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सामाजिक असंतोष

Posted On January - 1 - 2011

माओवाद और महवाकांक्षाएं

स्वामी अग्निवेश अंतर्राष्ट्रीय शांति परिषद के सदस्य, मानवाधिकार कार्यकर्ता तथा केन्द्र सरकार व माओवादियों के बीच मध्यस्थ

चित्रांकन संदीप जोशी

कोई देश चाहे कितना ही ताकतवर हो, संसाधनों के मामलों में चाहे जितना ही सम्पन्न हो लेकिन अगर वह आंतरिक स्तर पर अशांत है तो वह महाशक्ति नहीं बन सकता। हमारा जीडीपी, हमारा जीएनपी भले ही बहुत तेजी से बढ़ रहा हो। हमारे मध्यवर्ग की क्रयशक्ति भले ही दिन दूनी रात चौगुनी दर से मजबूत हो रही हो लेकिन देश में आंतरिक अशांति लगातार बढ़ रही है। अलगाववाद, आतंकवाद देश के लिए अब महज चुनौती ही नहीं रहे बल्कि जबरदस्त खतरा बन गये हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि अपनी ताकत को लेकर माओवादी हवाई किले बांध रहे हैं मगर ठीक इसी समय यह भी सच है कि केन्द्र सरकार भी पूर्वाग्रही है। एक तरफ तो हमारे गृहमंत्री और प्रधानमंत्री यह कह रहे हैं कि देश के लिए आतंकवाद से भी बड़ा खतरा माओवाद है दूसरी तरफ यह भी सच्चाई है कि माओवाद से निपटने के लिए केन्द्र सरकार का नजरिया तंग है। यह माओवादियों को ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर बता रही है। अब देखिए केन्द्र सरकार माओवाद से ग्रस्त 60 जिलों में 25-25 करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है। थोड़े दिनों में उसे बढ़ाकर प्रति जिला 30 करोड़ रुपये कर दिया जायेगा। यह सारी कवायद इस बिनाह पर होने जा रही है कि इन जिलों को माओवाद के प्रभाव से मुक्त कराना है। यह पैसे खर्च करने की घोषणा चिढ़ाने वाली है। आन्दोलनकारियों (यानी माओवादियों) को लगता है जैसे सरकार धमकी दे रही हो कि हम पैसे के बल पर तुम्हें खत्म कर देंगे जबकि वास्तविकता यह है कि इससे पहले ये इससे कई गुना ज्यादा पैसा खर्च कर चुके हैं। विकास के नाम पर, सुरक्षा के नाम पर लेकिन आज तक यह पैसा वहां पहुंचा ही नहीं है। अब इनके पास कौन-सा वह जादुई चिराग है जिससे यह पैसा, वे जहां पहुंचाना चाहते हैं, पहुंचा देंगे? सरकार भले ही कहे कि वह शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं इस पैसे से बेहतर बनाएगी मगर सच यही है कि ऐसा नहीं होगा। जरूरतमंदों तक ये सेवाएं नहीं पहुंचेंगी।
दरअसल माओवाद से निटपना है तो पहले केन्द्र और राज्य सरकारों को यह समझना होगा कि वास्तव में मूल समस्या क्या है? मूल समस्या यह है कि इन्होंने यानी सरकारों ने (चाहे वह केन्द्र की सरकार हो या राज्यों की) इन इलाकों के लोगों से जो मूल अधिकार छीने हैं, पिछले 60 सालों में जिस तरह से उन्हें विपन्न बनाया है विशेषकर जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को छीनकर। सरकार को सबसे पहले इन लोगों के ये अधिकार बहाल करने चाहिए। आदिवासियों को सरकार सिर्फ उनके ये मूल अधिकार वापस लौटा दे, बस कोई पैसा झोंकने की जरूरत नहीं है। वहां शांति आ जायेगी। आदिवासी विद्रोह का रास्ता छोड़ देंगे। आप सिर्फ आदिवासियों के इलाके से सरकार को हटा दीजिए। सरकार यानी पुलिस महकमा, आबकारी विभाग और फारेस्ट रेंजर्स को आदिवासियों के इलाकों से हटा दीजिए, सारी समस्या अपने आप खत्म हो जायेगी। क्योंकि इन सरकारी विभागों ने स्थानीय आदिवासियों का जो जबरदस्त शोषण किया है उससे समस्या और भयानक हुई है। आज अगर आदिवासी इलाकों में सरकार के प्रति इस कदर अविश्वास है तो इसकी बहुत बड़ी वजह सरकार के तथाकथित प्रशासनिक महकमों का शोषण और आदिवासियों पर उनके जुल्म हैं। आदिवासी इलाकों में भयानक एलिनेशन है। लोगों में जबरदस्त गुस्सा है। इसी गुस्से की यह परिणति है। माओवाद इसीलिए फल-फूल रहा है। हमें यह समझना होगा तभी हम समस्या का समाधान निकाल पायेंगे।
हालांकि ऐसा नहीं है कि आम लोगों को बरगलाने का काम केवल केन्द्र व राज्य सरकारें ही कर रही हैं। सच्चाई यह भी है कि माओवादी भी यही कर रहे हैं। दोनों ही कह रहे हैं कि वे जनता के हितैषी हैं और जनता की बेहतरी के लिए ही खूनखराबा कर रहे हैं। हो सकता है अंतिम लक्ष्य में ये दोनों ही सही हों। यह भी हो सकता है कि अंतिम लक्ष्य दोनों का एक ही हो और यह जनता की भलाई या बेहतरी ही हो। लेकिन माओवादियों ने हथियार उठा रखा है जबकि सरकारें उन्हें कुचल डालने के लिए कई गुना ज्यादा ताकत से लैस हैं। हालांकि हाल के सालों में अब शक्ति संतुलन गड़बड़ा गया है। आज माओवादियों के पास सरकारी मशीनरी से कहीं उन्नत हथियार हैं। साथ ही उनके पास जंगल में लडऩे की बेहतर रणनीति भी है जिस कारण वह सरकारी मशीनरी—पुलिस और अद्र्ध सैनिक बलों पर भारी पड़ते हैं।
मगर यह निराशाजनक है। सिर्फ माओवादी ही अपनी जिद पर नहीं अड़े सरकार भी ऐसी किसी सम्भावना को फलीभूत नहीं होने देना चाहती। सरकार न केवल जानबूझकर इस सबको नहीं समझ रही बल्कि कहना चाहिए कि उस दिशा में जो प्रयास हो रहे हैं, उन्हें निष्फल भी कर रही है। जैसे आजाद का मारा जाना। यह एक विश्वासघाती कदम था। ऐसा नहीं है कि यह नासमझी में उठा लिया गया कोई कदम हो। जानबूझकर ऐसा किया गया। आपने वार्ता के नाम पर एक शगूफा छोड़ा। इससे वह बाहर निकला और आपने उसे खत्म कर दिया। जब मेरी दूसरी चिट्ठी जा रही थी तो जो उसे लेकर जा रहा था, उसे भी सरकारी मशीनरी घेरकर मार डालना चाहती थी। मगर उसकी किस्मत अच्छी थी कि वह बचकर चला गया। कहने का मतलब यह है कि सरकार में बैठे लोग शांति के प्रति कतई ईमानदार नहीं हैं। फिर चाहे  वह केन्द्र सरकार में बैठे लोग हों या राज्य सरकारों के लोग। इसके पीछे वजह चाहे जो भी हो।
हालांकि मुझे पता है माओवादी क्रांति की बात करते हैं, बंदूक की बात करते हैं, बीच का कोई रास्ता न होने की बात करते हैं। लेकिन अंतत: माओवादी आन्दोलनकारियों को भी एक दिन यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इस देश को यह मिलाजुला रास्ता ही स्वीकार होगा। हो सकता है यह हमारी भावना अभी कारगर न दिख रही हो पर मुझे लगता है कि ऐसा होगा क्योंकि माओवादियों को भी अब यह रियलाइजेशन होने लगा है कि जहां तक वह जा सकते थे, जा चुके। अब वह यह चाहें कि पूरे देश में उनके समर्थक पैदा हो जाएं  यह संभव नहीं है। जहां पर ऐसी परिस्थितियां नहीं हैं, जंगल, आदिवासी, पहाड़ और छापामारी युद्ध के अनुकूल स्थितियां नहीं हैं जो माओवादी संघर्ष को अनुकूलता प्रदान करती हैं। वहां माओवादी अपना आधार विकसित नहीं कर सकते। फिर भले यहां वही तमाम समस्याएं हों—गरीबी, बेरोजगारी,
भुखमरी की जो समस्याएं आदिवासी इलाकों में हैं वहां माओवादी मजबूत हैं। दरअसल
जिस तरह की व्यूहरचना के चलते माओवादी दण्डकारण्य या जंगल महल में सुरक्षाबलों
पर भारी पड़ते हैं। उस तरह की परिस्थितियां न तो पूरे देश में संभव हैं और न ही माओवादियों का दिल्ली तक पहुंचना संभव है।
कुछ लोग मुझसे सवाल करते हैं कि बीच-बीच में माओवादियों की महत्वाकांक्षाओं का जो खाका मीडिया के जरिये देश के सामने आता है कि उन्होंने 9 प्रदेशों में लाल गलियारा बना लिया और 2020 तक दिल्ली में लाल परचम फहरायेंगे, वह माओवादियों की हताशा का काला चिट्ठा है या सरकार द्वारा उन्हें बदनाम करने का षड्यंत्र? मैं कहता हूं कि यह दोनों हो सकता है। सरकार अपने दमन को जस्टिफाई करने के लिए तथ्यों को तोड़ती-मरोड़ती और स्थितियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है तो दूसरी तरफ उनको यानी माओवादियों को यह सूट करता ही है। वह सरकार की इस अति बयानी का खूब फायदा उठाते हैं और मीडिया के माध्यम से अपने समर्थकों को यह संदेश देने की होशियारी बरतते हैं कि देखो हम कितने ताकतवर हो गये हैं। अब दिल्ली दूर नहीं है इसलिए हमारे जुल्म को अनदेखी कर दो। हमारे अतिवादी रास्ते पर सवाल मत खड़े करो सिर्फ हमारा साथ दो।
आज भारत का हर कोना अशांत है। हम अशांत भारत के होते हुए विश्व के नक्शे में महाशक्ति के रूप में नहीं उभर सकते। और हां महाशक्ति के जो पारंपरिक आशय आज हैं उस अर्थ में हमें महाशक्ति बनना भी नहीं चाहिए। विशेषकर सुरक्षा परिषद की पृष्ठभूमि में। हमें बिल्कुल अलग तरह की महाशक्ति बनना चाहिए। भारत को अपने विकास की अवधारणा ही  नयी किस्म की निकालनी चाहिए। हमें बिल्कुल मौलिक अवधारणा लेकर चलना चाहिए। हमारे रग-रग में जो आध्यात्मिकता है, वह भी उस अवधारणा का हिस्सा होनी चाहिए जिसे संक्षेप में ‘सादा जीवन उच्च विचार’ हम लोग कहते हैं। कंज्यूमरिज्म की खाओ, पीओ मौज उड़ाओ वाली जीवनदृष्टि तथा मशीनीकरण, स्वचालितीकरण का इसमें वर्चस्व नहीं होना चाहिए।


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