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बरसों से बगावत की राह पर बलूचिस्तान

Posted On August - 29 - 2016

bluchi copyसिबिया और ब्रहुई आदिवासियों की जमीं रहा बलूचिस्तान मौजूदा वक्त में पाकिस्तान का सबसे उपेक्षित प्रांत है। बलूचिस्तान बगावत के लंबे इतिहास के लिए भी जाना जाता है। खनिज संपदा से परिपूर्ण इस प्रांत के बलोच राष्ट्रवादी अपने आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों के लिए 1948 से ही संघर्ष कर रहे हैं, जब पाकिस्तान ने इस प्रांत पर धोखे से कब्जा कर लिया था, और तब से ही पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा एजेंसियों की दमनात्मक कार्रवाइयां भी जारी हैं। इस दौरान हजारों लोगों के अपहरण और हत्या की खबरें आ चुकी हैं, बावजूद इसके अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी बलोच राष्ट्रवादियों के संघर्ष को पर्याप्त जगह नहीं दी है। जानकारों का कहना है कि बलूच विद्रोहियों ने कभी सरकार के ख़िलाफ़़ जंग नहीं छेड़ी। हां लेकिन आजादी की मांग लंबे अरसे से होती रही है जिसे पाकिस्तानी सरकार किसी न किसी तरीके से दबाती रही है। कभी अकबर बुगती की हत्या को सही ठहराकर तो कभी आतंकी शिविर चलाने के आरोप लगाकर। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र के नाम संबोधन में बलूचिस्तान के लोगोें का जिक्र करने से बलोच राष्ट्रवादियों में खुशी की लहर दौड़ गयी है।
1948 में ही शुरू हुआ संघर्ष
वर्ष 1948 में अब्दुल करीब खान ने पाक सरकार के खिलाफ अलगाव का बिगुल फूंका और अफगानिस्तान से पाक सैनिकों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। 1958 में इस सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व कर रहे नवाब नवरोज खान को उनके सहयोगियों के साथ गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया और उनके बेटों व भतीजों को फांसी दे दी गयी। जेल में नवरोज खान की भी मौत हो गयी। 1970 के दशक में बलोच राष्ट्रवाद का उदय हुआ, जिसमें बलूचिस्तान को पाकिस्तान से आजाद करने की मांग उठी। 1973-74 के दौरान वहां मार्शल लाॅ लागू कर सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और आंदोलनकारियों का दमन किया गया। बताया जाता है कि इसमें करीब आठ हजार लाेगों की मौत हो चुकी है।

BRSO-protest-in-Berlin copyसरकार से 15 सूत्री मांग
आंदोलन को दबाने के लिए उसके नेताओं को गिरफ्तार करने और उन्हें खत्म करने का सिलसिला जारी रहा। आंदोलनकारियों ने हार नहीं मानी। 2005 में बलूच नेता नवाब अकबर खान बुगती और मीर बलाच मार्री ने पाक सरकार के सामने 15 सूत्री मांग रखी। इनमें प्रांत के संसाधनों पर ज्यादा नियंत्रण और सैनिक ठिकानों के निर्माण पर रोक जैसे मुद्दे शामिल थे। इन्हें नकार दिया गया और संघर्ष जारी रहा।

पाक सेना द्वारा हत्या और दमन
बलूचों के सबसे बड़े नेता सरदार अकबर बुगती को 2006 में सैन्य कार्रवाई में मार दिया गया। बलूचिस्तान में अरसे से काम कर रहे जानकार मानते हैं कि बुगती की हत्या उस वक्त कर दी गयी जब वे अपने घर में थे। अकबर बुगती को मसीहा मानने वाले बलूचों का संघर्ष उनकी मौत के बाद बढ़ता गया। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के दस्तावेजों से यह पता चलता है कि सेना और खुफिया एजेंसियां किस तरह से अपना दमन चक्र चला रही हैं। बड़ी संख्या में लोगों को बंदी बनाया जा रहा है और अकारण यातनाएं दी जा रही हैं। अक़बर बुगती के पोते ब्राहमदाग बुगती बीते कई सालों से स्वनिर्वासित हो कर स्विट्ज़रलैंड में रह रहे हैं। मौजूदा वक्त में उन्हें बलूच विरोध की सबसे बड़ी आवाज़ माना जाता है। हाल ही में वे फिर से सुर्खियों में आये जब बुगती ने एक वीडियो संदेश जारी कर भारतीय प्रधानमंत्री का आभार जताया है और बलूचिस्तान मसले पर आगे भी समर्थन की मांग की।
सेना और सरकारी नौकरियों में बलूचियों के लिए रास्ते बंद किये जा चुके हैं। लोकतंत्र समर्थक बलूच नेताओं की हत्या कराने के साथ पाकिस्तान सरकार कट्टरपंथी ताकतों को आर्थिक मदद मुहैया कराती रही है। दूसरी ओर, बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और लश्कर-ए-बलूचिस्तान जैसे अलगाववादी समूहों की आेर से आजादी की लड़ाई जारी है। इन्हें रोकने के लिए पाक सरकार कई बार सैन्य अभियान भी चला चुकी है।
बलूचिस्तान विधानसभा में पूर्व में विपक्ष के नेता रह चुके अली बलोच का दावा है कि यहां चार हजार से ज्यादा लोग लापता हैं, जिनमें से हजार से ज्यादा छात्र और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जुलाई, 2010 से मई, 2011 के बीच यहां से लापता 140 लोगों की लाशें मिली हैं। हाल में सुरक्षा बलों ने बलोच आंदोलनकारियों पर तेजी से शिकंजा कसना शुरू कर दिया, जिससे इस प्रांत में तनाव बढ़ गया है।

भौगौलिक स्थिति
बलूचिस्तान शुष्क इलाका है। पाकिस्तान के क़रीब 40 फ़ीसदी इलाक़े में स्थित बलूचिस्तान की सरहदें दक्षिण पश्चिम में ईरान और उत्तर से लेकर उत्तर पश्चिम तक अफ़गानिस्तान से लगती हैं। इसके उत्तर पूर्व में पाकिस्तान के क़बाइली इलाक़े और दक्षिण में अरब सागर है। दक्षिण पश्चिम में एक बड़ा हिस्सा सिंध और पंजाब से जुड़ा है। सिल्क रूट से कारोबारियों और यूरोप से आने वाले हमलावरों के लिए अफ़गानिस्तान तक पहुंचने का रास्ता इसी बलूचिस्तान से होकर गुज़रता है।
बलूचिस्तान की जमीं पर बलूच, हजारा, सिंधी, पंजाबी से लेकर उज्बेक़ और तुर्कमेनियाई लोगों की दुनिया बसी है। लेकिन नीचे कोयला और खनिजों का खज़ाना भरा है। बावजूद इसके करीब सवा करोड़ की आबादी वाला पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा बदहाली, ग़रीबी और सरकार की अनदेखी का शिकार है। लंबे समय से यहां के लोग अपनी ज़मीन पर अपने शासन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अर्थव्यवस्था : प्राकृतिक गैस, काेयला और अन्य खनिज पदार्थ यहां की अर्थव्यवस्था का प्रमुख हिस्सा हैं। इसके अलावा कृषि और पशुपालन का यहां की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है।

काफी पुराना है बलूचिस्तान का इतिहास
पाकिस्तान के पश्चिमी हिस्से में स्थित इसके सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान का इतिहास काफी पुराना है। इतिहासकार पाषाण काल में यहां इन्सानी बस्तियां होने की संभावना जता चुके हैं।
फ्रांसीसी ऑर्कियोलॉजिस्ट प्रोफेसर जैरिग के हवाले से पाकिस्तान टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ईसा पूर्व (बीसी) 6,000 में यहां बोलन नदी क्षेत्र में किसानों द्वारा गेहूं, जौ और खजूर की खेती करने के प्रमाण मिले हैं। ईसा के जन्म से पहले यह इलाका ईरान और टिगरिस व यूफ्रेट्स के रास्ते बेबीलोन की प्राचीन सभ्यता से व्यापार और वाणिज्य के जरिये जुड़ चुका था। बलूचिस्तान के सिबिया आदिवासियों से ईसा पूर्व 326 में विश्व विजयी अभियान पर निकले सिकंदर से भिड़ंत हुई थी। वर्ष 711 में मुहम्मद-बिन-कासिम और फिर 11वीं सदी में महमूद गजनवी ने भी बलूचिस्तान पर आक्रमण किया था, लिहाजा यहां इस्लाम का उभार हुआ। इस प्रांत के ज्यादातर आदिवासियों की शारीरिक बनावट अरबों से मिलती-जुलती है। 15वीं सदी में बलोच सरदार मीर चकर ने बिखरे हुए बलोची समुदायों को एकत्रित किया और दक्षिणी अफगानिस्तान, पंजाब और सिंध के कुछ हिस्सों पर आधिपत्य जमा लिया था। इसके बाद अगले 300 सालों तक यहां मुगलों और गिलजियों का शासन रहा।

संसाधनों पर पाक और चीन की नजर
प्राकृतिक संसाधनों से भरे इस इलाके में लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब है। इसकी गिनती पाकिस्तान के सबसे पिछड़े प्रांतों में होती है।  इस रेतीले इलाके में यूरेनियम, पेट्रोल, प्राकृतिक गैस, तांबा, सोना और अन्य धातुओं का बेशकीमती भंडार मौजूद है। पाकिस्तान इसे अपने विकास और खुशहाली के लिए इस्तेमाल में लाना चाहता है। ग्वादर पोर्ट डेवलपमेंट के नाम पर इस भरपूर संपदा पर चीन की नजर भी गड़ी हुई है। 1952 में इस प्रांत के डेरा बुगती में गैस भंडार का पता चला और दो वर्ष बाद उत्पादन शुरू हो गया। हालांकि, उसका फायदा समूचे पाकिस्तान को हुआ, लेकिन बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा को इस पाइपलाइन से 1985 में जोड़ा गया। इसी क्षेत्र के चगाई मरुस्थल में 2002 में एक सड़क परियोजना शुरू की गयी, जो चीन के साथ तांबा, सोना और चांदी उत्पादन करने की पाकिस्तान की योजना है। इससे हासिल मुनाफे में 75 फीसदी हिस्सेदारी चीन की है और 25 फीसदी पाकिस्तान की। इस 25 फीसदी में से इस क्षेत्र को महज दो फीसदी हिस्सेदारी ही दी गयी है।

क्षेत्रफल – 3,47,190 वर्ग किमी
आबादी – 1,32,00,000  (2011 की जनगणना)
मुख्य भाषा – बलोची, पश्तो, सिंधी, ब्रहुई
राजधानी – क्वेटा (पाक का नौवां सबसे बड़ा शहर)
प्रमुख जनजातियां : बलोची, पश्तून और ब्राहवी
प्रोविंसियल असेंबली सीट : 65
जिलों की संख्या : 32
प्रमुख खनिज पदार्थ : –  कोयला –  क्रोमाइट –  बेराइट्स –  सल्फर –  मार्बल –  आयरन –  लाइमस्टोन


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