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पप्पू, काहे फेल हुआ

Posted On August - 10 - 2014

चित्रांकन: संदीप जोशी

व्यंग्य

सुरजीत सिंह
पप्पू फेल हो गया है। सरकार के स्कूल चले हम, कोई बच्चा छूटे ना, सर्वशिक्षा अभियान, मिड डे मील जैसे सघन शैक्षिक उन्नयन कार्यक्रमों को धता बताते हुए। स्कूल का रिजल्ट लगातार दूसरी बार शून्य चला गया। हैडमास्साब सिर खुजाते कोई कारगर युक्ति खोज रहे हैं, ताकि खराब रिजल्ट के गले में बहानों की माला डाल सकें। पता नहीं अब ट्रांसफर होगा कि चार्जशीट मिलेगी। इस सबके लिए पप्पू जिम्मेदार है। पप्पू शिक्षा का बेड़ा गर्क करने का खुद को गुनहगार मान अपराधी की तरह सिर झुकाए खड़ा है।
गुरुजी पप्पू को धमकियां दे रहे हैं, बोल बे पप्पू, काहे फेल हो गया…एक झटके में उतार दी हमारी?
पप्पू की गर्दन एक तरफ भारत के नक्शे में बंगलादेश की तरह झुकी हुई थी। पैर के नाखून से जमीन कुरेद रहा था। हालत ऐसी कि खुद जाए तो अभी धंस जाए उसमें।
देख पप्पू, तेरे लिए कित्ता कुछ किया। कटी-फटी सही, बिछाने को दरियां दी। पीने को जैसा-तैसा पानी भी मिला कि नहीं! पढऩे को किताबें दीं, आधे पाठ तो सही-सलामत थे उनमें। तू आधे दिनों गायब रहा, हमने तुझे कभी टोका, कभी खोजा? कभी नहाकर आने को पाबंद किया? ना तेरे नाखून देखे, ना कभी गंदे कपड़े, लंबे, उलझे बालों पर दृष्टिपात किया। तुझे होमवर्क इसलिए नहीं दिया, ताकि होम पर अन्य वर्क में बाधा न पहुंचे। …और हमारी भलमनसाहत का यह सिला। पता है तेरी इस हरकत पर सरकार को घेरकर विपक्ष जवाब मांग रहा है, तू यहां मौन खड़ा है।
पप्पू ने बड़ी मुश्किल से थूक निगला, खुद को जिंदा पाया, पर बोल नहीं फूटे।
गुरुजी गंभीर होकर फिर बोले- बोल बे पप्पू, कुछ तो बोल। नहीं बोलेगा तो कैसे जानूंगा फेल काहे हुआ तू?
इस बार पप्पू के होंठ हिले, थोड़ी सी नजरें भी उठीं जैसे कभी-कभी रुपया डॉलर के मुकाबले उठता है- गुरुजी, स्कूल तो बरोब्बर आये थे हम और जब-जब आये पूरा दिन क्लास में बैठे रहे। लघुशंका भी घर जाकर दूर की।
तब फेल क्या कलकत्ते वाले मामाजी के कहने से हुआ है। गुरुजी एकदम से कुपित हो उठे।
पप्पू कांप उठा- गुरुजी हमको माफी दे दो, सौगन्ध भैंसिया की जो, फिर कभी स्कूल की तरफ झांके भी तो!
यह बात तो तू पिछली दफा भी कह रहा था, फिर काहे चला आया बे? गुरुजी ने आगे के दो स्वर्ण मढि़त दांत इस अंदाज में दिखाये, जैसे पप्पू को रंगे हाथों पकड़ लिया।
पिछली दफा फेल होकर हम स्कूल नहीं आए थे। सरकार ने नारा दिया कि स्कूल चले हम, हम सरपट भाग छूटे। कोई बच्चा छूटे ना नारे के बाद भी हम कसम से दस-दस बच्चों की पकड़ में नहीं आए…पूरा एक महीना खेतों में छुपे रहे। फिर एक दिन बापू ने कहा कि हैडमास्साब ने कहलाया है कि पप्पू को स्कूल भेजो, बड़ा होनहार बच्चा है, सो, बापू ने सौगन्ध खिलाकर भेज दिया।
अबे तूने सीरियसली ले लिया, हमने तो मजाक में बोला था। चल आ गया, फिर साल भर क्या घास खोदी यहां। हम तो स्कूल के कामों में कसकर डटे रहे, मिड डे मील का हिसाब, जरूरी डाक, दो-तीन दफा चुनाव ड्यूटी, विभाग की मीटिंग, वाक्पीठ, नवाचार बैठकें; पन्द्रह दिन तेरे वास्ते बच्चों को नैतिक शिक्षा कैसे दें, का पूरे मनोयोग से प्रशिक्षण लेने राजधानी चले गए। पीछे से मौका ताड़ तू मौज उड़ाता रहा।
गुरुजी ऐसी बात ना है, हमने भी पीटीआई जी और गणित वाले गुरुजी के खेतों में पूरे मन से काम किया।
मूरख, वह तो तुझे कृषि का व्यावहारिक ज्ञान देने की क्लास थी। ताकि तू अभी से खेती के कायदे सीख सके।
स्कूल में भी हमने जी लगाकर काम किया। रोज झाड़ू लगाई। दरियां बिछाईं। जाले साफ किए। खरपतवार काटी। स्टाफरूम संवारा। वह रंग-रोगन वाला बीच में छोड़कर भाग गया, हमने पूरी पुताई की। बीड़ी-सिगरेट-पान-तम्बाकू हम ही लाते थे। घर से चुराकर दूध लाते रहे। संस्कृत वाले गुरुजी के रोज मालिश की। मैडमों को खेतों से सब्जियां लाकर दीं। गांव में जब-तब मंत्री, विधायक, अफसर आए, हमने टेंट तनवाया, चाय-नाश्ता परोसा, कप-गिलास उठाए, सफाई की, भीड़ बनकर बैठे।
बस पप्पू बस, बित्ते भर काम का बदला तूने हमसे फेल होकर लिया, ऊपर से जुबान चलाता है, अच्छा होता इतना दिमाग चलाया होता। गुस्से में तमतमाए हैडमास्साब एकाएक उठे और पप्पू को हिकारत से देखते हुए सरपंच के घर की ओर चल दिए।


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