जोहानिसबर्ग, 23 सितंबर (भाषा)। हिंदी के उत्थान के लिए उसे जनसाधारण की भाषा बनाने और सरकारी फाइलों से बाहर निकालने की मांग करते हुए यहां विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी विद्वानों ने पुरजोर तरीके से इस बात को रेखांकित किया कि केवल हिंदी के जरिए ही देश में लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की जा सकती है।
इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए हिंदी भाषा के तकनीकी और शैक्षणिक विशेषज्ञों ने इस क्षेत्र में नए अनुसंधान को बढ़ावा देेने और नवीन तकनीक तक जन साधारण की पहुंच सुनिश्चित किए जाने पर बल दिया।
जनसाधारण और हिंदी भाषा के बीच की बढ़ती दूरी के लिए ‘हिंदी के सरकारीकरण’ को जिम्मेदार ठहराते हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में विद्वानों ने आज कहा कि सरकार की फाइलों पर चलने वाली भाषा कभी जनसाधारण की भाषा नहीं बन पाती है।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति और प्रख्यात कथाकार विभूति नारायण ने सम्मेलन में ‘महात्मा गांधी की भाषा दृष्टि और वर्तमान का संदर्भ’ विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा, ‘सरकार की फाइलों पर चलने वाली भाषा कभी जन साधारण की भाषा नहीं बन पाती है।’
उन्होंने कहा कि जब हम गांधी जी की भाषा दृष्टि पर सोचते हैं तो हमें सबसे पहले दूसरी भाषाएं सीखने के प्रति उदार होना होगा।
महात्मा गांधी द्वारा गुजरात के भरूच में हिंदी भाषा को लेकर उठाए गए पांच सवालों का जिक्र करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने हिंदी समाज की खामियों पर कहा कि हमने अपनी बोलियों और उर्दू से एक तरह से कन्नी काट ली है।
प्रख्यात आलोचक विजय बहादुर सिंह ने कहा कि गांधी जी आज की पीढ़ी के लिए बीते दिनों के हो गए हैं जबकि सच्चाई यह है कि आज भी हम विचार के लिए गांधी जी के पास ही जाते हैं क्योंकि गांधी की चेतना की डोर समाज से जुड़ी हुई थी।
नेल्सन मंडेला सभागार के नीति कक्ष में आयोजित तकनीकी सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि हिंदी भाषा में एकरूपता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा के प्रसार के लिए आम आदमी को ध्यान में रखकर सहज तकनीकी उपकरण विकसित किए जाने की जरूरत है।
दक्षिण अफ्रीका में हिंदी की अलख जगाने वाले हिंदी के कीर्ति स्तंभ पंडित नरदेव नरोत्तम वेदालंकार की प्रतिमा का भी आज यहां ‘गांधीग्राम’ के नेल्सन मंडेला सभागार में अनावरण किया गया।
इस सत्र में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि भोपाल के कुलपति प्रोफेसर वी के कुठियाला, गोवा विवि के डीन डा रविन्द्र मिश्र, दिल्ली विवि के डा कमल कुमार, जामिया मिलिया विवि के प्रोफेसर अब्दुल बिस्मिल्लाह और डा राजनारायण शुक्ल ने भी अपने विचार व्यक्त किए।