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व्यंग्य कविता

Posted On August - 10 - 2014

अच्छे दिन हैं!

महंगी-महंगी हुई सब्जियां, अच्छे दिन हैं,
पेट्रोल कस रहा फब्तियां, अच्छे दिन हैं।
बीस रुपये में मिनरल वाटर बोतल मिलती,
जल से कैसे भरे मटकियां, अच्छे दिन हैं।
क्या खाएं, क्या पहनें, जाएं किधर घूमने,
उजड़ी-उजड़ी दिखें बस्तियां, अच्छे दिन हैं।
ऊंचे-ऊंचे पद उनको हासिल सत्ता में,
संसद की कह रही कुर्सियां, अच्छे दिन हैं।
नौकरियां कब पाएंगे सब युवा पूछते,
किस डिब्बे में पड़ी अर्जियां, अच्छे दिन हैं।
गुंडे चारों ओर करें अपनी मनमानी,
पुलिस घूमती पहन वर्दियां, अच्छे दिन हैं।
भुने हुए पापड़-से टूटे सारे सपने,
बीच भंवर में लुटीं कश्तियां, अच्छे दिन हैं।
आओ-आओ जेबों में भर नोट नये-से,
ग्राहक से कह रही मंडियां, अच्छे दिन हैं।
देकर देखो वोट खोट पहचान न पाए,
कर दीं हमने स्वयं गलतियां, अच्छे दिन हैं।
आज़ादी से अब तक केवल पीड़ा पाई,
मुस्कानों की बुझी भट्ठियां, अच्छे दिन हैं।
—घमंडीलाल अग्रवाल


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