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तसवीर

Posted On August - 10 - 2014

चित्रांकन: संदीप जोशी

लघुकथा

लक्ष्मी रूपल
ऑस्ट्रेलिया से आने के बाद शहर की पौश बस्ती में उसने एक तीन मंजिला मकान खरीद लिया और उसमें रहने लगा। रात के समय उस घर से कभी-कभी जोर से हंसने, दौडऩे और रोने-चिल्लाने की अजीब-सी आवाजें सुनाई पड़ती थी। आसपास के रहने वाले लोग, मित्र और परिचितों को बड़ा आश्चर्य होता था और कई तरह के प्रश्न उठ खड़े हुए थे कि व्यक्ति तो अकेला रहता है फिर तरह-तरह की आवाज़ों क्यों सुनाई पड़ती हैं। अवश्य कोई रहस्य है। यही सिलसिला जब बहुत दिन तक चलता रहा तो लोग इस मकान को ‘भूत बंगला’ कहने लगे। एक बार उसका एक मित्र बाहर से आया और उसी के साथ रहा। रात को दोनों मित्र साथ बैठ कर खाना खा रहे थे। घर में पसरे हुए सन्नाटे को देखकर मित्र ने कहा,  ‘इतने बड़े घर में तुम अकेले रहते हो! तुम्हें डर नहीं लगता?’
‘डर… कैसा डर… किसका डर, ये सब रहते हैं न मेरे साथ’ उसने टेबल पर रखी एक बड़ी-सी तसवीर मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘ये सब मेरे अपने लोग हैं। मेरा परिवार है। मैंने जीवन जिया है इनके साथ। ये, मेरे मन में, भावनाओं  में, सांसों में और यादों में बसे हुए हैं। मैं इन पर पूरा विश्वास करता हूं। जब गुजरात में भूकम्प आया था, मैं विदेश में था। मेरा सब कुछ नष्ट हो गया। मेरी कोठी ईंट पत्थरों का ढेर मात्र रह गई। बस… बच गई केवल यह तसवीर। अब ये हर समय मेरे साथ रहते हैं। मैं इन्हें डांटता हूं, पुचकारता हूं,  इनके साथ हंसता हूं, गाता हूं, इनके साथ खेलता हूं, इनसे सलाह भी करता हूं और फिर सो जाता हूं।’
‘तुम कहीं पागल तो नहीं हो गये, ये तो तसवीर है।’
‘तो क्या हुआ? तुम भगवान को तो मानते हो न? वह भी तो तसवीर होता है या मूर्ति होता है। तुम उसे नहलाते हो, कपड़े पहनाते हो, पूजा करते हो, प्रार्थना करते हो, भोग लगाते हो और सुख-दुख की चार बातें भी करते हो, यह जानते हुए भी कि वह सब जगह व्याप्त है। तुम्हारे अन्दर भी है। फिर ये सब तो मेरे अपने लोग हैं। इनको छोड़कर मैं अब कभी विदेश नहीं जाऊंगा।’ और… उसने तसवीर को उठाकर छाती से लगा लिया।


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