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वन वूमैन आर्मी

Posted On October - 6 - 2011

रूपिन्दर सिंह और विभा शर्मा

साहसी और करिश्माई यह एक महिला हैं, जिन्होंने जीवन अपनी शर्तों पर जिया है। वह कैमरों को आकर्षित करती हैं, पिछले दिनों उन्होंने भीड़ के साथ कार्य करने की अपनी क्षमता दिखाई है और इस प्रक्रिया में राजनीतिज्ञों को कु्रद्ध भी किया है।
मंच पर राजनीतिज्ञों का चित्रण (नकल) करते उन्हें कुछ भी गलत नहीं लगता, जैसा कि उन्होंने पिछले दिनों भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान में किया, जिसमें उन्होंने अग्रिम भूमिका निभाई। लेकिन किरण बेदी (62) किसी भी चीज के लिए शर्मिंदा होने के लिए नहीं जानी जाती, चाहे यह आगे बढ़कर भीड़ को संभालना हो, प्रधानमंत्री के काफिले की गलत ढंग से पार्क की गई कार के विरुद्ध की गई कार्रवाई हो या तिहाड़ जेल, जहां वह पुलिस महानिरीक्षक के रूप में नियुक्त थीं, के सुधार हों। करिअर के आरंभ में उन्हें ‘बौबी गो बैक’ के नारे छात्रों से सुनने पड़े, हालांकि प्रहार करने पर वे पीछे हट गए। फिर उन्हें ‘क्रेन बेदी’ की उपाधि मिली और अंत में मिला प्रतिष्ठित मैगसेसे पुरस्कार।
किरण पेशावरिया अमृतसर में पली-बढ़ीं। बड़े परिवार की सुख-सुविधाओं और सुरक्षा में उन्होंने जीवनयापन किया, जिस परिवार के पास जमीन, एक धर्मशाला और वोल्गा तथा सैवी जैसे होटल थे। किरण के अनुसार, ‘अमृतसर मेरे आगे बढऩे के लिए सुरक्षित और साफ-सुथरा स्थान था।’ वह सेक्रेड हार्ट स्कूल और राजकीय महिला कालेज में शिक्षित हुईं। उन्हें तथा उनकी तीन बहनों को टेनिस कोर्ट इत्यादि की सुविधा भी उपलब्ध थी, जिसका उन्होंने प्रतियोगिताएं जीतने और यात्राएं करने में भरपूर लाभ भी उठाया।  वह याद करती हुई बताती हैं, ‘टेनिस खेलते हुए ही प्रथम बार उनका सामना खेल इकाई के कुछ अधिकारियों के भ्रष्टाचार से हुआ और अधिकारियों के कारण ही उन्हें कई बार अवसर गंवाना पड़ा। अमृतसर के बाद पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ पहुंची, जहां उन्हें अकादमिक और खेल दोनों में छात्रवृत्ति प्राप्त हुई। चंडीगढ़ में वह प्रो. जैसी आनंद और एमएम पुरी इत्यादि अध्यापकों से राजनीति शास्त्र में एमए में पढ़ीं।’
वह भारत की प्रथम महिला पुलिस अधिकारी बनीं और उन्हें पुरुषों की दुनिया में सदैव यह सिद्ध करने में कड़ी मेहनत करनी पड़ी कि वह उनके समकक्ष हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं, जिन्होंने उन्हें परंपरागत साड़ी या सलवार कमीज दुपट्ïटा में देखा है। टेनिस कोर्ट पर वह शॉट्ïर्स पहनती रहीं। वर्दी में होने पर पैंकुर्ता या शर्ट या फिर उनके टीवी शो किरण की अदालत की तरह पठानी शैली का सूट वह पहनती हैं।  अनेक बार उनके पुरुष साथियों ने उन पर महिला होने के कारण अनुचित लाभ होने के आरोप भी लगाए। एक वरिष्ठï आईपीएस अधिकारी के अनुसार ‘उनके महिला होने का उन्हें लाभ रहा, न कि हानि। 1973 में गणतंत्र दिवस की परेड के दौरान एक पुलिस टुकड़ी का प्रमुख एक महिला को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने अगले ही दिन किरण बेदी को नाश्ते के लिए आमंत्रित कर लिया। क्या किसी पुरुष अधिकारी को ऐसा विशेषाधिकार मिलता।’ वह उस समय भी मीडिया की ताकत जानती थी जब 24 घंटे चलने वाले चैनल नहीं थे। 1982 में एशियन गेम्स के दौरान भी उन्होंने मीडिया का प्रभावशाली प्रयोग किया। उस समय वह दिल्ली में डीसीपी (ट्रफिक) थीं। दिल्ली में जंतर-मंतर पर 14 नवंबर, 2010 को ‘इंडिया अंगेस्ट करप्शन’ की रैली में वह अन्ना हजारे से पहली बार मिली थीं और उनके मीडिया मैनजमेंट का अन्ना टीम ने भरपूर उपयोग किया। अन्ना की भूख-हड़ताल के दौरान राजनीतिज्ञों से वार्ता में उन पर कड़ा रुख अपनाने का ठप्पा भी लगा। उन्होंने नाम लेकर राजनीतिज्ञों की आलोचना की।
अपने करिअर के दौरान विभिन्न विवादों में रही किरण बेदी के लिए राह हमेशा आसान नहीं थी। उनका कई बार तबादला भी हुआ। जब वह चंडीगढ़ में पुलिस महानिरीक्षक के पद पर तैनात थीं तब उन पर आरोप लगा कि उन्होंने कनिष्ठï अधिकारियों को प्रशासन की अवहेलना के लिए उकसाया। अपनी नियुक्तिओं के दौरान दो बार तो उन्हें अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं करने दिया गया। एक वरिष्ठï पुलिस अधिकारी ने बताया कि एसपी गोवा तथा डीआईजी रेंज (मिजोरम) का पद उन्होंने बिना अनुमति के छोड़ दिया।
इन सबके बावजूद किरण बेदी प्रेरणादायी चर्चित शख्सियत बनी रहीं। 1977 में उन्होंने दिल्ली में अकाली-निरंकारी दंगे बंद करवाए। 1979 में 200 साल पुराने अवैध शराब  व्यापार पर नकेल कसी। 1985 में डीएसपी (हैड क्वार्टर) की तैनाती के दौरान एक ही दिन में पदोन्नति के 1600 लंबित केस निपटाए। उन्होंने निर्देश जारी किए कि यदि किसी केस को तीन दिन में नहीं निपटाया गया तो संबंधित व्यक्ति को खुद हाजिर होकर सफाई देनी होगी। 1993 में तिहाड़ जेल में पुलिस महानिरीक्षक के पद पर तैनाती के दौरान उन्होंने जेल का कायाकल्प ही कर दिया।
किरण बेदी के प्रशंसकों में सुप्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह भी हैं। इन सबके के बावजूद वह अपने पारिवारिक जीवन को बखूबी निभा रही हैं। उनके पति बृज बेदी अमृतसर में व्यवसायी हैं। इनकी एक बेटी है। उनकी माता का 1999 में निधन हो गया था। पिता किरण बेदी के साथ रहते हैं। बेदी का अपनी बहनों से प्रगाढ़ संबंध है। उनकी एक बहन कनाडा में फिलोसफी पढ़ाती हैं। पुलिस से सेवानिवृत्ति के बाद वह नवज्योति तथा इंडिया विजन फाउंडेशन नामक एनजीओ का संचालन कर रही हैं।


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