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स्नेह का पुल

Posted On August - 10 - 2014

साहित्य के रंग

चित्रांकन: संदीप जोशी

अरुणेन्द्र नाथ वर्मा
‘क्या गुनाह कर दिया अगर थोड़ा सा समय सिर्फ अपने लिए मांग लिया? पूरे समय तो हम साथ ही रहते हैं। सुबह सैर पर अकेले जाता हूं क्योंकि तब तुम व्यस्त रहती हो। सैर पर निकले परिचितों से थोड़ा बहुत हंस बोल लेता हूं। उसके बाद तो सारा दिन घर में ही बीतता है। आखिर किस बात की शिकायत है तुम्हें?’ कहते-कहते एक बार फिर कुमार आवेश में आ गए लेकिन पैंतालीस वर्षों की उनकी सहचरी, छाया, इतनी कमज़ोर भी नहीं थी कि उन्हें लगातार बोलने देती।
छाया ने उनकी बात बीच में ही लपक ली। उदासी और कड़वाहट भरे स्वर में बोली, ‘अरे यहां फुर्सत किसको है तुम्हारे साथ बैठ कर गप्पें मारने की। अखबार पढऩे और टी वी पर लम्बी-लम्बी बहसें सुनने से जो थोड़ा बहुत समय बचे, उसमें कोई न कोई किताब तुम्हें घेरे रहती है।’
दुबारा उसी आरोप से बौखलाये कुमार प्रतिवाद करने को बेताब थे पर शब्दों के चक्रव्यूह भेदकर उनके अन्दर प्रवेश कर जाने की कला में वे अभी तक पारंगत नहीं हो पाए थे। छाया जानती थी कि वह बोलती रही तो कुमार युद्धक्षेत्र छोड़, बालकनी में जाकर अपनी प्रिय रॉकिंग चेयर पर झूलना शुरू कर देंगे या आद्योपांत पढ़े जा चुके अखबार के पीछे दुबारा अपना चेहरा छुपा लेंगे। अत: उन्होंने बोलना जारी रखा। ‘तुम्हें तो उपन्यास पढऩे से फुर्सत नहीं, यहां बच्चे स्कूल से लौट आयेंगे और मैं उन्हें चेंज कराने , खाना खिलाने में व्यस्त हो जाऊंगी। जब तक उससे फुर्सत मिलेगी तुम अपनी किताब हाथ में पकड़े सोते हुए मिलोगे। आखिर दो बातें तुमसे करनी हों तो कब करूं मैं?’
तभी छाया की बातों को अक्षरश: सच सिद्ध करती हुई कॉलबेल की चिडिय़ा ची-ची-ची-ची करके बोल पड़ी। दरवाजे के पीछे से छह वर्ष के अमन और तीन वर्ष की मेधा की खिलखिलाती हुई हंसी सुनायी पडऩे लगी। छाया ने जाकर दरवाज़ा खोला तो दोनों दादी-दादी कहकर उसके पैरों से चिपक गए। नन्ही मेधा ने अपने हाथ ऊपर उठा दिए कि दादी उसे गोद में उठा लें और अमन दौड़ता हुआ कुमार के पास आकर आह्लाद मिश्रित उत्तेजना के साथ बताने लगा दादू-दादू , आज पता है हमने रास्ते में क्या देखा ? एक आदमी सड़क के किनारे साइकिल पर सर्कस दिखा रहा था। मेधा दादी की गोद से कूद पड़ी और अमन की बात काटते हुए बोली, ‘नहीं-नहीं , तुम चुप रहो, मैं बताऊंगी। तुमने प्रोमिस किया था कि मुझे पहले बताने दोगे, अब तुम चीटिंग कर रहे हो।’ और फिर मचलते हुए वह कुमार की गोद में चढ़ गयी। अमन कहां चुप रहने वाला था। वह चीखने लगा, ‘ नहीं-नहीं, उस साइकिल वाले का सर्कस तो मैंने पहले देखा था, पहले मैं बताऊंगा।’ कुमार और छाया दोनों ही उनकी लड़ाई सुलझाने में लग गए। कुमार इस कला में भी छाया से कमज़ोर थे। वे अपने पौत्र-पौत्री से पहले पूछते कि उनका आपस में क्या समझौता हुआ था, फिर शायद गवाहों के नाम पूछते। बच्चों की दुनिया में आने से पहले वे अपनी आयु का चोला उतारना भूल जाते थे। छाया ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा- कोई नहीं सुनाएगा अभी सर्कस-वर्कस की बात। अभी चलो, हाथ धोकर आओ और खाना खाने बैठो।
बच्चों ने प्रतिवाद किया। दादू से गुहार लगाई कि दादी के अत्याचार को रोकें। पहले अपना फैसला सुनाएं। पर दादी ने एक न सुनी। हारकर वे दोनों प्रतिकार करते-करते भी दादी के आदेश का पालन करने चले गए।
कुमार के पास अब फिर थोड़ा समय था जल्दी से उस उपन्यास के कुछ पृष्ठ और पढ़ डालने के लिए जिसे पढऩे में इतनी देर से व्यवधान पड़ा हुआ था। उनके लिए न तो सुबह की सैर त्यागना संभव था, न रात में देर तक जागना क्योंकि उसके बाद उन्हें अनिद्रा की समस्या हो जाती थी। अत: आज सैर से लौटने के बाद बजाय अखबार को पूरी तरह से चाटने के केवल सु$िर्खयों पर नज़र डाली थी। नाश्ता करने के लिए भी समय निकालना अखर रहा था। छाया नाश्ते के समय रोज़ की तरह उनके साथ बैठी। बातों के बीच व्यवधान डालने वाला और कोई नहीं था। बेटा-बहू दोनों साथ-साथ ही घर से रोज़ की तरह सुबह नौ बजे निकल गए थे। उसके पहले दोनों बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजने में छाया भी बहू के साथ जुटी रही थीं। फिर सबके विदा होने के बाद स्वयं नहाने-धोने की फुर्सत मिली। जब तक उससे निपट पातीं , खाना बनाने वाली बाई आ धमकी। पति के साथ नाश्ता करने बैठी तो, पर पतिदेव थे कि नाश्ता करते-करते भी टेबुल पर रखी उस पुस्तक से लालच भरी निगाहें हटा नहीं पा रहे थे। छाया को उनकी इस हरकत पर चिढ़ लगती रही। उनकी कोई बात कुमार जिस दिन ध्यान से सुनेंगे वह दिन कभी आयेगा क्या? सोच-सोच कर उनकी खीझ धीमी आंच में पकते दूध की तरह गाढ़ी होती रही।
पिछली रात भी यही हुआ था। टीवी पर देखे हुए प्रहसन को छाया उनके साथ शेयर करना चाह रही थी। पर वे खाने के बाद बेड पर लेटकर, बेडसाइड लैम्प ऑन करके अपने उपन्यास में खो गए थे। पता है, आज कॉमेडी सर्कस में इतना मजेदार एपिसोड था कि हंसते-हंसते पेट में बल पड़ गए। छाया सिर्फ इतना कह पायी थी कि कुमार ने अनमनेपन से कहा कि फिर कभी कर लेना अपने टीवी सीरियल्स की बातें, अभी ये उपन्यास $खत्म कर लेने दो , कल ही लाइब्रेरी में इसे लौटाना है।
छाया के सब्र का बांध फट पड़ा था। तुर्शी के साथ वह बोली थी- मैं कौन सारे समय तुम्हारे सर पर बैठी रहती हूं? कब होती है तुमको चैन से दो बातें करने की फुर्सत? गुस्से से तुनक कर उन्होंने दूसरी तरफ करवट बदल कर सर तक चादर ओढ़ ली थी। कुमार का उपन्यास पढऩे का उत्साह $खत्म हो गया था। गहरे अपराधबोध से घिर कर उन्होंने बेडसाइड लैम्प स्विच ऑफ किया और छाया को मनाते हुए बोले-अच्छा भाई , नहीं पढ़ता किताब, लो अब तो खुश? बोलो क्या सुनाना चाहती थी?
पर कई बार चुपचाप आत्मसात की गयी पीड़ा आज छाया के बर्दाश्त के बाहर हो गयी थी। मानिनी का मान नहीं टूटा। कुमार ने मनाने की कोशिश की। प्रतिफल नहीं मिल पाया तो उन्हें भी गुस्सा आने लगा। जो उपन्यास उन्हें रमाये हुए है और जिसे कल ही लौटाना है, उसे $खत्म करने के बजाय किसी टीवी सीरियल की चर्चा क्या कल तक नहीं टाली जा सकती थी? धीरे-धीरे उनकी मनुहार खीझ में बदल गयी। एक बार जोर से हुंह कहकर वे भी दूसरी तरफ करवट बदल कर सोने के उपक्रम में लग गए थे। पर नींद दगा दे गयी थी। उधर छाया भी देर तक करवटें बदलती रही। जाने कितनी देर वे दोनों जागते रहे। सुबह नींद रोज़ के समय से ही खुल गयी पर नींद की कमी से आंखें भी कड़वा रही थीं और मन से भी कड़वाहट नहीं गयी थी।
सुबह छाया नित्य की तरह बहू के साथ अमन और मेधा को स्कूल भेजने के चक्कर में जुट गयी थी और कुमार रोज़ की तरह ही सैर पर निकल गए थे। वहां भी वे रात की लड़ाई की ही सोचते रहे। चार दशकों से हर सुख-दुख में डट कर साथ देने वाली जीवनसंगिनी के दुखी होने पर उनका दिल भी कम नहीं दुखता था। पर अजीब सी मन:स्थिति में थे वे। छाया की उदासी असह्य थी पर उनकी शिकायत भी अनुचित लगती थी। आखिर कोई बुरी लत तो उन्हें थी नहीं। भरे पूरे संयुक्त परिवार में उन्हें एकांत के क्षण मिलते ही कहां थे। फिर वे कुछ क्षण सिर्फ अपने साथ बिताने के लिए, अपने शौक पूरे करने के लिए, चाहते थे तो क्या गुनाह करते थे। व्यक्तिगत आकाश या ‘पर्सनल स्पेस’ चाहना पत्नी के साथ विश्वासघात करने जैसा जघन्य अपराध तो था नहीं। कौन गलत था कल रात, वे स्वयं या छाया? इसी उधेड़बुन में वे सारे रास्ते रहे और सैर से लौट कर घर भी पहुंच गये पर युद्धविराम का कोई संकेत नहीं मिला। दोपहर तक छाया का मौन नहीं टूटा तो उनकी उधेड़बुन गहरी खीझ में बदल गयी। तभी उन्होंने छाया को अपनी बात समझाने की कोशिश शुरू की थी। फिर भी कौन सा गुनाह कर दिया अगर थोड़ा सा समय सिर्फ अपने लिए मांग लिया? कहते हुए कड़ुवाहट को अपने शब्दों में रिसने से रोक नहीं पाए थे वे। और उधर छाया भी भरी हुई बैठी थी। वह तो अच्छा हुआ कि युद्ध विराम बिना घोषणा के ही लागू हो गया। अमन और मेधा की लड़ाई को सुलझाने के चक्कर में अपनी लड़ाई को उन्हें ठन्डे बस्ते में डालना पड़ा। फिर दोनों बच्चे अन्य बातों में उलझ कर अपनी लड़ाई भूल गए।
अमन और मेधा को खाना खिलाने के बाद छाया जब खाली होती थी तो उन्हें भी थोड़ी देर दोपहर को आराम करने का मौका मिलता था। अमन तो खाने के बाद कंप्यूटर पर अपने प्रिय कार्टून देखने में लग जाता था पर नन्ही मेधा को कार्टून देखने से कहीं अधिक आनंद आता था दादी और दादू के बीच बिस्तर पर लेटकर उनसे कहानी सुनने में। पहले वह रात में कहानियां सुनते हुए सोती थी पर जबसे स्कूल जाना शुरू किया था रात में उसे जल्दी सुला दिया जाता था। अत: कहानियां सुनने का समय अब दिन का हो गया था। आज खाने के बाद वह जल्दी से आकर दादी और दादू के बीच लेट गयी और लेटने के साथ ही फरमाइश कर डाली कि उसे चें-में वाली कहानी सुनायी जाए।
युद्धरत दादू-दादी के सामने एक नया धर्मसंकट आ खडा हुआ। वैसे तो मेधा को कभी दादी कहानी सुनाती थी और कभी दादू। पर चें-में वाली कहानी मेधा की प्रिय कहानी इसलिए थी कि इसे दादी और दादू मिल कर सुनाते थे। कहानी थी ममता भरी एक बकरी की जिसके दो प्यारे-प्यारे बच्चों चें और में से एक दुष्ट भेडिय़ा बकरी की आवाज़ में बोलने का छद्म करके दरवाज़ा खुलवा लेता है और उन्हें खा जाता है। कहानी का अंत होता है जब खा-पीकर गहरी नींद में सोते हुए भेडि़ए का पेट अपने सींग से फाड़कर बकरी चें और में को बचा लेती है। इस कहानी की सबसे बड़ी विशेषता ये थी कि दादू भेडिय़े की भारी भरकम डरावनी आवाज़ में बोलते थे और बकरी के डायलाग दादी के महीन स्वर में होते थे। बीच बीच में चें- में की मीठी आवाज़ में मिमियाने का रोल नन्ही मेधा का होता था।
पिछली रात से चलते आ रहे शीतयुद्ध के बावजूद कुमार और छाया मेधा की फरमाइश को नकार नहीं पाए। रात की नींद दोनों की पूरी नहीं हो पायी थी पर मेधा ही तो थी जिसके आगे सभी हथियार डाल देते थे। उन्हें भी डालने पड़े। मेधा बीच में लेट गयी। फूल सा हल्का एक पैर उसने दादी के ऊपर रखा, दूसरी तरफ लेटे हुए दादू के ऊपर एक हाथ रखा और बोली- सुनाइये ना चें- में की कहानी। दादी ने दादू के ऊपर वार करने का मौ$का छोड़ा नहीं। बोली- सुनायेंगे क्यूं नहीं? एक तुम्हीं तो हो जिसके लिए इनके पास समय की कोई कमी नहीं रहती।
कुमार को लगा उनके और छाया के बीच लेटी मेधा ने एक स्नेह का पुल बांध दिया था जिसके पार जाकर वे फिर से छाया के करीब आ सकते थे। मेधा के ऊपर से जाकर उनके हाथों ने छाया के हाथ को छू लिया। धीरे से मुस्कराकर वे बोले- नहीं, सिर्फ मेधा नहीं , अबसे तुम्हारे लिए भी समय रहेगा। बोलो तुम्हें कौन सी वाली कहानी सुनाऊं?


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