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एक फिल्म निर्देशक के नाम

Posted On February - 7 - 2015

फिल्म समीक्षा
कलाकार का काम होता है निर्देशक के इशारों पर चलना। यानी जब वह कहे हंसो तो हंसना, जब कहे रो, तो कलाकारा को रोना पड़ता। हालांकि यह सबकुछ फिल्म की कहानी के अनुसार चलता है, लेकिन कलाकार के अंदर भावों को भरने का काम निर्देशक करता है। लेकिन यहां ताली दो हाथ से बजे, तो ही काम बनता है। कहने का मतलब यह है कि कलाकार अगर निर्देशक की बात समझ जाए और निर्देशक अगर कलाकार की काम करने की सीमा को समझ जाए, तो फिल्म एक नए रूप में नजर आएगी।
चीनी कम और पा बनाकर महफिल लूटने वाले निर्देशक आर बाल्कि ऐसे निर्देशक के रूप में सामने आये हैं, जो कलाकार के मनोभावों को बहुत जल्दी समझ लेते हैं। इस बार बाल्कि  षमिताभ लेकर आये हैं। फिल्म शुरू होती है, महाराष्ट्र के इगतपुरी से यहां रहने वाले दानिश को फिल्में देखने और सितारों की एक्टिंग करने का बहुत शौक है। इस चाहत को पूरा करने वह मायानगरी मुंबई में पहुंच जाता है। यहां भटकते हुए वह असिस्टेंट डायरेक्टर अक्षरा से टकराता है। अक्षरा दानिश की चाहत को समझती है और उसे अपनी फिल्म का हीरो बनाने का निर्णय लेती है। दानिश को आवाज देने के लिए लाया जाता है अमिताभ सिन्हा (अमिताभ बच्चन) को। वह फिल्म में एक स्ट्रगलिंग एक्टर के रूप में मौजूद हैं। अमिताभ आया तो  एक्टिंग करने था, लेकिन हालात ने शराबी बना दिया। वह पूरे वक्त शराब के नशे में धुत्त रहता है। तकनीक के कमाल से वह दानिश की आवाज देता है। इनकी पहली फिल्म ही सुपरहिट हो जाती है तो उसे एक अनोखा नाम दिया जाता है षमिताभ। इसेक बाद शुरू होदा है दो कलाकारों के बीच अहम का टकराव। शिखर पर पहुंचकर दो कलाकार के मनोभावों की प्रस्तुति ही फिल्म की यूएसपी है। अमिताभ की आवाज और धनुष के हिलते होंठ, रेखा और धनुष का सीन, जिसमें आवाज अमिताभ की होती है जैसे फिल्म में कई मजेदार दृश्य हैं। बाल्कि ने दिखाया है कि अगर कुछ करने की इच्छा हो, तो असंभव कुछ भी नहीं। फिल्म कमाई कितनी करेगी, बहस इस बात की नहीं है, बल्कि असल बात तो यह है धनुष और अमिताभ की जोड़ी को लोग कितना पसंद करेंगे। संगीत में इलैया राजा ने दमखम दिखा दिया है। पिडली सी बातें गाना हो या फिल्म, अलग अंदाज में है।
    -धर्मपाल


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