नाहन शहर नगीना, जो आए एक बार, वो जाए कभी न।
कभी नगीना कहा जाने वाला नाहन शहर आज सरकारी उपेक्षा व उचित रख-रखाव के अभाव में अपनी पहचान खोता जा रहा है। यहां की प्राचीन इमारतें धीरे-धीरे खंडहर में बदल रही हैं। सिरमौर जिले का मुख्यालय होने के बावजूद यह विकास के क्षेत्र में अभी भी पिछड़ा हुआ है। भीड़-भाड़,शहरी-शोर-शराबे और प्रदूषण का पर्याय बना नाहन आज से करीब 436 वर्ष पूर्व तत्कालीन सिरमौर रियासत के 33वें महाराजा कर्म प्रकाश का बसाया हुआ है।
इसके नामकरण के पीछे एक दिलचस्प कहानी है— कहते हैं कि किसी समय यहां बहुत घना जंगल था जिसमें बहुत से शेर और तरहï-तरह के जंगली जानवर विचरण करते थे। एक बार महाराजा कर्म प्रकाश सिंह जब इस जंगल में शिकार खेलने आए तो एक शेर को मारने के लिए उन्होंने जैसे ही बाण चढ़ाया तो वहां तपस्या में लीन एक बाबा ने जोर से चिल्लाकर कहा —’ ना-हन्’ अर्थात् मत मारो। तब राजा ने अपना धनुष बाण नीचे रखा और बाबा के चरणों में नत्मस्तक हो प्रणाम किया और बाबा के आग्रह पर यहां एक शहर बसाने का वादा किया और उसका नाम ‘नाहन’ रख दिया।
शहर के बीचों-बीच राजा द्वारा निर्मित भव्य महल कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। किसी समय भव्य महलों में गिना जाने वाला यह राजमहल आज उपेक्षा, उचित रख-रखाव के अभाव में अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। रानीताल बाग में रानियां अपनी दासियों व सखियों के साथ सैर करने व स्नान करने आया करती थीं। राजमहल से रानीताल बाग तक एक सुरंग थी परंतु अब वह भी टूट-फूट चुकी है और उसमें झाड़-झंखाड़ उग आए हैं और अब उसके अवशेष मात्र ही बचे हैं। किसी समय जोहड़ व तालाबों का शहर कहे जाने वाले नाहन के तालाब आज गंदगी के पर्याय बन गये हैं। लोगों द्वारा फेंके गए कूड़े-कर्कट व पॉलीथीन की रंग-बिरंगी तैरती थैलियां नाहन शहर की सुंदरता को मुंह चिढ़ाती नजर आती हैं। हालांकि कुछ स्वयं-सेवी संस्थाओं के ईमानदार प्रयासों से पक्का तालाब, फाउन्ड्री तालाब, रानी ताल तालाब आदि की साफ-सफाई व सौंदर्यीकरण हुआ है, फिर भी गाहे-बगाहे लोग उनमें कूड़ा-कर्कट फेंक कर उसे गन्दा करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते हैं।
शहर का दिल चौगान-मैदान रियासत काल से ही सांस्कृतिक समारोहों के आयोजनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। आज भी जिला स्तर या प्रदेश स्तर पर होने वाले खेल तथा विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम इसी मैदान में होते हैं। परन्तु पर्याप्त देखभाल व समुचित रख-रखाव के अभाव में यहां समारोहों के आयोजनों में दिक्कत होती है। हालांकि कुछ समय से प्रशासन के सहयोग व दिलचस्पी की वजह से यहां पर्याप्त देखभाल व साफ-सफाई रहती है व विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल, मेले, प्रदर्शनियों आदि का आयोजन बखूबी होता रहता है फिर भी सारा दोषारोपण प्रशासन पर ही करना उचित नहीं है। प्रशासन के साथ-साथ नागरिकों का भी यही कर्तव्य बनता है कि वे जब यहां घूमने आएं या अपने बच्चों को खेल खिलाने लाएं,खासतौर पर ग्रीष्म-ऋतु में, तो वहां कूड़ा-कर्कट, छिलके इत्यादि न फेंकें।
- विजय रानी बंसल