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विकास की विसंगति

Posted On January - 1 - 2011

भारत नहीं इंडिया है सुपर पावर

कमल नयन काबरा प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, देश का वैकल्पिक बजट पेश करने वाली टीम के सदस्य

चित्रांकन संदीप जोशी

कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गये। लेकिन यहां  किसी एक के हिस्से का कुछ लोगों ने सूरज नहीं खाया बल्कि भारत के 80 करोड़ से ज्यादा आम लोगों के हिस्से का कुछ सूरज चट किये बैठे हैं और अब वही लोग बराक ओबामा के कहे जाने के बाद हल्ला मचाये हैं कि अब तो भारत महाशक्ति हो चुका है। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि ओबामा की स्पीच अंग्रेजी में थी। इसलिए जो लोग कह रहे हैं कि ओबामा ने भारत को सुपर पावर कहा या उभर चुकी महाशक्ति कहा वह थोड़ा अनुवाद की गलती कर रहे हैं। उनकी स्पीच का एक संदर्भ था जिसमें भारत को ही नहीं उन तमाम देशों को जहां बाजारवादी व्यवस्था है, इमर्जिंग इकोनॉमी कहा जाता है। इसमें भारत और चीन को भी शामिल किया जाता है, रूस भी इसमें शामिल है और कई पुराने समाजवादी देश भी जहां आज बाजार अर्थव्यवस्था है।
मेरा मंतव्य यह है कि जब प्रेसीडेंट ओबामा ने भारत के संदर्भ में कहा कि भारत इमर्जिंग इकोनॉमी नहीं है, इमर्ज कर चुकी अर्थव्यवस्था है तो  उनके कहने का मतलब यह था कि भारत बाजारीकरण की तरफ बढ़ती अर्थव्यवस्था नहीं है  बल्कि बाजारीकृत हो चुकी अर्थव्यवस्था है। इसका सीधा संकेत था कि 20 साल पहले बाजारीकरण की जो प्रक्रिया शुरू की गयी थी, राज्य को समेटने और अर्थव्यवस्था को दुनिया भर के बाजारों के लिए खोलने की जो शुरुआत हुई थी, वह एक उच्चस्तरीय स्थिति तक पहुंच गयी है। अब भारत को भी बाजार अर्थव्यवस्था मानना पड़ेगा। खासकर जब अमेरिका में मंदी आयी तो उसका असर भारत में भी पड़ा भले यह ज्यादा न रहा हो। फिर भी यह साबित करता है कि भारत अब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है। यही कारण है कि जैसे पूंजीवादी देशों में बाजार का उतार चढ़ाव होता रहता है वैसा ही उतार-चढ़ाव अब भारतीय अर्थव्यवस्था की भी विशेषता बनने जा रही है। वास्तव में ओबामा जब भारत को इमज्र्ड इकोनॉमी कहते हैं तो उनका मतलब यही था।
लेकिन देखा जाए तो यह सच भले लगे लेकिन गजब का विरोधाभासी सच है। दुनिया आज भारत को विश्व अर्थव्यवस्था का बूस्टर इंजन कहती है और हम खुश हो जाते हैं कि हमीं अपने कंधे पर दुनिया की अर्थव्यवस्था का भार ढो रहे हैं लेकिन यह सच नहीं है। यह भ्रम है। क्योंकि जब जी-8 के देश जिन्हें हम बड़े देश कहते हैं, भारत को विश्व अर्थव्यवस्था का बूस्टर इंजन कहते हैं तो उनके ऐसा कहने के पीछे एक मकसद छिपा होता है। दरअसल दुनिया के बड़े-बड़े देशों विशेषकर जी-8 के देशों के अगुवा अमेरिका में जब वित्तीय क्षेत्र में संकट शुरू हुआ तो उसका असर जमीन-जायदाद के क्षेत्र में सबसे ज्यादा पड़ा। जब वित्तीय क्षेत्र लड़खड़ाये तो रोजगार में संकट आया, उत्पादन घटा। विश्व अर्थव्यवस्था खासकर अमेरिका और यूरोपीय संगठन के देशों की आर्थिक वृद्धि की दर कम हो गयी। इसकी वजह यह थी कि वहां मांग की कमी थी और आम लोगों का इन देशों की वित्तीय संस्थाओं पर से भरोसा उठ गया था। लोग यह नहीं तय कर पा रहे थे कि वह कौन सी परिसम्पत्तियां खरीदें और किस पर हाथ डालने का मतलब अपने हाथ जला लेना है। किस बैंक को कितना घाटा होने जा रहा है, किसका दीवालिया निकल चुका है या किसका निकलने वाला है।
हिन्दुस्तान को लेकर बाजार की खोज करना एक अटपटा और गलत प्रयास होगा, भले हिन्दुस्तान का मध्य वर्ग कितना ही बड़ा क्यों न हो। क्योंकि इस संदर्भ में सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि हिन्दुस्तान का मध्य वर्ग संख्या की दृष्टि से चाहे जितना बड़ा हो  लेकिन उसकी परचेजिंग पावर औसतन बहुत कम है।  सिर्फ 23 से 45 रुपये प्रति व्यक्ति, प्रतिदिन उनका खर्च है। नि:संदेह इनमें कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनकी परचेजिंग पावर 2000 रुपये प्रतिक्षण, प्रतिघंटे या प्रतिदिन भी है लेकिन ऐसे लोगों की संख्या सूक्ष्मतम से सूक्ष्मतम है। इसलिए हिन्दुस्तान में वे कोई बहुत मायने नहीं रखते।  हां, हिन्दुस्तान में 1990-91 के बाद से लगातार आयात में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। आयात की एक सुनामी आ गयी है। पिछले तीन सालों से तो स्थिति यह हो गयी है कि हिन्दुस्तान में हमारे अपने कल-कारखानों में हम जितना उत्पादन करते हैं, उससे कहीं ज्यादा आयात करते हैं। हमारी औसत टैरिफ दर बहुत कम हो गयी है। खासकर 90 के दशक के मुकाबले में अब यह 11-12 प्रतिशत रह गयी है जबकि आप औसतन एक्साइज ड्यूटी देखेंगे तो वह इससे ऊंची है।
इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि हम बाहर के माल पर कम ‘कर’ लगाते हैं और अपने माल पर ज्यादा लगाते हैं। धीरे-धीरे सारे नियंत्रण खत्म कर दिये हैं। छोटे उद्योगों को जो संरक्षण दिया हुआ था वह सब खत्म कर दिया है। डब्ल्यूटीओ में हम अभी भी कह रहे हैं कि तुम थोड़े से कंसेशन दे दो हम कानकुन को मानने को तैयार हैं। कहने का मतलब यह है कि ओबामा की यात्रा में यह आम मध्य वर्ग निशाने पर नहीं था बल्कि वह छोटा सा तबका निशाने पर था जो अति, अति सूक्ष्म है। क्योंकि इसके पास व्यापक तौर पर विशाल वित्तीय परिसंपत्तियां हैं। ध्यान दें चीन के पास डॉलर हैं। चूंकि हिन्दुस्तान में रुपये की पूर्ण परिवर्तनीयता नहीं की गयी है, यहां टे्रड एकाउंट यानी जो करेंट एकाउंट है वह तो पूरी तरह से खोल दिया गया है। आप कई तरह के बार में कंपनियों को खरीद सकते हैं। बैंक खाते खोल सकते हैं। शेयर बाजार में पैसा लगा सकते हैं। करेंसी टे्रड यानी मुद्र्राओं के उतार-चढ़ाव वाले कारोबार में हिस्सा ले सकते हैं। तो ओबामा जिस हिन्दुस्तान की बात कर रहे थे वह बहुत छोटा-सा बाजारीकृत तबका है। हिन्दुस्तान का बाजार कोई करोड़ों लोगों का बाजार नहीं है। ज्यादा से ज्यादा भारत में 4-5 लाख असली कंपनियां हैं, बाकी सब लिफाफा कंपनियां हैं। ओबामा वास्तव में इस वर्ग और इनमें भी जो अपर वर्ग है—100, 200 कंपनियों वाला वर्ग, उनकी ही बात कर रहे थे कि वे ‘बूस्टर इंजन’ हैं विश्व अर्थव्यवस्था के। इसलिए हमें इस बात का गुमान नहीं पालना चाहिए कि समूचा भारत ताकतवर हो गया है। हां, भारत का एक तबका जरूर सुपर पावर हो चुका है और इसे आप इंडिया कह सकते हैं, भारत नहीं।
याद रखें ओबामा के विजिट के पहले वहां की जो सेक्रेटरी ऑफ स्टेट (विदेश मंत्री, हिलेरी क्लिंटन) हैं, उन्होंने पिछले साल ही हमें धन्यवाद दिया था कि आपकी कंपनियों (उद्योगपतियों) ने हमारी डूबती हुई कंपनियों को खरीदा, जिससे 30 से 40,000 नौकरियां पैदा हुईं। कुल मिलाकर वह यह चाहते हैं कि हिन्दुस्तान की कंपनियां वहां की कंपनियों (डूबती हुई को) को खरीदें। वहां के वित्तीय निवेश में जाएं। वहां के शेयर बाजार में जाएं। दूसरा उनका जो उद्देश्य था; बाजार तो वह नहीं बढ़ा सकते; लेकिन यह तय है कि जब तक वह पाकिस्तान को हथियारों की सप्लाई करते रहेंगे तब तक भारत का हथियारों में खर्च कम नहीं हो सकता बल्कि बढ़ेगा ही। अगर अमेरिका पाकिस्तान को 100 मिलियन डॉलर के हथियार देगा तो भारत को स्वत: 120 मिलियन डॉलर के हथियार खरीदने पड़ेंगे। इसीलिए वह कश्मीर के मामले में पाकिस्तान को कहते हैं लग लग और भारत को कहते हैं, जग जग।
इस तरह देखा जाए तो हमारी मदद के मामले में उसका जो निवल योगदान है, वह नकारात्मक है। अमेरिका ने हिन्दुस्तान के खिलाफ कश्मीर पर, गोवा पर यूएनओ का रिजोल्युशन तय किया है। अभी भी वह उस नीति से कोई दूर नहीं चला गया। याद करिये राष्ट्रपति बनने से पहले प्रेसीडेंट ओबामा ने कश्मीर के बारे में क्या कहा था? इसलिए सीधी बात यह है कि जब वह हिन्दुस्तान के बारे में कहते हैं कि हिन्दुस्तान उभरती हुई नहीं बल्कि एक उभर चुकी शक्ति हो चुका है तो उनका आशय मुट्ठी भर हिन्दुस्तानी उद्योगपतियों को अमेरिका में आकर निवेश करने के लिए आह्वान करना होता हैै ताकि वह मंदी के उस चक्रव्यूह से निकल सके, अभिमन्यु की तरह जिससे बाहर निकलने का उसे रास्ता नहीं मालूम।
उनके लिए कुछ फर्क नहीं पड़ता कि हिन्दुस्तान चाहे आणविक एनर्जी के रूप में खरीदारी करे या कोई और तरीका अपनाए पर ऐसा कुछ हो जरूर जो उनके यहां की बेरोजगारी को कम करे जबकि हमारे यहां अमेरिका से हजारों गुना ज्यादा बेरोजगारी की समस्या है। फिर भी हम उनके इस चढ़ावे पर फूले नहीं समाते कि हम महाशक्ति बन चुके हैं और इसी खुशी में हम अमेरिका को 40 से 50 हजार नई नौकरियों का तोहफा दे देते हैं। मगर इस नव उदारीकरण से रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता। भारतीय शासक भले ओबामा के सर्टिफिकेट पर फूले नहीं समा रहे हों मगर हकीकत यह है कि ओबामा के कह भर देने से भारत महाशक्ति नहीं बन जायेगा।
सरकारी आंकड़े और रिपोर्ट ही कहती है कि भारत में 40 करोड़ से ज्यादा लोग आधे डॉलर से भी कम में पूरे दिन का गुजर-बसर करते हैं। कई गैर सरकारी अध्ययन तो इससे भी ज्यादा भयावहता की ओर इशारा करते हैं लेकिन कुछ लाख या करोड़ हमारे यहां ऐसे उपभोक्ता भी हैं जो अपनी ऊब मिटाने के लिए शॉपिंग को अपनी हॉबी बनाते हैं। उन्हें यह नहीं समझ आता कि क्या खरीदकर पैसा खर्च करें? जाहिर है अमेरिका या ब्रिटेन हमें सिर्फ इसलिए महाशक्ति कहकर खुश कर रहे हैं कि हम उनकी बीमार अर्थव्यवस्था को भला-चंगा करने में अपनी ताकत झोंक दें। इससे ज्यादा इनका और कोई मकसद नहीं है। इसलिए इनके इस इनाम पर बहुत खुश होने की जरूरत नहीं है। हां, इससे प्रेरित जरूर हुआ जा सकता है कि भारत में महाशक्ति बनने की सभी परिस्थितियां मौजूद हैं। बस हमें एक जनोन्मुख और ईमानदाराना नेतृत्व चाहिए।


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