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प्रवासी भारतीय

Posted On January - 1 - 2011

विदेशों में भारत के सुपर ब्रांड

चित्रांकन संदीप जोशी

डॉ. एम.सी. छाबड़ा लेखक विदेशी मामलों के जानकार एवं एस. एम. कॉलेज नोएडा में प्रोफेसर हैं

ये डॉक्टर हैं। इंजीनियर हैं। प्रोफेसर हैं। प्रौद्योगिकी गुरु हैं। सीईओ हैं। पत्रकार हैं। लेखक हैं। राजनीतिज्ञ हैं। संगीतकार हैं। प्रकाशक हैं। फिल्मकार हैं। अर्थशास्त्री हैं। इनकी तादाद 2.5 करोड़ से ज्यादा है। ये जहां भी हैं, खुशहाल हैं। स्थानीय लोगों से ज्यादा पढ़े-लिखे हैं। उनसे इनका कॅरिअर बेहतर है। आर्थिक हालत अच्छी हैं। इसलिए ये उनकी आंखों में खटकते भी हैं।
शायद अब तक आप समझ गये होंगे हम प्रवासी भारतीयों की ही बात कर रहे हैं।
प्रवासी भारतीय मतलब ऐसे भारतीय नागरिक जो पढऩे के लिए, काम के लिए, कारोबार के लिए या किसी वजह से विदेश गये हैं और वहीं रह रहे हैं। प्रवासी भारतीय का एक यह मतलब भी है कि एक ऐसा व्यक्ति जिसका मूल तो भारत में हो लेकिन वह पैदा विदेश में हुआ हो और वहीं रह रहा हों। प्रवासी भारतीय का एक मतलब यह भी है कि ऐसे भारतीय जो स्थायी रूप से भारत के बाहर रहते हैं। प्रवासी भारतीय विदेशों में भारत के प्रतिनिधि हैं। भारतीय संस्कृति के प्रतिरूप हैं। इसके प्रतीक हैं। दुनिया जब इन्हें देखती है तो उन्हीं के जरिये भारत के बारे में जानती है। भारत के बारे में अनुमान लगाती है। इन्हीं के जरिये भारत को समझती
है। कुल मिलाकर ये विदेशों में भारत का चेहरा हैं। इसीलिए इन्हें भारत का सुपर ब्रांड कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
आज अमेरिका में भारतीय मेधा की बहुत कद्र है। अमेरिका के प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारतीयों को बहुत सम्मान से देखा जाता है। भारतीयों को बहुत बुद्धिमान समझा जाता है। भारतीयों की छवि ईमानदार और मेहनती लोगों की है तो इसकी सबसे बड़ी वजह प्रवासी भारतीय हैं। प्रवासी भारतीयों की बदौलत ही यूरोप, अमेरिका और कनाडा में भारत को सम्पन्न और सम्मान की नजर से देखा जाता है।
परमिट मजदूर के रूप में बड़े पैमाने पर अनपढ़ खेतिहर मजदूरों को ब्रिटिश भारत में सन् 1807 से 1834 के ब्रिटेन के कई उपनिवेशों में जबरदस्ती खेतों में काम करने के लिए ले जाया गया। इस तरह देखें तो पहली बार बड़े पैमाने पर प्रवासी होने का दुख गरीब, अनपढ़ खेत मजदूरों ने भुगता जो आज ब्रिटिश गुयाना, वेस्टइंडीज और मॉरीशस में बड़ी आबादी के रूप में मौजूद हैं। ये मजदूर, जिन्हें इतिहास में गिरमिटिया मजदूर कहा गया है और जिन पर हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार गिरिराज किशोर ने अपना प्रसिद्ध उपन्यास गिरमिटिया लिखा है, बड़े पैमाने पर मौजूदा उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश से ले जाये गये थे। 1929-31 में ब्रिटिश सरकार ने रॉयल कमीशन का गठन किया जिसने भविष्य में भारत से जाने वाले मजदूरों के लिए तमाम नियम कायदे बनाये।
आज दुनिया के 73 से ज्यादा देशों में भारतीयों की मौजूदगी है जो तमाम अलग-अलग भारतीय भाषाओं को बोलते हैं और भारतीय मान्यताओं, विश्वासों और धर्मों से जुड़े हैं। विदेश में बसे भारतीयों में हिन्दू हैं, सिक्ख हैं, जैनी हैं, बुद्धिस्ट हैं, जरत्रुस्टियन हैं, ईसाई हैं, मुसलमान हैं और नास्तिक भी हैं। अगर संख्या के लिहाज से देखा जाये तो दुनिया में सबसे ज्यादा 40,00,000 से ज्यादा भारतीय नेपाल में इसके बाद 27,65,815 अमेरिका में, 24,00,000 मलेशिया में, 20,00,000 म्यांमार में, 15,00,000 सऊदी अरब में, 14,00,000 संयुक्त अरब अमीरात में, 13,16,000 इंग्लैंड में, 11,60,000 दक्षिण अफ्रीका में, 10,63,150 कनाडा में, 8,55,000 मॉरीशस में, 5,80,000 कुवैत, 5,25,000 त्रिनीडाड और टोबैगो में, 4,50,000 ओमान में, 4,05,000 ऑस्टे्रलिया में, 4,00,000 सिंगापुर में, 3,40,000 फिजी में, 3,30,000 फ्रांस में, 3,27,000 गुयाना में, 3,10,000 बहरीन में, 1,35,000 सूरीनाम में, 1,25,000 कतर में, 1,10,000 हॉलैंड में, 1,05,000 न्यूजीलैंड में, 1,00,000 केन्या में, 90,000 तंजानिया में, 90,000 युगांडा में, 90,000 जमैका में, 71,500 इटली में और 65,000 थाईलैंड में बसे हैं। ये प्रवासी भारतीय स्थानीय भाषाएं बोलते हैं, भारतीय भाषाएं बोलते हैं और जहां की स्थानीय भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी बोलते हैं।
लेकिन इससे भारतीयों की न तो सफलता में किसी तरह की कोई कमी आयी है और न ही दिनोंदिन बढ़ रही उनकी हैसियत में बाधा पहुंची है। आज ब्रिटेन और अमेरिका जैसे दुनिया के दो समृद्ध और शक्तिशाली देशों में प्रवासी भारतीयों का अच्छा खासा दबदबा है। सिर्फ पढ़ाई-लिखाई और कुशल श्रम के क्षेत्र में ही भारतीयों का डंका नहीं बज रहा है बल्कि कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां भारतीयों ने अपनी प्रतिभा न बिखेरी हो। कार्पोरेट से लेकर कल्चर तक के क्षेत्रों में भारतीय छाये हुए हैं। ओबामा प्रशासन में आधा दर्जन से ज्यादा प्रवासी भारतीय महत्वपूर्ण नीति निर्धारक स्थिति में हैं। कई गवर्नर और सांसद अमेरिका में प्रवासी भारतीय हैं। बॉबी जिंदल जिनके मां बाप अमर और राज जिंदल भारत के लुधियाना से जाकर अमेरिका में बसे हैं, वह बॉबी लूसियाना के गवर्नर हैं और माना जा रहा है कि 2012 में वह राष्ट्रपति पद के चुनावों के लिए भी एक उम्मीदवार हो सकते हैं। इंदिरा नूई विश्व प्रसिद्ध कम्पनी पेप्सीको की सीईओ हैं और दुनिया की सर्वाधिक शक्तिशाली महिलाओं की सूची में पहले 20 स्थानों पर अपनी जगह बनाती हैं।
निकी हैल का भी मूल पंजाब में है और वह इस समय साउथ कैरोलीना की गवर्नर हैं। नागपुर के विक्रम पंडित सिटी ग्रुप जैसी बहुराष्ट्रीय बैंक के सीईओ हैं तो चंडीगढ़ के श्रीनिजा श्रीनिवासन याहू जैसी सूचना प्रौद्योगिकी वेबसाइट (कम्पनी) के सीईओ हैं। मीरा नायर हॉलीवुड की महत्वपूर्ण फिल्मकार हैं जिनके साथ काम करने के लिए हॉलीवुड का हर बड़े से बड़ा सितारा हमेशा तत्पर रहता है। दीपक चोपड़ा पर्सनैलिटी
ग्रूमर हैं और उनकी गिनती अमेरिका के सेलिब्रिटीजों के प्रेरक गुरु के रूप में होती है। उत्तर प्रदेश के संजय गुप्ता अमेरिका के मशहूर डॉक्टर हैं। मिशिगन में रहने वाले संजय गुप्ता के मां बाप सुभाष और दमयंती गुप्ता 60 के दशक में अमरीका में जा बसे थे। संजय की मां दुनिया की सबसे बड़ी कार कम्पनी फोर्ड की पहली महिला इंजीनियर थीं। 2009 में ओबामा प्रशासन
द्वारा संजय गुप्ता को अमेरिका में मेडिकल क्षेत्र की सबसे बड़ी पोस्ट सर्जन जनरल का
प्रस्ताव दिया गया था। मगर मार्च, 2009 में संजय ने इस पद के लिए अपने नाम को
वापस ले लिया था। 1997-1998 तक वह व्हाइट हाउस के 15 डॉक्टरों की टीम का हिस्सा
थे और मूलत: हिलेरी क्लिंटन के सलाहाकार थे।
अटलांटिक के पार देखें तो भारतीय पासपोर्ट धारक एक नागरिक को नियमित रूप से
ब्रिटेन के धनी लोगों की सूची में ऊंचे से ऊंचा स्थान आरक्षित होता जा रहा है और यह कोई और नहीं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े इस्पात उत्पादक उद्योगपति लक्ष्मी निवास मित्तल हैं। जिन्होंने 2009 में 23 अरब डॉलर का नुकसान उठाया जो कैमरून के सकल घरेलू उत्पाद के बराबर था। बावजूद इसके वह दुनिया के 8वें और ब्रिटेन के सबसे अमीर शख्स थे। दुनिया में जितना स्टील बनता है उसमें से 10 फीसदी स्टील का उत्पादन उनकी अपनी कम्पनी आर्सेलर मित्तल में होता है। उनकी निजी सम्पत्ति 19.3 अरब डॉलर की है। अमेरिका में अगर पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और उनकी पत्नी हिलेरी क्लिंटन की रसोई तक किसी भारतीय की पहुंच है तो वह संत सिंह चटवाल हैं जो अमेरिका के सबसे बड़े होटल कारोबारी के रूप में उभरे हैं और व्हाइट हाउस की महत्वपूर्ण गैर राजनीतिक से लेकर राजनीतिक पार्टियों तक का हिस्सा होते हैं। अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अमत्र्य सेन और वैश्वीकरण की क्रांतिकारी अवधारणाओं के जनक जगदीश भगवती अमेरिका और यूरोप के बौद्धिक जगत के सबसे ज्यादा ध्यान सुने जाने वाले विचारकों में से हैं।
पिछली आधी सदी में भारतीयों ने पूरी दुनिया में खूब नाम कमाया है। खूब पैसा कमाया है और खूब हैसियत हासिल की है। इस सबका लाभ भारत को हुआ है। जो विदेशी पहले भारत को साधुओं, सपेरों और समस्याओं के देश के रूप में जानते थे वे विदेशी अब हिन्दुस्तान को तेजी से उभरती हुई एक महाशक्ति के रूप में देखने लगे हैं। विदेशों में बसे प्रवासी, भारत की इस नयी पुख्ता हो रही छवि के सबसे बड़े सूत्रधार हैं। अगर यकीन न हो तो बराक हुसैन ओबामा के उन वक्तव्यों को याद करिये जिनमें उन्होंने कई बार कहा है, अगर अमेरिका को अपनी हैसियत बरकरार रखनी है तो अमेरिकियों को भारतीयों की तरह पढऩे-लिखने में और मेहनत में नये मानक गढऩे होंगे। याद रखिए ओबामा ने ये बातें अमेरिका में बसे प्रवासियों को देखते हुए ही कही हैं। क्योंकि अमेरिका में जो भारतीय प्रवासी रह रहे हैं वह दूसरे अमेरिकियों के मुकाबले न सिर्फ बहुत ज्यादा पढ़े लिखे हैं बल्कि उनके मुकाबले आर्थिक रूप से भी वह कहीं ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं।
इसलिए अगर कहा जाये नये सुपर पावर भारत के सबसे चमकते मजबूत ब्रांड ये प्रवासी भारतीय ही हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा। प्रवासी भारतीयों द्वारा बड़े पैमाने पर भेजा जा रहा धन, भारत की अर्थव्यस्था के लिए बहुत बड़ी टॉनिक के माफिक है। सन 2009 में दुनिया के अलग अलग कोनों में बसे भारतीयों ने जो पैसा हिन्दुस्तान भेजा वह 50 अरब डॉलर था। यह इसी दौरान चीन के नागरिकों द्वारा अपने देश भेजे गये पैसे से 3 अरब डॉलर ज्यादा था। यही नहीं चीन और भारत ने अगर हाल के सालों में सबसे तेज आर्थिक विकास किया है तो इसमें भी बहुत बड़ी भूमिका इन दो देशों के विदेशों में बसे नागरिकों द्वारा भेजे गये पैसे की ही है। इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक सन 2009 में अपने देश से बाहर रह रहे लोगों द्वारा अपने देशों को जो धन भेजा गया वह कुल 162.5 अरब डॉलर था जिसमें 39 फीसदी पैसा भारत और चीन के प्रवासियों का ही था। प्रवासी भारतीय वास्तव में विदेश में भारत के असली जन राजदूत हैं जो भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक श्रेष्ठता का विस्तार कर रहे हैं। भारत के सुपर पावर बनने में या सुपर पावर बनने की दिशा में अग्रसर होने में, सबसे महत्वपूर्ण भूमिका प्रवासी भारतीयों की ही है।


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