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पैमाने में महाशक्ति है भारत

Posted On January - 1 - 2011

अल्पसंख्यक

शाहिद ए चौधरी लेखक विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में विशिष्ट संपादक हैं

चित्रांकन संदीप जोशी

अगर ’70 के दशक के भारतीय मुस्लिम की तुलना आज के मुस्लिम से की जायेगी तो जमीन-आसमान का फर्क नजर आयेगा। अविश्वास, अनिश्चितता, अशिक्षा आदि के स्थान पर विश्वास, निश्चितता, शिक्षा आदि नजर आयेंगे। आज जहां वे आईएएस परीक्षा में टॉप कर रहे हैं वहीं छोटे शहरों में स्वरोजगार के जरिये आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हैं। यह है बदलते भारत की बदलती तसवीर जिसमें अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम भी न केवल अपना भरपूर योगदान दे रहे हैं बल्कि लाभान्वित भी हो रहे हैं। इसलिए यकीन के साथ कहा जा सकता है विकसित भारत के अल्पसंख्यक भी विकसित हैं। गौरतलब है कि हम अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा के इस नजरिये से सहमत हैं कि अब भारत विकासशील नहीं विकसित देश है।
यद्यपि ओबामा की टिप्पणी पर बहस है और दोनों पक्ष-विपक्ष में दलीलें दी जा रही हैं लेकिन समझने की बात यह है कि यूरोप के जिन देशों को विकसित की कतार में खड़ा किया जाता है उनसे भारत हर सूरत में  21 है, 19 नहीं। इसलिए भारत को विकसित देश ही कहना उचित होगा। बहरहाल, किसी भी देश की तरक्की मापने का पैमाना यह है कि उसके अल्पसंख्यक किस स्थिति में हैं? यूं तो अपने देश में पारसी, सिख, जैन आदि भी अल्पसंख्यकों की परिभाषा के तहत आते हैं और संविधान इन्हें इसी रूप में स्वीकार भी करता है। लेकिन इनकी स्थिति तो हमेशा बहुसंख्यक हिन्दुओं से भी बेहतर रही है। इसलिए हम अल्पसंख्यकों में मुस्लिमों की स्थिति का विश्लेषण करेंगे जो 2001 की जनगणना के मुताबिक देश की कुल आबादी का 13.6 प्रतिशत हैं और सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक हैं।
किसी भी समुदाय की विकास दर उसकी सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक व राजनीतिक स्थिति से मापी जाती है। इनमें भी विकास का अंतिम बिंदु उसकी राजनीतिक भूमिका होती है। लोकतंत्र में जो समूह जितनी अधिक राजनीतिक परिपक्वता का प्रदर्शन करेगा वह उतना ही विकसित होगा। इस दृष्टि से अगर देखा जाये तो ’70 के दशक के और आज के मुस्लिम में वही फर्क है जो विकासशील और विकसित में होता है। पहले मुस्लिमों के सामने केवल एक ही मुद्दा था—सुरक्षा का।  उनको लगता था कि केवल कांग्रेस ही उनकी सुरक्षा की जमानत दे सकती थी, उनके धार्मिक नेता भी उनको यही फीड करते थे और इसलिए वे एकमुश्त कांग्रेस की झोली में गिर जाते थे। लोकतंत्र के नाम पर उनका बस इतना ही दायित्व था या वे केवल इतना समझते थे। एक समुदाय जो रोटी, रोजी, रक्षा के संदर्भों में अपने आपको बचाने के लिए जूझ रहा हो उससे इससे अधिक की उम्मीद भी फिजूल थी। लेकिन आज के देश का हर मुद्दा उसका अपना मुद्दा है। लोकतंत्र में उसका हस्तक्षेप किसी पार्टी विशेष को हराने के लिए नहीं बल्कि अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए है। वह जो सही सोचता है उसे लागू करने के लिए है। इसलिए हाल के बिहार विधानसभा के चुनाव में उसने यह नहीं सोचा कि नीतीश कुमार किस पार्टी से सांठ-गांठ किये हुए हैं बल्कि उसने यह सोचा कि नीतीश कुमार जिस डगर पर बिहार को ले जा रहे हैं उसमें उसकी हिस्सेदारी होना भी जरूरी है। एक विकसित समूह की प्रतिक्रिया यही होती है।
लोकतंत्र का सबसे बड़ा फायदा मुस्लिम समुदाय को यह हुआ है कि वह ताबेदारी की जगह हिस्सेदारी की बात करता है। दूसरे शब्दों में, वह उस राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें वह किसी के अधीन नहीं बल्कि बराबर का हिस्सेदार है। यही कारण है कि मुस्लिमों की सोच में जबरदस्त परिवर्तन देखने को मिल रहा है। सोच का यह परिवर्तन केवल राजनीतिक मामलों तक सीमित नहीं है। धार्मिक मामलों में भी ऐसा ही बदलाव आया है जिसकी कल्पना दो दशक पहले सम्भव नहीं थी। दरअसल, जब कोई समूह दबा- कुचला होता है या विकास के लिए प्रयास कर रहा होता है तो उसकी सोच पर धर्म छाया होता है। उसे लगता है कि उसकी मुक्ति धर्म में ही सम्भव है। इसलिए धर्मगुरु इस स्थिति का लाभ उठाते हैं और पुरातन पंथी विचारों में ही उसे फंसाये रखते हैं। सत्तर और अस्सी के दशकों में यह देखने को मिलता था कि दिल्ली की जामा मस्जिद के तथाकथित शाही इमाम चुनाव की पूर्व संध्या पर किसी पार्टी विशेष के पक्ष में एक अपील जारी करते जिसे मीडिया फतवा कहकर प्रचारित करती और यह मान लिया जाता कि तमाम मुस्लिम उसी पार्टी के पक्ष में मतदान करेंगे। हालांकि यह बात उस समय भी सही नहीं थी लेकिन आज निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि मुस्लिम किसी धर्मगुरु के कहने पर मतदान नहीं करते। अन्य भारतीयों की तरह ही उनके लिए भी देश के समक्ष जो ज्वलंत समस्याएं व मुद्दे हैं उनको मद्देन$जर रखते हुए मतदान करते हैं। जाहिर है, यह एक ऐसी विकसित समूह की प्रतिक्रिया है जो विकसित देश का अटूट हिस्सा है।
बहरहाल, इस संदर्भ में जो विशेष बात देखने को मिली है वह बेकार के फतवों का विरोध है। कुछ दशक पहले देवबंद व अन्य मदरसों से ऐसे बेसिर-पैर के फतवे दिये जाते थे कि कोई भी समझदार आदमी उन्हें गौर करने लायक भी नहीं समझता था। लेकिन उस समय इन मदरसों की पकड़ मुस्लिमों पर इतनी जबरदस्त थी कि उनके फतवों को दैविक आदेश मानकर कम से कम एक बड़ी संख्या स्वीकार कर लेती थी। लेकिन आज स्थिति यह नहीं है। गौरतलब है कि हाल ही में कुछ फतवे ऐसे आये जिनमें कहा गया था कि महिलाओं को रोजगार का अधिकार नहीं है या मुस्लिमों को बैंकों में रोजगार नहीं करना चाहिए क्योंकि वहां सूद का काम होता है। जाहिर है, आज के संदर्भों में इस किस्म की बातों का कोई औचित्य नहीं है। इसलिए मुस्लिमों ने इन फतवों का जमकर विरोध किया और फतवा देने वाले मदरसों को बाद में लीपापोती करते हुए अपने बयानों को वापस लेना पड़ा।
यद्यपि यूरोप के कुछ देशों में पर्दे को लेकर पिछले कुछ सालों के दौरान काफी बहस छिड़ी हुई है लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि इस पर अपने देश में कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं है। इसकी बुनियादी वजह यह है कि भारत में पर्दा कोई मुद्दा ही नहीं रहा है। पर्दे को लेकर मुस्लिम महिलाओं में जो परिवर्तन देखने को मिल रहा है उसे सहज ही सड़कों पर नोट किया जा सकता है। आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में भी मुस्लिम आगे बढ़ रहे हैं। न केवल सरकारी स्कूलों में मुस्लिम छात्र-छात्राओं की संख्या में इजाफा हुआ है बल्कि मुस्लिमों के निजी स्कूलों की संख्या भी बढ़ी है। अब तो उत्तर से लेकर दक्षिण तक ऐसे भी कॉलेज व इंस्टीच्यूट देखने को मिल जाते हैं जो प्रोफेशनल शिक्षा प्रदान कर रहे हैं और जिनका मैनेजमेंट मुस्लिमों के हाथ में है और उनमें मुस्लिम शिक्षार्थियों की संख्या भी प्रशंसनीय है।  प्रोफेशनल व आधुनिक शिक्षा की आवश्यकता को महसूस करते हुए अब मदरसों में भी न केवल कम्प्यूटर शिक्षा प्रदान की जा रही है बल्कि आधुनिक विषय भी पढ़ाये जा रहे हैं ताकि मदरसों के छात्र मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था में शामिल होकर अपना कॅरिअर बना लें।
दरअसल, कोई देश उसी स्थिति में विकसित होने का दर्जा प्राप्त करता है जब उसका प्रत्येक समूह विकसित हो या विकास की प्रक्रिया में शामिल हो। आज अगर भारत को बराक ओबामा विकसित देश के रूप में स्वीकार कर रहे हैं तो इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि  मुस्लिमों सहित देश का प्रत्येक समूह विकास की डगर पर मजबूती से चल रहा है।
हालांकि सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र की रिपोर्टों से यह लगता है कि अन्य समुदायों की तुलना में मुस्लिम बहुत पिछड़े हुए हैं लेकिन इन रिपोर्टों को उचित पृष्ठभूमि में समझना आवश्यक है। दरअसल, देश जब आजाद हुआ तो तीन ऐसे मुख्य कारण रहे जिनकी वजह से मुस्लिम पिछड़ गये थे। सबसे पहली बात तो यह है कि मुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग दस्तकारी से जुड़ा हुआ था और उस समय भारतीय मध्य वर्ग के पास इतना पैसा नहीं था कि कला व कलाकृतियों को प्रोत्साहित किया जा सकता। इसलिए मुस्लिम दस्तकार वर्ग आर्थिक रूप से पिछड़ गया। दूसरा यह कि हरित क्रांति धान उत्पादन क्षेत्रों की तुलना में पहले गेहूं उत्पादन क्षेत्रों में आयी। चूंकि अधिकतर मुस्लिम धान उत्पादन क्षेत्रों में रहते हैं, इसलिए हरित क्रांति का लाभ उन्हें तकरीबन 10 वर्ष बाद मिला। जाहिर है कि वे इस लिहाज से पिछड़ गये।
अंतिम यह है कि आजादी के समय कम से कम उत्तर भारत का शिक्षित वर्ग पाकिस्तान चला गया और पीछे ऐसे मुस्लिम रह गये जिनकी बड़ी तादाद अशिक्षितों की थी। इस वजह से मुस्लिमों में नेतृत्व का अभाव रहा और उन पर मदरसा की राजनीति हावी होती चली गयी। यह भी उनके पिछडऩे का एक बड़ा कारण रहा।
लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता पिछड़ेपन के ये तमाम कारण लुप्त होते चले गये और पिछडऩे के बावजूद मुस्लिम तरक्की करने लगे। जैसे-जैसे भारतीय मध्य वर्ग की आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगी वैसे ही मुस्लिमों का दस्तकार वर्ग भी सम्पन्न होने लगा। यही वजह है कि आज मुरादाबाद व अन्य क्षेत्रों में जो मुस्लिम दस्तकार वर्ग है वह आर्थिक व शैक्षिक दृष्टि से खूब तरक्की कर रहा है। इसके अलावा मुस्लिमों में नया जुझारू नेतृत्व भी उभरकर सामने आ रहा है और इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि उसका संबंध मदरसा या मदरसा राजनीति से नहीं है। खेल का मैदान हो, रूपहले पर्दे की चकाचौंध हो, विज्ञान के क्षेत्र में कड़ी मेहनत हो, सियासत के मैदान में खद्दर का बोझ हो, गर्ज यह कि कोई भी जगह हो हर एक में आपको जहीर खान, आमिर खान, एपीजे अब्दुल कलाम, सलमान खुर्शीद आदि अपनी विशेष क्षमताओं का परिचय देते हुए मिल जायेंगे। यह अपवाद नहीं हैं। जाहिर है यह सब इसलिए सम्भव हो सका है कि देश विकासशील की श्रेणी से निकलकर विकसित देशों की श्रेणी में आ गया है। देश तभी विकसित हुआ है जब बिना अपवाद के उसका हर समूह विकसित हुआ है जिसमें विशेष रूप से मुस्लिम शामिल हैं।


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