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धरती पुत्रों के सपनों पर फिरा पानी!

Posted On April - 23 - 2013

विजय शर्मा
करनाल, 23 अपै्रल। बैसाख में सावन स्वीकार्य नहीं है, लेकिन फिर भी वह आता है और तोड़ देता है धरती पुत्रों के सपनों को। लेकिन इस बार किसानों को हुए नुकसान के लिए सावन अकेला जिम्मेदार नहीं है। गेहूं उत्पादन गिरने के कारणों पर मंथन कर रहे कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश के पानी ने गेहंू उत्पादन पर काफी असर डाला है। लेकिन इसके अलावा पीला रतुआ, करनाल बंट और खराब बीजों का इस्तेमाल भी उत्पादन में कमी के लिए उतना ही जिम्मेदार है।
मौसम ठंडा रहने के बावजूद बीते वर्ष की अपेक्षा इस बार गेहूं में प्रति एकड़ 5 से 7 क्विंटल तक की गिरावट दर्ज की जा रही है, जिसके चलते कृषि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है। करनाल स्थित राष्ट्रीय गेहंू अनुसंधान निदेशलय की निदेशक डाक्टर इंदु शर्मा ने बताया की अब तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार यह देखा गया है की इस बार प्रति एकड़ गेहंू उत्पादन में कमी आई है। उन्होंने बताया कि इसके पीछे कई कारण हैं, जिसमें यमुनानगर और अम्बाला जिले में पीले रतुए का प्रकोप, खेतों में खड़े रहे बारिश के पानी और किसानों द्वारा बीमारी रोधी किस्मों का पर्याप्त इस्तेमाल न करना भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि हालांकि इसको लेकर किसानों को जागरूक भी किया गया था, परन्तु किन्ही कारणों के चलते अधिकतर किसान इस और ध्यान नहीं दे पाए जिससे गेहंू उत्पादन प्रभावित हुआ। निदेशक ने कहा की कृषि वैज्ञानिकों ने 621, एचडी 2967, पीबी डब्ल्यू 550 और डब्ल्यूएच 1105 जैसी गेहूं की ऐसी अनेक किस्में विकसित की हंै जो बीमारी रोधी हंै। उन्होंने कहा कि अगले वर्ष इन इलाकों में इन किस्मों की बिजाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि पिछले साल वातावरण फसल के लिए जितना अनुकूल था वह हर बार नहीं होता। लेकिन यह प्रभाव केवल हरियाणा तक ही सीमित है। उन्होंने कहा की सारी परिस्थितियों के बावजूद देश के कुल उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ेगा और इस बार गेहूं उत्पादन के औसत रहने की संभावना है, जबकि बीते वर्ष  उत्पादन में 8 फीसदी उछाल से इलाके में बम्पर फसल हुई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि नई प्रजातियों के इस्तेमाल और बीमारी रोधी किस्मों के प्रयोग के चलते हिमाचल, राजस्थान, मध्य प्रदेश व अन्य कई राज्यों में तो इस बार रिकार्ड उत्पादन होने की संभावना है।


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