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आर्थिक असमानता के इशारे

Posted On September - 12 - 2016

उदारीकरण के 25 साल

11209cd _spotlight_World economyजुलाई 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव द्वारा लागू आर्थिक सुधारों ने भारत को इतना बदल दिया कि अब यह याद करना मुश्किल हो गया है कि तब कैसी-कैसी मुसीबतें हुआ करती थीं । तब करीब दोगुनी रफ्तार से बढ़ने वाले विकासशील देशों में भारत के डिवेलपमेंट मॉडल का मजाक उड़ाया जाता था । उनकी नजर में भारतीय अंतरराष्ट्रीय बैठकों के लिए शानदार रेजॉलूशन्ज ड्राफ्ट करने में माहिर था, इससे ज्यादा कुछ नहीं। लेकिन, आज फोर्ब्स से लेकर गार्डियन तक के जर्नल्स भारत को संभावित सुपरपावर बता रहे हैं। भारत को एकमात्र एशियाई शक्ति के रूप में देखा जा रहा है जो 21वीं सदी में चीन को टक्कर दे सकता है। यही वजह है कि अमेरिका ने न्यूक्लियर क्लब में भारत की एंट्री की व्यवस्था की और अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर रहा है । आलोचक कहते हैं कि आर्थिक सुधारों ने बहुत कम फायदा पहुंचाया है । हालांकि इस पर यकीन करना बेबुनियादी होगा। 2004 से 2011 के बीच रिकॉर्ड 138 मिलियन भारतीय गरीबी रेखा से ऊपर उठे। चीन में भी 1978 से 2002 के बीच 220 मिलियन लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठे थे। ऐसे में देखा जाए तो भारत ने ज्यादा तेजी गरीबी से पीछा छुड़ाया । हालांकि कई गड़बड़ियां अब भी हैं। लाल फीताशाही के चक्कर में हजारों प्रॉजेक्ट्स ठप पड़े हैं। सरकारी सेवाएं अब भी लचर हैं। भ्रष्टाचार, गंदगी और सुस्ती हर जगह नजर आती है। शिक्षा और स्वास्थ्य की दशा अब भी दयनीय है । ये आर्थिक असमानता इशारा कर रही है कि अभी इस क्षेत्र में बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
क्या कहते हैं बीएमएस के आंकड़े
वहीं आज जब शेयर बाजार में जहां एक ओर नीतिगत ब्याज दर में कमी की आहट सुनाई दे रही है, वहीं छोटे निवेशकों और वेतनभोगियों को भी यह चिंता सता रही है कि आने वाले समय में रिटायरमेंट सेविंग्स पर ब्याज दर में कमी की जा सकती है। वित्त मंत्रालय पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (पीपीएफ) और वरिष्ठ नागरिकों के लिए बचत योजना सहित अन्य छोटी बचत योजनाओं पर भी ब्याज दरों में कटौती कर सकता है। वहीं दूसरी ओर यह खबर भी है कि दुनिया के सबसे अमीर देशों की फेहरिस्त में अब भारत भी शामिल हो गया है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और इटली जैसे देशों को पछाड़ते हुए भारत ने टॉप टेन अमीर देशों में सातवां स्थान हासिल कि या है। इसमें भारत की कुल वैयक्तिक संपदा 5,600 अरब डॉलर की है, न्यू वर्ल्ड वेल्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत का स्थान, कनाडा (4,700 अरब डॉलर), ऑस्ट्रेलिया (4,500 अरब डॉलर) और इटली (4,400 अरब डॉलर) से पहले आता है। देश की इस वैश्विक स्थि ति के बावजूद आम जनता चिंतित है, जिससे समझ में आता है दुनिया में जहां देश की स्थिति सुधरी हुई नजर आ रही है वहीं देश के भीतर अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ी है। एक ओर जहां जीएसटी लागू करने की कवायद की गई, वहीं कॉर्पोरेट टैक्स को 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी करने की बात कही गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी ट्रेड यूनियन भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) के अनुसार जीएसटी कार्पोरेट करों को सुगम बनाने के लिए है। इससे आम आदमी पर भार पड़ेगा।
अमीर-गरीब के बीच की खाई
भारत आज दुनिया के तीसरे सबसे ज्यादा अरबपति धन कुबेरों का देश बन चुका है, लेकिन साथ ही साथ इसके अंदर दुनिया की गरीब और भूखी आबादी का एक तिहाई हिस्सा निवास करता है। इसी साल आयी ऑक्सफैम की रिपोर्ट के मुताबिक 1990 में भारत में दो ऐसे उद्योगपति थे जिनकी आय 32 अरब डॉलर थी। 2012 में यह संख्या बढ़कर 46 हो गई और उनकी कुल दौलत 176 अरब डॉलर पहुंच गई। देश के जीडीपी में उनका हिस्सा एक से दस फीसदी तक पहुंच गया। इसके मुकाबले अगर खरीद क्षमता के आधार पर देखा जाए तो देश की अस्सी फीसदी से ज्यादा ग्रामीण आबादी और 70 फीसदी से ज्यादा शहरी आबादी गरीब है। इसके बावजूद गरीबी से निपटने को तरजीह नहीं दी जा रही है। तमाम योजनाओं के पीछे भले ही गरीबी मिटाने के दावे किए जाते हों, लेकिन हालत यह है कि कॉर्पोरेट इंडिया को पांच लाख करोड़ रुपए की टैक्स छूट मिल रही है। इतने पैसे से शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य के भारी अंतर को पाटा जा सकता था। सरकार सेना पर स्वास्थ्य सेवाओं के मुकाबले करीब दोगुना खर्च करती है। जिस पैसे को असमानता से निपटने के लिए खर्च किया जा सकता है, उसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप और टैक्स ब्रेक के द्वारा डाइवर्ट कर दिया जाता है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट के मुताबिक अगर भारत गैर बराबरी में बढ़ोत्तरी का यह सिलसिला रोक दे तो 2019 तक भारत में नौ करोड़ लोगों को भारी गरीबी के दायरे से बाहर लाया जा सकता है। और अगर गैर बराबरी में 36 फीसदी की कमी आ जाए तो भारत में सभी लोगों को बेहद गरीबी से बाहर निकाला जा सकता है। 181 देशों में 26,000 लोगों के बीच किए गए विश्व आर्थिक मंच के ग्लोबल शेपर्स एन्युअल सर्वे 2016 के मुताबिक, भारत में करीब 49.6 प्रतिशत लोगों का मानना है कि सरकार की जवाबदेही, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार एक गंभीर मुद्दा है जो देश को प्रभावित कर रहा है। 39.7 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि सबसे अधि क महत्वपूर्ण समस्या गरीबी है, जबकि 32.7 फीसदी धार्मिक टकराव और 31.1 फीसदी शिक्षा को महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं। देश की प्रति व्यक्ति आय 2011 में 375 डॉलर से बढ़कर आज 1,700 डॉलर हो चुकी है जिसकी बदौलत इसका स्टेट्स लो इनकम से मिडल इनकम वाले देश का हो गया है। हालांकि, चीन हमसे करीब 6 गुना बड़ा है और वहां भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा बदलाव हुआ है।1991 में भारत विकासशील देशों के G77 समूह का सदस्य था। 2016 में यह दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के समूह G20 का गौरवशाली सदस्य है। आज भारत उतना दान देता भी है जितना लेता है। ऐसा नहीं है कि भारत अब विदेशी सहायता नहीं लेता है। लेकिन, अब कर्ज सेवा के महज आधे अरब डॉलर्स का इन्फ्लो है। ठीक इसी तरह, भारत एक बड़ा दानदाता भी है जिनमें अफ्रीका के लिए 10 अरब डॉलर और बांग्लादेश के लिए 2 अरब डॉलर का क्रेडिट लाइन भी शामिल है।
हर साल प्रवासी भारतीय 73 अरब डॉलर भारत भेजते हैं और प्रत्यक्ष विदेशी और पोर्टफोलियो निवेश अक्सर प्रति वर्ष 60 अरब डॉलर के पार कर जाता है। भारत अब बड़े पैमाने पर अपनी जरूरत की पूर्ति कमर्शियल टर्म्स पर करता है ना कि मदद के जरिए।

आय के साथ बढ़ा अंतर
दिलचस्प यह है कि निजी संपत्ति के मामले में एशिया प्रशांत क्षेत्र के शीर्ष पांच देशों में भारत का स्थान है, लेकिन जहां तक प्रति व्यक्ति आय की बात है तो यह सबसे नीचे है। भारत में कुल व्यक्तिगत संपत्ति 4,365 अरब डॉलर है, जबकि इस सूची में चीन 17,254 अरब डॉलर के साथ शीर्ष पर है। वहीं प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से भारत अंतिम तीन में सबसे नीचे है। यहां प्रति व्यक्ति आय 3,500 डॉलर है।
बेरोजगारी भी कम नहीं
बीएसई और सीएमआई की ओर से जुटाए गए आंकड़ों को देखा जाए तो देश में बेरोजगारी भी इसी अनुपात में बढ़ी है। अगस्त महीने के ही आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारी की दर 9.84 फीसदी पर पहुंच चुकी है। शहरी इलाकों में जहां यह दर 11.24 फीसदी रही वहीं ग्रामीण इलाकों में भी 9.18 पर पहुंच गई। भले ही गावों में यह आंकड़ा शहरों के मुकाबले कम हो, लेकिन इसमें बढ़ोत्तरी में ज्यादा तेजी दिखाई दी।

महंगाई जस की तस
वित्त मंत्री अरुण जेटली भी मान रहे हैं कि जीएसटी लागू होने के शुरुआती दौर में टैक्स दर 18 नहीं, 20 से 22 प्रतिशत होगी। जब टैक्स ज्यादा होगा तो महंगाई बढ़ना लाजिमी है। जीएसटी पर अमल के बाद सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में एक से दो फीसद तक उछाल आएगा। वहीं कॉरपोरेट टैक्स घटाकर 25 प्रतिशत पर लाने के एलान के साथ ही विदेशी नि वेशकों को 42 हजार करोड़ रुपए की छूट दी जा चुकी है। अमीरों के कर न चुकाने के रवैये के चलते ही आज केंद्र सरकार के करीब 1.5 लाख करोड़ रुपए के कर मुकदमेबाजी में फंसे पड़े हैं।
कृषि की अनदेखी
कहा जाता है भारत एक कृषि प्रधान देश है। हर 10 में से 7 भारतीय गांवों में रहते हैं। देश के कुल वर्कफोर्स का आधे से थोड़ा ज्यादा हिस्सा कृषि और इससे संबंधित गतिविधियों में लगा हुआ है। लेकिन नई नीति के लागू होने के 10 वर्ष बाद ही कृषि आधारित परिवारों की संख्या 26 फीसदी से बढ़कर 48.6 फीसदी हो गई वहीं संपत्ति पर कर्ज का अनुपात 1.6 से बढ़कर 2.4 हो गया। यही ट्रेंड लगातार जारी रहा। 31 मार्च 2013 तक के आंकड़े बताते हैं कि 1995 से अब तक 2,96 438 किसानों ने आत्महत्या की है। वर्ष 2014 के मुकाबले 2015 में आत्महत्या का आंकड़ा 40 फीसदी ज्यादा रहा।


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