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करंट अफेयर्स: मजबूत होती संबंधों की डोर

Posted On September - 5 - 2016

ge copyजी-20 समिट के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चीन में हैं । चीन का यह दौरा एनएसजी में भारत की सदस्यता को लेकर उसका सहयोग जुटाने के साथ -साथ पाकिस्तान को मिल रही चीनी मदद और दक्षिण चीन सागर पर विवाद के बीच खासा अहम माना जा रहा  है । लेकिन ठीक चीन से पहले वियतनाम का प्रधानमंत्री का दौरा भी कम महत्वपूर्ण नहीं  माना जा रहा । वहीं 27 अगस्त को भारत दौरे पर आये म्यांमार के राष्ट्रपति क्याव की यात्रा के भी कई मायने निकाले जा रहे हैं। दरअसल म्यांमार में जहां चीन का अच्छा खासा दखल है, वहीं वियतनाम को चीन अपना दुश्मन मानता है ।
चीन के साथ विवाद : भारत की तरह वियतनाम भी चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर परेशानियां झेलता रहा है । वहीं आतंकवाद के मुद्दे पर चीन का पाकिस्तान को समर्थन करना भारत के लिए लगातार मुश्किलें खड़ी करता है। भारत,  पाकिस्तान और चीन, इन तीन देशों के आपसी संबंध महाद्वीप के लिए काफी मायने रखते हैं । चीन पाकिस्तान का समर्थन करता रहा है । इस हिसाब से भारत और चीन के संबंध भी तनावपूर्ण बने रहते हैं। हाल के दिनों मे पाकिस्तान को लेकर भारत की आक्रामक नीति से चीन भी परेशान दिख रहा है ।  पाक अधिकृत कश्मीर, बाल्टिस्तान, गिलगित और बलूचिस्तान का जिक्र करके पीएम मोदी ने पाकिस्तान को घेर रखा है । खास तौर पर बलूचिस्तान में जिस तरह से आजादी की मांग जोर पकड़ रही है वो पाकिस्तान के साथ साथ चीन के लिए भी चिंताजनक है । बलूचिस्तान में चीन का आर्थिक हित है । वो वहां अरबों डॉलर निवेश कर चुका है । चीन और पाकिस्तान का आर्थिक गलियारा बलूचिस्तान से ही होकर गुजर रहा है । ऐसे में बलूचिस्तान में आजादी की मांग पाकिस्तान से ज्यादा चीन के लिए खतरनाक साबित हो सकती है । दरअसल चीन बलूचिस्तान के रास्ते भारत पर नजर रखने की फिराक में है । विदेशी मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत के लिए चीन और पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामक रणनीति बनाना बेहद जरूरी है । ऐसे में भारत बाकी एशियाई देशों के साथ अपना सहयोग बढ़ाकर अपना पक्ष मजबूत बनाने पर काम कर रहा है । म्यांमार और वियतनाम भी उन देशों में से हैं जिनके साथ भारत व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध साझा करता है । हाल में एनएसजी में स्थाई सदस्यता के मुद्दे पर भारत को चीन का विरोध झेलना पड़ा । ऐसे हालात में वियतनाम के साथ द्विपक्षिय संबंधों को मजबूत करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक विशेष पहल मानी जा रही है।
दक्षिण चीन सागर क्षेत्र पर है नजर:  भारत का समुद्री व्यापार इसी रास्ते से होता है । वहीं इस इलाके में तेल और गैस की संभावनाओं की तलाश में भी भारत जुटा है । लेकिन चीन अपने हठ पर कायम है । दक्षिण चीन सागर में चीन का वर्चस्व खत्म होने से वियतनाम और भारत दोनों को काफी राहत मिलेगी । इस क्षेत्र से अपना प्रभुत्व नहीं हटाने के चीन के अड़ियल रवैए को देखते हुए भारत और वियतनाम का करीब आना लाजिमी है ।
म्यांमार के साथ संबंध : भारत अपने पूर्वोत्तर में 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा म्यांमार के साथ साझा करता है । इसके बावजूद यह पड़ोसी देश हमारी विदेश नीति में बहुत महत्वपूर्ण नहीं रहा था लेकिन, अब म्यांमार की आंतरिक राजनीति में आमूल-चूल परिवर्तन के साथ वहां लोकतंत्र की बहाली और भारत सरकार का ध्यान पूर्वी एशिया पर केंद्रित होने से इस स्थिति में बदलाव की उम्मीद नजर आ रही है। इस समीकरण में चीन की उल्लेखनीय उपस्थिति तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के बदलते कूटनीतिक परिदृश्य के कारण भी भारत-म्यांमार संबंधों की दशा और दिशा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक विशिष्ट भूमिका निभा सकती हैं।

दोनों देशों के बीच हुए चार समझौते

  • म्यांमार में 69 पुलों का निर्माण और विस्तार
  • भारत-म्यांमार-थाईलैंड अंतरराष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण परियोजना में केलवा-   यार्गी खंड का निर्माण
  • अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग
  • परंपरागत आयुष के क्षेत्र में सहयोग

इस वक्त म्यांमार की आर्थिक जरूरतें ज्यादा हैं और वहां विदेशी निवेश की जरूरत है, तभी उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी । वहीं म्यांमार को लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी मजबूत बनाना है । इन सब के लिए  उसे अपने पड़ोसी देशों से अच्छे रिश्ते रखने ही होंगे । म्यांमार के राष्ट्रपति यू थीन क्याव की चार दिवसीय भारत यात्रा को इसी तौर पर देखा जा सकता है । म्यांमार और चीन अरसे से एक-दूसरे के काफी नजदीक रहे हैं । हालांकि, मौजूदा सरकार के पहले सैन्य शासन के आखिरी दिनों में चीन के कई प्रोजेक्ट को रोक दिया था । लेकिन, अब इस स्थिति में बदलाव आ रहा है । इस कड़ी में सरकार बनते ही आंग सान सू की का चीन दौरा भी देखा जा सकता है।  भारत भी अब कोशिश में है कि वह भी पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को बेहतर गति से बढ़ाये ।  इसीलिए भारत ने म्यांमार के साथ हर कदम पर अपना सहयोग देने को सुनिश्चित किया है । म्यांमार की अपनी कोशिश यही रही है कि वह संस्थागत समर्थन तंत्र को लेकर चीन और भारत दोनों को अपने ऊपर हावी न होने दे । इसलिए म्यांमार इन दोनों प्रमुख पड़ोसी देशों को किसी भी तरह से नाराज नहीं होने देता ।
म्यांमार का सहयोग जरूरी: भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में उग्रवाद बढ़ाने में म्यांमार बड़ा कारक रहा है । जानकारों का मानना है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद पर अंकुश लगाने में म्यांमार बड़ी भूमिका निभा सकता है । लोकतंत्र समर्थक सू की के सत्ता में आने के बाद भारत के लिए यह काम अपेक्षाकृत आसान हुआ है। बढ़ता द्विपक्षीय व्यापार : साल 2013-14 में  द्विपक्षीय व्यापार 2.18 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया था, जो कि 1980-81  में मात्र 12.4 मिलियन डॉलर ही था । भारत म्यांमार से कृषि और वन  उत्पाद आयात करता है तथा उसे स्टील और दवाइयां निर्यात करता है । वर्ष  2008 में निवेश प्रोत्साहन तथा दोहरे कराधान को हटाने संबंधी समझौते भी  हुए थे । भारत और आसियान समूह के समझौते में भी दोनों देश शामिल हैं । भारत के शुल्क-रहित टैरिफ योजना का लाभार्थी म्यांमार भी है ।
म्यांमार के विकास में भारत का सहयोग  : भारत लंबे समय से म्यांमार को इंफ्रास्ट्रक्चर, मानव संसाधन विकास और संस्थानिक क्षमता बढ़ाने के क्षेत्र में सहयोग करता आ रहा है ।
इसी कड़ी में सड़क और  पुल निर्माण की कई परियोजनाओं के साथ-साथ भारत, म्यांमार और थाईलैंड को  जोड़नेवाले एक राजमार्ग का निर्माण भी प्रस्तावित है। यूपीए के  कार्यकाल में हुए एक समझौते के तहत स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और पुलों का निर्माण हो  रहा है । भारत ने म्यांमार के विकास के लिए 500 मिलियन डॉलर से अधिक का ऋण  उपलब्ध कराया है ।
म्यांमार में भारतीय मूल के सवा चार लाख लोग : वर्ष  1983 की आधिकारिक जनगणना के अनुसार म्यांमार में भारतीय मूल के लोगों की  संख्या 4,28,428 है । जो व्यापार और  बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्यरत हैं, जबकि भारतीय मूल के अधिकतर परिवार  कृषि कार्यों से जुड़े हैं । ऐसे में भारत के इन एशियाई देशों के साथ बढ़ते समारिक संबंधों को जानकार अलग -अलग नजरिये से देख रहे हैं ।


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