शादी समारोह से बच्चे ने चुराया 3 लाख का बैग !    फर्जी अंगूठा लगाकर मनरेगा के खाते से उड़ाये लाखों !    गुरु की तस्वीरों पर प्रकाश अाभा न दिखाने पर एतराज !    हरियाणा में 2006 के बाद के कर्मियों को भी ग्रेच्युटी !    पहले दिया समर्थन, अब झाड़ा पल्ला !    सप्ताह भर में न भरा टैक्स तो टावर होंगे सील !    पेंशन की दरकार, एसडीएम कार्यालय पर प्रदर्शन !    परियोजना वर्करों की देशव्यापी हड़ताल कल !    आईएस का हाथ था कानपुर रेल हादसे में !    आज फिर चल पड़ेगी नेताजी की कार !    

मुस्लिम नेतृत्व और भारत

Posted On January - 1 - 2011

सामाजिक समरसता

चित्रांकन संदीप जोशी

मौलाना वहीदुद्दीन खान देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित मुस्लिम विद्वान और इस्लाम के आध्यात्मिक राजदूत

मेरी राय में अगर भारत सभी मायनों में नहीं तो कुछ मायनों में तो पहले से ही महाशक्ति है। भारत आज भी दुनिया में आध्यात्म का केन्द्र है और इस मायने में वह विश्व-गुरु है। भारत एक जीवित लोकतंत्र है यह भी सच्चाई है। लेकिन अगर उन अर्थों और संदर्भों में महाशक्ति होने की बात करें जिन अर्थों और संदर्भों में हमें दुनिया की दो महाशक्तियों पहले सोवियत संघ और अमेरिका तथा अब सिर्फ अमेरिका, को समझने की आदत रही है तो कहना होगा कि भारत में महाशक्ति बनने की तमाम संभावनाएं मौजूद हैं। लेकिन जो एक कमी खलती है वह है कमजोर मुस्लिम नेतृत्व जबकि मेरा मानना है कि भारत को महाशक्ति बनने के लिए परिपक्व मुस्लिम नेतृत्व की बहुत सख्त जरूरत है।
मुझे नहीं पता और न ही मैं इतिहास में दखल देने की कोशिश करूंगा कि वह महान भारतीय राजनेता कौन था जिसने संविधान में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक जैसी अवधारणा को जगह दी। लेकिन मैं इस धारणा के ही पूरी तरह से खिलाफ हूं। यह समाजशास्त्र की दृष्टि से या इतिहास के नजरिये में सही है या गलत, मैं इस पर नहीं जाऊंगा लेकिन मुझे यह कहने में जरा भी हिचक नहीं है कि यह धारणा समाज को जोडऩे वाली नहीं बल्कि तोडऩे वाली है। जब हम किसी समुदाय को अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक के खांचे में डाल देते हैं तो एक तरह से उसमें सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक असुरक्षाबोध को भी तय कर देते हैं। जब कोई कहता है कि मैं माइनोरिटी से हूं तो यह एक किस्म के निम्नताबोध का प्रतीक होता है। वास्तव में माइनोरिटी शब्द से किसी को ताकत नहीं मिलती सिवाय मुट्ठीभर सियासी लोगों को जो इसकी रोटी सेंक कर अपनी गोटी फिट करते हैं। इसलिए भारत को महाशक्ति बनने के लिए इस अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक की धारणा, अवधारणा से मुक्त होना होगा।
अमेरिका में न कोई अल्पसंख्यक है, न कोई बहुसंख्यक है। जो भेद है वह रंगभेद का भेद है और उसे भी बड़ी कड़ाई से खत्म करने की पूरी कोशिश की गयी है। अमेरिका में सैकड़ों नस्लों और देशों के लोग हैं। मगर उनकी पहचान अल्पसंख्यकों व बहुसंख्यकों के रूप में नहीं है। वे सब अमेरिकन हैं। हमें भी यही सोच अपनानी होगी। महाशक्ति बनने के लिए हमें छोटे-छोटे मानसिक और सामाजिक दड़बों से बाहर आना होगा। एक बार हम अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक के शिकंजे से बाहर निकल गये तो फिर साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने के लिए अलग से कोई जरूरत नहीं होगी। जब कोई कम संख्या में या बहुत संख्या में होने का भाव ही नहीं रहेगा तो उस तरह का असुरक्षाबोध भी नहीं रहेगा जिस तरह का असुरक्षाबोध, जिस तरह का अल्पसंख्यकवाद, माइनोरिटी और मेजोरिटी की अवधारणा से पैदा होता है। तो देखा जाए तो हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए यह विचार बहुत फायदेमंद है कि न कोई अल्पसंख्यक है, न कोई बहुसंख्यक क्योंकि अल्पसंख्यकों को हमेशा बहुसंख्यकों से शिकायत रहती है और बहुसंख्यकों को हमेशा से अल्पसंख्यकों से ईष्र्या होती है। दोनों तमाम समस्याओं के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं और फिर पता चलता है कि यह सोच कितनी गलत है।
हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी तादाद में होने के बाजवूद मुसलमानों के अलावा अल्पसंख्यक होने की सोच और इससे होने वाला असुरक्षाबोध दूसरे अल्पसंख्यकों में नहीं है। आप जैनों को, सिखों को कभी यह कहते नहीं सुनेंगे हम अल्पसंख्यक हैं जो हमारी सबसे बड़ी समस्या है। दरअसल, इसकी बहुत बड़ी वजह है राजनीतिक नेतृत्व। मुसलमानों के पास दुर्भाग्य से कभी भी ऐसा राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं रहा जो उनमें बराबरी की भावना भरे या उन्हें बिना डर के रहने को प्रोत्साहित करे। मैं जब भी विदेश यात्रा पर जाता हूं तब विशेष तौर पर मुस्लिम देशों में लोगों को मेरी बातों से आश्चर्य होता है कि भारत में मुसलमानों पर किसी तरह का कोई संकट नहीं है। दरअसल, मुस्लिम राजनेता विदेशों में आमतौर पर हिन्दुस्तान की ऐसी छवि बनाते हैं कि जैसे भारत मुसलमानों के लिए बहुत बड़ा संकट हो। मेरी धारणा इसके उलट है। मैं पूरी दुनिया में डंके की चोट पर यह बात कहता हूं कि भारत मुसलमानों के लिए संकट नहीं बेहतरीन अवसर है। भारत में मुसलमानों के लिए कोई समस्या नहीं है। जो समस्या मुसलमानों के दिलोदिलाग में है वह समस्या मुस्लिम राजनेताओं और उर्दू मीडिया द्वारा पैदा की गयी है।
मुस्लिम राजनेताओं ने और मुस्लिमों का खास मीडिया यानी उर्दू मीडिया इन दोनों बड़े माध्यमों ने मुस्लिम जगत में एक गैर-जरूरी डर भर दिया है कि जैसे भारत मुसलमानों के लिए कोई बड़ा संकट हो जबकि सच यह नहीं है। सच यह है कि संकट का ढिंढ़ोरा पीटकर ये दोनों वर्ग जो मुस्लिमों के रहनुमा बनते हैं, उनसे अपनी दुकान चलाते हैं। उन्हें डर लगता है कि कहीं यह दुकान न बंद हो जाये। अगर वह सच्चाई का बयान करें। लेकिन मैं कहता हूं यह भी उनका नाहक डर है। अब मुझे लीजिए मैं हमेशा इन दोनों धारणाओं की मजम्मत करता हूं। पहली यह है कि मुसलमान अल्पसंख्यक हैं और दूसरी मुसलमानों के उर्दू मीडिया की शिकायत करने की आदत की। मुझे यह बात हमेशा खराब लगती है कि आप हमेशा शिकायत करते रहें। शिकायत करने से कभी किसी कौम का भला नहीं होता और न ही शिकायत करने वाले लोग सफल होते हैं, न राष्ट्र। इसलिए मुझे उर्दू मीडिया का शिकायती स्वभाव बिल्कुल पसंद नहीं। लेकिन जो मैं कह रहा हूं वह यह है कि साफगोई से अपनी बात कहने के बाद क्या मुझे इस देश में इज्जत और सम्मान नहीं हासिल? शायद ही आज मुसलमानों का कोई बड़ा नेता हो जिसे समाज में मुझसे ज्यादा इज्जत मिलती हो। लेकिन मुझे मुसलमानों को कभी यह कहने की जरूरत नहीं पड़ती कि तुम सब एक रहो क्योंकि अल्पसंख्यक हो। मैं जिस भी मंच में होता हूं अल्पसंख्यक के नाते नहीं होता, मैं उस मंच में एक भारतीय होने के नाते होता हूं और अंत मैं पाता हूं कि मैं मंच में केन्द्रीय महत्व हासिल कर रहा हूं। अभी पिछले दिनों मैं सरदारों के एक अंतर्राष्ट्रीय जलसे में शामिल हुआ और समारोह के अंत तक मंच में सबसे ज्यादा फोकस मुझ पर ही हो गया तो यह सोच की बात है।
मुस्लिम नेतृत्व को अपनी यह सोच बदलनी होगी तभी वह भारत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लायक समझे जायेंगे और इससे मुसलमानों का भी उत्थान होगा तथा देश भी मजबूत बनेगा। आज मनमोहन सिंह अल्पसंख्यक सिख होने के नाते देश के प्रधानमंत्री नहीं हैं। वे एक भारतीय होने के नाते देश के प्रधानमंत्री हैं। कोई भी योग्य व्यक्ति आज भारत का प्रधानमंत्री हो सकता है। कम से कम नयी पीढ़ी में इस तरह का आग्रह या दुराग्रह नहीं है कि अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक ही देश का प्रधानमंत्री बने। सवाल है यह सोच कहां से आये? यह सोच न तो आसमान से  टपकेगी और न ही किसी दिन खुद ब खुद आयेगी। यह सोच शिक्षा से आयेगी। यह डर शिक्षा से दूर होगा। मनमोहन सिंह अगर प्रधानमंत्री हैं और देश को सर्वमान्य हैं तो इसलिए कि मनमोहन सिंह शिक्षित हैं और शिक्षा के महत्व को समझते हैं। अगर आप योग्य हैं तो भले आप बहुत चमत्कारिक वक्ता न हों, बहुत बड़े जनसमूह को प्रभावित न करते हों लेकिन लोग आपको सुनेंगे। लोग आपकी इज्जत करेंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के पास और क्या पूंजी थी और क्या कला थी? यही तो उनके पास सबसे बड़ी पूंजी और कला हैं कि वह शिक्षित हैं, आधुनिक ख्याल हैं और चीजों को वैज्ञानिक, तार्किक ढंग से लेते हैं। आज नयी पीढ़ी के लिए यही बात महत्वपूर्ण है। इसीलिए मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हैं भले वह ताली बजाऊ भाषण देने में कच्चे हों।
बड़ा और वजनदार नेता वह है जो लोगों का नेतृत्व करे और लोग उसका अनुसरण करें जैसे गांधी थे। मुसलमानों में दुर्भाग्य से ऐसे नेता का हमेशा से अभाव रहा है जो बहुत बड़े मुस्लिम समुदाय द्वारा अनुसरण किया जाता हो। मुस्लिम लीडरशिप में कई जरूरी कारकों, तत्वों का अभाव है जो उन्हें बड़ा और समूचे राष्ट्र का मान्य मुस्लिम नेता नहीं बनने देता। लेकिन मैं कुछ महत्वपूर्ण कारकों पर ही फोकस करूंगा। दरअसल, मुसलमानों में किसी गंभीर और विजनरी राजनेता का इसलिए अभाव है क्योंकि मुस्लिम राजनीति में वह प्रक्रिया ही पूरी हुई जिसे नेतृत्व पूर्व की प्रक्रिया कहते हैं और यह किसी भी समुदाय के गंभीर राजनीतिक शिक्षण की मांग करता है। मुसलमानों में यह राजनीतिक शिक्षण का अभाव है। इसलिए मुस्लिम नेतृत्व अपने समुदाय को जमीनी सोच के अनुसार नेतृत्व करने की जरूरत नहीं समझता। सबसे पहले मजबूत मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के लिए जरूरी है कि मुस्लिम राजनीति रोजमर्रा की जमीन से जुड़ी समस्याओं से जुड़ें, न कि धर्म इस्लाम की चिंता में दोहरी हो। यह जमीनी जुड़ाव भी उसी एजुकेशन से आयेगा जिसका मुसलमानों में बड़ा अभाव है। देश के दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय शायद इसलिए भी अल्पसंख्यकवाद का परचम उठाकर नहीं चलते क्योंकि उनके यहां पढ़ाई-लिखाई का जोर है। जबकि मुसलमानों में पढऩे का महत्व नहीं समझा गया।
मुसलमानों में राजनीतिक नेतृत्व को परिपक्व बनाने और मजबूत करने के लिए जरूरी है कि मुस्लिम राजनेता अपना फोकस सेकुलरिज्म और लोकतंत्र जैसे तारीखी वजूद रखने वाले विषयों पर करें। इसके लिए मुस्लिम समुदाय का गहन राजनीतिक शिक्षण जरूरी है। इससे वह चेतना सम्पन्न बनेंगे और मुस्लिम नेतृत्व को भी चेतना सम्पन्न होने के लिए मजबूर करेंगे। जब ऐसा होगा तो वाकई वह सबसे बड़ा भारत उदय होगा। क्योंकि इससे भारत के एक बहुत बड़े समुदाय का उत्थान होगा, उदय होगा और भारत महाशक्ति में तब्दील होगा। लेकिन अगर हम यह कहें कि सिर्फ मुस्लिम सियासतदानों के चलते ही मुसलमानों का राजनीतिक शिक्षण हो जायेगा तो यह अपेक्षा कुछ ज्यादा ही बड़ी अपेक्षा होगी। इसके लिए मुस्लिम समुदाय के सभी अंगों को एकजुट होकर काम करना होगा। एकजुट होकर प्रयास करना होगा। इसमें मीडिया भी उतना ही महत्व रखती है और मुस्लिम बौद्धिक समुदाय भी। मेरा मानना है कि मौजूदा मुस्लिम मीडिया या कहें उर्दू मीडिया मुसलमानों की समस्याओं और उनके सरोकारों को जुबाने देने में नकामयाब रही है। इससे जिस महत्वपूर्ण भूमिका की उम्मीद  की जाती है उस भूमिका को यह बखूबी नहीं निभा सकी। मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व और मीडिया का आमतौर पर एक ही काम रहा है विरोध और शिकायत। यह शिकायत चाहे देश से हो, हिन्दुत्व से हो या हिन्दुत्व के कुछ फिरकों या दूसरे समुदायों से। यह वाकई बहुत ही नकारात्मक सोच है। याद रखिए कोई देश, कोई सरकार कभी किसी समुदाय को हाथ पकड़कर ऊपर नहीं उठाती। सरकार और देश बस इसके लिए माहौल और आधार दे सकते हैं और मैं नहीं मानता कि हिन्दुस्तान में इसकी कमी है। नकारात्मक सोच, नकारात्मक प्रतिक्रियाएं चीजों को बदलती नहीं हैं, ये चीजों को बदल भी नहीं सकतीं बल्कि चीजों को और ज्यादा खराब बनाती हैं, हिन्दुस्तान में ऐसा ही हुआ है। मेरा मानना है कि मुसलमानों का अगर उत्थान करना है तो मुसलमानों के बीच से एक सकारात्मक सोच वाली प्रभावी सियासी जमात पैदा करनी होगी। तभी हम इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।


Comments Off on मुस्लिम नेतृत्व और भारत
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

समाचार में हाल लोकप्रिय

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.