आंतरिक सुरक्षाजन्य चुनौतियों से रूबरू है। भारत वामपंथी और दक्षिणपंथी यानी दोनों तरह के चरमपंथियों से जूझ रहा है। भ्रष्टाचार दिन पर दिन सुरसा के मुंह की तरह अति से अनंत तक बढ़ता जा रहा है। सार्वजनिक निकायों का क्षरण हो रहा है, गरीबों और अमीरों के बीच लगातार खाई गहराती जा रही है, लगातार पर्यावरण विनाश हो रहा है, भारत का चुनावी ढांचा जड़ता का शिकार हो गया है, सरहदों में बेचैनी लगातार बढ़ रही है, हमारे हर तरफ के पड़ोसी अस्थिरता के शिकार हो रहे हैं तथा मीडिया के साथ-साथ न्यायपालिका भी रह-रहकर विश्वसनीयता खोती नजर आ रही है।
भारत को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि जब तक तमाम मानक अपने विरोधाभासों से मुक्त नहीं होंगे, कोई देश सुपर पावर नहीं बन सकता। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि भारत अर्थशास्त्र के बड़े और पारम्परिक मानकों में खरा उतर रहा है। हमारे ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (जीडीपी), ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट (जीएनपी) तथा इंडस्ट्रियल ग्रोथ रेट (आईजीआर) बढ़ रही है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि महाशक्ति होने के लिए हमारे स्वास्थ्य का स्तर बेहतर होना चाहिए। सौ फीसदी साक्षरता होनी चाहिए, लोगों का गुणवत्तापूर्ण जीवन होना चाहिए। जबकि अभी तक हकीकत यह है कि देश में 45 करोड़ से ज्यादा लोगों का जीवन देश के 25 करोड़ लोगों के मुकाबले इतना कमतर या भिन्न है कि आराम से कहा जा सकता है कि दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है।
भारत एक तरफ विश्व-गुरु है और दूसरी तरफ हमें पूरी दुनिया से सीखना भी है। इस तरह का विरोधाभास सिर्फ और सिर्फ भारत में ही हो सकता है जिसे सालों पहले एक मुम्बइय्या फिल्म के गाने ने बड़ा सटीक चित्रित किया है, ‘इट हैपंस ओनली इन इंडिया…’।


Comments Off on आर्थिक समृद्धि कितनी हकीकत, कितना फसाना
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

समाचार में हाल लोकप्रिय

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.