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फिर भीगी चूनर वाली

Posted On March - 26 - 2013

सुरेखा शर्मा
हर स्पन्दन में जागा यौवन
सखि रे ऐसा आया फाल्गुन

सच ही फाल्गुन की बहती बयार,पेड़ों से फूटती कोंपलें, गुलाबी मौसम, फसल पकने को तैयार मानव मन को उल्लास के हिलोरे देने के लिए काफी है। ऐसे में ताल  हो, लय हो, गीत हो और रंग हों तो होली तो स्वयंमेव ही आ गयी समझो। धरती रंगीली, आसमान गुलालमय, रंगों से भरी पिचकारियों के बीच मन झूम कर यही कहे—
‘कान्हा फिर आइयो, खेलन होरी’
सदियों से चली आ रही है होली।
मुगल काल में भी इस पर्व पर संध्या समय संगीत मेला लगता था। लाल किले के पीछे से लेकर राजघाट तक होली मेला लगता था। इस दिन शहंशाह व राजकुमारों को भी नहीं बख्शा जाता था। बड़े उत्साह व उमंग के साथ सभी मिलकर रंगीली पोटलियां, प्यार के साथ एक-दूसरे पर डालते थे।
होली के पर्व की कुछ परम्पराएं समान रूप से पूरे देश में प्रचलित हैं जिनमें से मुख्य हैं ‘होलिका दहन’ कहीं पर नई फसल के आगमन से व कहीं पर भक्त  प्रह्लाद द्वारा अपनी बुआ  को अग्नि-दहन कर डालने पर  यह पर्व प्रचलित है।
‘ब्रज की होली’ पूरे देश में मशहूर है। ब्रज भूमि पर यह त्योहार महीनों चलता है। गांव-गांव, गली-गली में पूर्व निर्धारित स्थानों पर होली-दहन की व्यवस्था की जाती है। ढप, ढोल, नगाड़े, झाल, करताल, बाजे के साथ गीत गाए जाते हैं। होली महोत्सव से संबंधित गानाï-बजाना बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाता है। इस नाच-गाने की घोषणा होते ही गांव के नर-नारी, बच्चे, बूढ़े सब निर्धारित किए गए स्थान पर एकत्रित हो जाते हैं। सब मिलकर गान के साथ-साथ नृत्य भी करते हैं। इसमें जकड़ी, भजन, रसिये गाए जाते हैं। नाच में नव-विवाहित जोड़े एवं महिलाएं भी भाग लेती हैं।
‘बरसाना’ का नाम आते ही लट्ठमार होली का दृश्य सामने आ जाता है। एक लोकगीत में भी कहा गया है— ‘कान्हा बरसाने में आ जाइयो, बुलाई गयी राधा प्यारी।’
बरसाना गांव राधा का जन्म स्थान है। बरसाने में  एक ऊंचे टीले पर राधा का मंदिर है। बरसाने में पहले समाज गायन होता था। कहा जाता है इस गायन में गायकों पर गुलाल  व टेसू के फूलों से बनाया गया सुगन्धित गुनगुना रंग डाला जाता था। उसके बाद रंग से भीगे हुए सभी लोग नंद के लाला के जयकारे लगा उठते और बरसाने की गलियों  में पहुंच जाते जहां बरसाना की महिलाएं हाथों में लाठियां लिए हुए होती थीं। वे लाठियां चलातीं और पुरुष अपनी ढालों पर प्रहार सहते हुए  अपनी रक्षा करते। यह खेल एक-दो घंटे तक चलता। दशमी तिथि को यही दृश्य नंद-गांव के मंदिरों और गलियों में भी होता। इस दिन लाठियां नंद गांव की बहू-बेटियों के हाथों में होतीं।
होली के गीत प्राय: श्रीकृष्ण और राधा की लीलाओं को आधार मानकर रचे जाते हैं। श्रीकृष्ण तो ब्रज के खिलाड़ी हैं, अनोखे रसिया हैं। गोपिकाओं को रसिया बनाकर अपनी रंगभरी पिचकारी चलाते हैं। गोपिकाएं कह उठती हैं :
‘मत मारो श्याम पिचकारी,
 मोरी भीगी चुनरिया सारी।
ससुर सुनेंगे देंगे गारी
सास सुनेगी लाख कहेगी
मत मारो श्याम पिचकारी।’
भारत के प्रत्येक भाग में होली किसी न किसी रूप में मनाई जाती है। बंगाल में फाल्गुन की चतुर्दशी को भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर के निकटवर्ती स्थलों पर कागज,कपड़े तथा बांस से मनुष्य की प्रतिमाएं बनायी जाती हैं और उनके पास छोटी-छोटी पर्णकुटिया  बनायी जाती है। संध्या समय उन प्रतिमाओं के सम्मुख यज्ञ का आयोजन किया जाता है तत्पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति उन पर्णकुटियों में प्रतिष्ठिïत की जाती है। यथाविधि उनका पूजन कर उनको अघ्र्य, पाद्य आदि अर्पित किए जाते हैं और यज्ञ कुंडों से अग्नि लेकर बनाई हुई प्रतिमाओं को जलाया जाता है, फिर जिस समय प्रतिमा दहन होता है उस समय भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति लेकर जलती हुई प्रतिमा की सात बार परिक्रमा की जाती है और इसी के साथ संध्या समय के समारोह का समापन हो जाता है। दूसरे दिन प्रात:काल भगवान कृष्ण के विग्रह को एक झूले पर सुसज्जित करते हैं तथा ग्राम-पुरोहित उसे मंत्रोच्चार के साथ झूलन कराता है। इस अवसर पर समारोह में लोगों द्वारा मूर्ति पर अबीर-गुलाल की वर्षा की जाती है। बाद में पुजारी उस अबीर-गुलाल को उठाकर उपस्थित जनï-समूह के मस्तक पर टीका लगाता है। फिर दिनभर रंग खेला जाता है तथा अबीर-गुलाल से धरती-आकाश लाल हो उठते हैं।
उत्तर प्रदेश के पश्चिमी अंचल में इस दिन कवियों की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। पंजाब में कुश्तियों के दंगल होते हैं तथा महिलाएं अपने घर के द्वारों पर स्वास्तिक चिह्नों को अंकित करती हैं। गुजरात में होली जलाने से बची हुई राख से लड़कियां गौरी की प्रतिमाएं बना कर उनकी आराधना करती हैं। बिहार में युवक अपने ग्रामों की सीमा से बाहर निकल कर जलती मशालों के माध्यम से वहां के पथ वीथिकाओं को प्रकाशमान करते हैं जिसका अर्थ होता है वे अपने ग्राम से दरिद्रता को दूर भगा रहे हैं। बिहार में पूर्णिमा की रात को होली जलाने की प्रथा है। इसके चारों ओर लोग एकत्र होते हैं और हरे गेहूं और चने जैसे कच्चे अन्न को अग्नि की लपटों में भून कर खाते हैं। दूसरे दिन रंगों से खेला जाता है।
उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में राम और सीता को झूले पर बिठाकर झांकी निकाली जाती है। होली का राजा बनाकर पालकी में बैठा कर घुमाने की भी प्रथा है जो केवल बिहार के हजारीबाग अंचल के अतिरिक्त और कहीं नहीं है।
गुजरात में होलिका का पुतला बनाकर उसका जुलूस निकाला जाता है। बाद में उसका दहन किया जाता है।
दक्षिण भारत में होली पर्व को ‘काम दहन पर्व’ के नाम से जाना जाता है। इस पर्व को भगवान शिव  द्वारा काम को भस्म किए जाने की स्मृति में संपन्न किया जाता है। तमिलनाडू में दोलोत्सव होता है परन्तु होली संपन्न होने के एक मास बाद।
भारत के अनेक प्रदेशों में यह भी कहा जाता है जिस दिशा में होलिका की लपटें उठ रही हों अथवा जिस ओर जलने के बाद उसकी राख फैल जाए उस दिशा में फसल पैदावार अच्छी होती है। होली पर्व का कृषि के साथ भी संबंध माना गया है। कहीं-कहीं तो होलिका दहन के पश्चात बची हुई राख को खेत खलिहानों में इसी विश्वास के साथ बिखेरा जाता है कि यह राख फसलों की कीड़े आदि से रक्षा करती है। जिन वृक्षों पर फल नहीं लगते उन पर यह राख डाली जाती है।
बीकानेर की डोलचीमार होली भी पूरे भारतवर्ष में अपनी विशेषता लिए हुए है। हरियाणा में भी यह त्योहार पूरे जोशों उल्लास से मनाया जाता है। फाल्गुन शुरू होते ही गांवों  में महिलाएं गलियों में एकत्र होकर रात के समय गाना-बजाना करती हैं जो होली जलने तक चलता है। होली पर्व पर महिलाएं व्रत रखती हैं। पूजा-अर्चना के बाद ही अपना व्रत खोलती हैं। अगले दिन सभी रंग से फाग खेलते हैं।

तुम हो क्यूट होली में

दिल खूब चाहे छूट, होली में
सच को भी प्यारा झूठ होली में!
कोयल ने मचल कर, कौए से कहा,
तुम हो बड़े ही क्यूट, होली में!
पहाड़ के नीचे आने की
परंपरा को पार कर,
चढ़ता चोटी पर ऊंट,होली में
दिमाग वाले भी, लीक से हटकर
दिल से निकालें रूट, होली में
सफेद बाल काले,
आंखों में प्रेम के उजाले,
हरे हो रहे ठूंठ,होली में
सेहत पे महंगाई का, असर नहीं होगा
कद्दू को समझो फ्रूट, होली में
यार के प्यार का रंग जांचने को
पहनो उधारी सूट,होली में
तालियां भरपूर दी, वाह वाही खूब की
कर दो कवि को हूट, होली में
देखो, फागुन में किसी का न दिल टूटे
आशिक बनेंगे भूत, होली में
प्यार में जान देने का,
मजाक  मत करना
आ जाएंगे यमदूत, होली में
आतंक, भ्रष्टाचार,महंगाई की होलिका
हो जाएं, भस्मीभूत होली में
सारी दुनिया को हो,
इंसानियत का इंफेक्शन
हर मानव देवदूत, होली में।
-प्रहलाद श्रीमाली

टॉप 10  होली गीत

1. होली आई रे कन्हाई
रंग बरसे सुना दे जरा बांसुरी (मदर इंडिया)।
2. जा रे अरे नटखट तू छू न मेरा घूंघट,
पलट के दूंगी आज तोहे गाली रे।ï
आया होली का त्योहार
उड़ी रंग की बौछार
तू है नार नखरेदार मतवाली रे (नवरंग)।
3. होली के दिन दिल खिल जाते हैं,
रंगों में रंग मिल जाते हैं (शोले)।
4. रंग बरसे भीगे चूनर वाली (सिलसिला)।
5. होली खेले रघुवीरा बिरज में
होली खेले रघुवीरा।-(बागवान)
6. पिया संग खेलो होली
फागुन आयो रे (फागुन)।
7. आज न छोड़ेंगे हम जोली,
खेलेंगे हम होली (कटी पतंग)।
8. आई रे आई रे होली (जख्मी)।
9. तन रंग लो, आज मन रंग  ले (कोहिनूर)।
(10) अंग से अंग लगाना सजन (डर)।


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