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महाशक्ति बनना है तो भ्रष्टाचार से लडऩा होगा

Posted On January - 1 - 2011

चित्रांकन संदीप जोशी

सुभाषचंद्र अग्रवाल गिनीज रिकार्डधारी सूचना अधिकार कार्यकर्ता तथा देश के पहले आरटीआई अवॉर्ड विजेता

मैं जब कभी किसी सेमिनार में जाता हूं। किसी वर्कशॉप में जाता हूं तो अकसर लोग मुझसे पूछते हैं कि राइट टू इनफार्मेशन एक्ट के भारतीय लोकतंत्र के लिए क्या मायने हैं? मैं उनसे कहता हूं भारतीय लोकतंत्र को जो इस समय घुन लगा है, वह घुन है करप्शन यानी भ्रष्टाचार का। आरटीआई एक्ट को अगर हम सही ढंग से इस्तेमाल करें तो करप्शन बहुत हद तक दूर हो सकता है। मैंने व्यक्तिगत रूप से भी यह बात देखी है। मेरा व्यक्तिगत मामला पूरे देश में चर्चित रहा है। इसके बाद ही न्यायपालिका ने जवाबदेही की अपनी जिम्मेदारी को स्वीकारा है। इसलिए मुझे लगता है कि आरटीआई से बहुत कुछ हो सकता है। लेकिन मैं एक बात कहना चाहूंगा वह यह कि यह कानून बन तो गया, लागू भी हो गया। लेकिन सरकार इसके प्रति लोगों में चेतना जगाने का कोई भी प्रयास नहीं कर रही है। सूचना अधिकार कानून या आरटीआई को लेकर लोगों में अनभिज्ञता बहुत है। अगर आरटीआई एक्ट को सही ढंग से इस्तेमाल किया जायेगा तो करप्शन बहुत हद तक दूर हो जायेगा और जब हिन्दुस्तान से करप्शन यानी भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा तो फिर उसे महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता।
लोग खासकर पत्रकार मुझसे यह सवाल भी पूछते हैं कि क्या आरटीआई एक्ट के बाद वाकई नेताओं और नौकरशाहों के चाल-चलन में कोई फर्क पड़ा है? उनमें डर या चिंता पैदा हुई है? मेरा कहना है निश्चित रूप से ऐसा हुआ है। डर और चिंता तो वाकई बहुत पैदा हुई है। मगर इसमें भी कुछ फर्क है। आरटीआई एक्ट में आजकल कुछ अलग किस्म के रेस्पांस भी देखने को मिल रहे हैं। मसलन अगर कोई पिटीशन मैं दायर करता हूं तो मुझे उसका फटाफट रेस्पांस मिलता है। शायद इसकी वजह यह है कि वहां सब लोग मुझे जानते हैं। इसलिए थोड़ा सहमकर और प्रॉपर रेस्पांस करते हंै। लेकिन वही पिटीशन अगर कोई और लगाता है तो उसे इतना सटीक जवाब नहीं मिलता जितना सटीक और जल्द जवाब मिलना चाहिए। दरअसल समस्या वही है, भ्रष्टाचार। हर जगह गैर ईमानदारी है।
इसीलिए मैं कहता हूं कि आरटीआई को हमें अपने रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनाना होगा। हमें इसे अपनी जीवनशैली और कार्यशैली का हिस्सा बनाना होगा क्योंकि यही वह हथियार है जिससे हम भ्रष्टाचार को हरा सकते हैं। भ्रष्टाचार से निपटने का आरटीआई बहुत कारगर हथियार है। बशर्ते लोगों में इसके प्रति जागरूकता पैदा हो और वह इसे अपनी रोजमर्रा की जीवनशैली का हिस्सा बनायें। मैं तो कहता हूं कि इसे स्कूलों में पाठ्यक्रम के रूप में लगा देना चाहिए। कॉलेजों में इसके लिए वर्कशाप लगाई जाएं। क्योंकि लोगों में बहुत अनभिज्ञता है। मैंने बहुत से जवान लोगों से बात की, कॉलेज गोइंग स्टूडेंट्स से बात की लेकिन उनमें से ज्यादातर को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं था। यहां तक कि पिछले दिनों एक सरकारी बैंक ने मेरे विरुद्ध कुछ गलत व्यवहार किया जिससे मैंने आरटीआई पिटीशन लगाई। यह आरटीआई उस बैंक शाखा के मुख्य प्रबंधक पर असर करती थी। इसलिए वहां के वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रबंधक को समझाया कि वह मुझसे माफी मांग ले और पिटीशन को वापस करा ले वरना अनर्थ हो जायेगा। वह प्रबंधक मेरे पास आया और अपनी गलती स्वीकार की व माफी मांगी तो मैंने पिटीशन वापस ले ली। लेकिन इस सबके बाद उस मुख्य प्रबंधक ने मुझसे पूछा—अग्रवाल साहब यह आरटीआई पिटीशन बाई द वे होती क्या है? मैंने इतने बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की अज्ञानता या अनभिज्ञता पर माथा पीट लिया।
लेकिन अब सवाल उठता है कि आरटीआई के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए क्या किया जाना चाहिए? ऐसा सवाल भी मुझसे अकसर लोग पूछते हैं। इस बारे में मेरा कहना है कि एक जमाने में हमारे यहां उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने के लिए एक ‘रजनी’ सीरियल आया करता था। यह टीवी युग है ऐसे में क्यों न ऐसा कोई सीरियल आरटीआई पर बने जो रुचिकर भी हो और लोगों को सूचना अधिकार के प्रति शिक्षित भी करे। और जैसे मैंने पहले भी कहा स्कूलों के पाठ्यक्रमों में इसे लागू किया जाये। कालेज गोइंग स्टूडेंट्स के लिए वर्कशाप लगें। मतलब यह कि समाज को पूरी तरह से जगाने के लिए एक ही साथ हर तरह के प्रयास किये जाएं ताकि यह चेतना जन-जन में समा जाये। यकीन मानिए अगर ऐसा हो जाये तो भ्रष्टाचार उन्मूलन में बहुत मदद मिलेगी।
कुछ लोगों को लगता है कि अगर राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच भ्रष्टाचार खत्म हो जाये यानी इन लोगों पर नकेल डाल दी जाये तो देश से आनन-फानन में भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा। मैं ऐसे लोगों से हमेशा कहता हूं यह सरलीकरण है। आप न्यायापालिका को क्यों भूल जाते हैं? अभी पिछले दिनों ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी। मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव भी बहुत कडु़वा है। मेरा कहने का मतलब यह है कि भ्रष्टाचार की यह त्रई है। हमारी व्यवस्था के या कहें लोकतंत्र के तीनों प्रमुख अंग भ्रष्ट हो चुके हैं। और अभी कुछ दिनों पहले पूरा देश नीरा राडिया के टेप सुन ही चुका है जिसने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है ‘फोर्थ पिलर ऑफ डेमोक्रेसी’ यानी मीडिया का भी भ्रष्ट चेहरा इन टेपों से उजागर हो गया है। भ्रष्टाचार अब इस देश की जड़ों तक समा चुका है। दरअसल हमारा माइंडसेट ही विकृत हो चुका है या कहें प्रो करप्शन हो चुका है—टिप्स, दीवाली गिफ्ट्स। ये सारी की सारी चीजें हैं क्या? मैंने अपनी आंखों से देखा है। मेरे चाचा के दामाद जब जज बने तो और तो और मेरे चाचा के घर में दीवाली की इतनी इनकमिंग बढ़ गई कि कहना चाहिए बेतहाशा हो गयी।
लेकिन इस अंधकार में रोशनी की लकीर दिख रही है। हालांकि अब भ्रष्टाचार के इस दलदल से मीडिया भी बाहर नहीं खड़ा रह सका है? लेकिन यह भी सच है कि लोगों में आरटीआई एक्ट को लेकर थोड़ी बहुत जो जागरूकता आई है, उसका श्रेय भी मीडिया को ही है। मीडिया ही है जो आरटीआई की ताकत, इसकी खूबियों को प्रचारित और प्रसारित कर रहा है। मैं तो मीडिया का शुक्रगुजार हूं जो उन स्टोरीज को हाईलाइट करता है जो भले किसी के निजी मसले से सम्बंधित हों लेकिन अंतत: वह इस देश, इस समाज के लिए मिसाल और आधार बनती हैं। अगर मीडिया नहीं होता तो अभी तक मैंने जो काम किया था और जिस काम की वजह से नौकरशाही/अफसरशाही तथा ज्युडिशयरी में थोड़ी एरोगेंसी कम हुई है, वह कभी न होती। दरअसल आम पत्रकार खुद दुखी है, तृषित है और चाहता है देश में से भ्रष्टाचार हटे। इसलिए सब कुछ के बावजूद मीडिया की इस भ्रष्टाचार के खात्मे में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है।
अगर मीडिया पूरी ताकत से एक अभियान के तौर पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध जुट जाती है तो जरूर परिवर्तन होगा। एक बार भ्रष्टाचार मुक्ति मिल जाये तो देश के विकास की रफ्तार तेज हो जायेगी और फिर अगर यह सच नहीं भी हो कि हम महाशक्ति हैं तो भी हम महाशक्ति बन जायेंगे क्योंकि भारत में बहुत क्षमता है। अगर स्विस बैंकों में जमा हमारे यहां का काला धन हमें वापस मिल जाये तो भारत को महाशक्ति बनने में जरा भी देर नहीं लगेगी। क्योंकि इस धन से हमारे विकास की रफ्तार बहुत तेज हो जायेगी।
ठीक है आज स्विस बैंकों में लोगों की जो ब्लैक मनी जमा है उसे वापस लाना इतना सरल नहीं है लेकिन यह असम्भव भी नहीं है। बस एक बार इसके लिए हमें एक बिना दुरुपयोग वाली ‘इंटरनल इमरजेंसी’ की जरूरत है। मनमोहन सिंह जैसा ईमानदार प्रधानमंत्री यह लागू करे और यह भूल जाएं कि उनकी गद्दी रहेगी, नहीं रहेगी। मैं एक बात और कहूंगा—आज जो यह एलायंस पॉलिटिक्स है, भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी जड़ यही है। अगर प्रधानमंत्री अपने गठबंधन की कमजोरी को भूलकर दृढ़ता दिखायें तो मास सपोर्ट उनको इतना ज्यादा मिलेगी कि उन्हें किसी और सपोर्ट की जरूरत ही नहीं रहेगी। लेकिन ईमानदारी से कहूं तो ऐसी इच्छाशक्ति मुझे कहीं नजर आ नहीं रही। कहने का मतलब यह है कि अगर सरकार अंकुश लगाना चाहे कि क्यों सोना ब्लैक मनी बनाने का उपक्रम बना हुआ है? लेकिन इच्छाशक्ति नहीं है। न तो ब्लैक मनी को खत्म करने की, न ही काले धन के समानांतर अर्थव्यवस्था पर अंकुश लगाने की और न ही स्विस बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने की। अगर इच्छाशक्ति हो जाए तो टैक्निकल प्वाइंट्स सारे निकल जायेंगे। आज भारत इतना बड़ा उपभोक्ता बाजार है कि वह दुनिया के किसी भी देश को नचा सकता है। आखिर महज दो महीनों के भीतर दुनिया के चार-चार देशों के मुखिया भारत की यात्रा पर क्यों आये? इसीलिए क्योंकि भारत एक बड़ा बाजार है। भारतीयों में खरीदारी की जबरदस्त क्षमता है। इसलिए दुनिया का हर देश भारत के इस बाजार का फायदा उठाना चाहता है। हम अपनी इसी ताकत की बदौलत आज दुनिया की नजरों में एक बड़े ताकतवर देश के रूप में जाने जा रहे हैं। अगर हम अपनी इस ताकत का इस्तेमाल करें तो स्विट्जरलैंड से ब्लैक मनी को वापस लाना न सिर्फ संभव है बल्कि देश में भ्रष्टाचार को मिटाना भी आसान है। यह कई लोगों को आश्चर्य में डाल सकता है मगर यह हकीकत है कि भारत के महाशक्ति बनने में जो सबसे बड़ी बाधा हो सकती है वह हमारे यहां व्याप्त भ्रष्टाचार ही हो सकती है। भारत बुनियादी ताकत तभी बन सकता है जब हम भ्रष्टाचार से मुक्त हों। ब्लैक मनी उजागर होगी तो ब्लैक मनी सर्कुलेशन में आयेगी। इससे विकास होगा। आम लोग खुशहाल होंगे। लेकिन अगर भ्रष्टाचार के रहते विकास हुआ जो कि हो रहा है तो उसका नतीजा यही होगा कि अमीर और ज्यादा अमीर होता रहेगा जबकि गरीब और ज्यादा गरीब होता रहेगा। आज देश का निम्न मध्य वर्ग एक बड़ा तबका है। यह तबका देश की कुशल श्रमशक्ति और बौद्धिक शक्ति का केन्द्र है। लेकिन आर्थिक दृष्टि से देखें तो यह तबका न इधर है न उधर है। वह पिस रहा है। वह टेंशन में जी रहा है। और इस सबसे निजात तभी मिल सकती है जब हमारा गवर्नेंस सिस्टम बढिय़ा हो। उसके लिए हमें अपने इलेक्टोरल सिस्टम में रिफॉर्म की जरूरत पड़ेगी।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी हकीकत है कि मीडिया के बाद देश के भ्रष्टाचार को सबसे ज्यादा चिन्हित करने वाला, उजागर करने वाला और उसके खिलाफ कड़ा रुख अपनाने वाला क्षेत्र न्यायपालिका ही है। इसलिए पूर्वाग्रह या दुराग्रह हमें नहीं पालने चाहिए। यह मानकर चलना चाहिए कि हर जगह अच्छे और बुरे लोग हैं। बस जरूरत यह है कि भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए सारे अच्छे लोग एकजुट हो जायें जैसे भ्रष्टाचार के लिए सारे बुरे लोग एकजुट हैं। ऐसा होते ही भारत महाशक्ति बन सकता है।


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