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भयावह है टीबी की हकीकत

Posted On September - 12 - 2016

12 copyलंदन के इंपीरियल कॉलेज के शोधकर्ताओं ने निजी क्षेत्र में बिकी दवाओं से अनुमान लगाया है कि 2014 में भारत में ट्यूबर क्लोसिस यानी टीबी के मरीजों की संख्या 22 लाख थी। जबकि पहले सिर्फ 8 लाख लोगों के इस बीमारी से पीड़ित होने का दावा किया जा रहा था। वैसे रिपोर्ट में दुनियाभर में इस बीमारी के मरीजों की संख्या अधिक बताई  है।
डब्ल्यूएचओ तथा लैंसेट इन्फेक्शंस डिजीज जर्नल के अनुसार विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि दो साल पहले दुनियाभर में टीबी के 63 लाख मामले सामने आए थे। मगर इंपीरियल कॉलेज ने यह संख्या 96 लाख बताई है और इनमें से 15 लाख मरीजों के जान गंवाने की बात कही है। इस लिहाज से दुनिया भर के टीबी मरीजों में से करीब 25 फीसदी भारत में हैं। हैरानी की बात यह भी है कि इस बीमारी पर नियंत्रण के लिए हम सालाना औसतन 8.1 करोड़ डॉलर खर्च कर रहे हैं। वहीं दुनिया भर में 12 अरब डॉलर झोंककर टीबी से निपटा जा रहा है। देश में टीबी यानी तपेदिक के जितने मरीज होने का अनुमान अब तक लगाया जा रहा था, वास्तविक तादाद उससे दो-तीन गुना ज्यादा होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में यहां इन मरीजों का आंकड़ा सबसे बड़ा है, लेकिन इससे नि पटने के प्रयास उतने ही कमजोर। यहां टीबी से निपटने के लिए पैसा भी दुनिया के मुकाबले 0.68 फीसदी ही खर्च किया जा रहा है।
निजी क्षेत्र के इलाज से बढ़ी समस्या
इंपीरियल कॉलेज के नए शोध में कहा गया है कि भारत में 2014 में लगभग 14.2 लाख मरीजों ने निजी क्षेत्र में इस बीमारी का इलाज कराया था। मगर समस्या यह है कि निजी संस्थाएं टीबी के आंकड़े सरकार को सौंपने में रुचि नहीं दिखातीं। ऐसे में देश में टीबी के मरीजों की वास्तविक तादाद का अनुमान लगाना बेहद मुश्किल हो रहा है। केंद्र ने ऐसा कोई कानून भी नहीं बनाया है, जिसके तहत टीबी के मामलों की सूचना सरकार को देना अनि वार्य हो। ऐसे में असली तस्वी र सामने नहीं आ पाती।
हवा के जरिए फैलती है
सबसे आम टीबी फेफड़ों की ही है, लेकि न यह मस्ति ष्क, गर्भा शय, मुंह, लीवर, किडनी, गला, हड्डी जैसे शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है। टीबी का बैक्टीरिया हवा के जरिए फैलता है। खांसने और छींकने के दौरान मुंह-नाक से नि कलने वाले कणों से यह इन्फे क्शन फैलता है। अगर मरीज के बहुत पास बैठकर बात की जाए और वह खांस नहीं रहा हो तब भी इसके इन्फेक्शन का खतरा हो सकता है। हालांकि फेफड़ों के अलावा बाकी टीबी एक से दूसरे में फैलने वाली नहीं होती और यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली बीमारी भी नहीं है।
शरीर पर इस तरह होता है असर
टीबी का बैक्टीरिया शरीर के जिस भी हिस्से में होता है, वहां के टिश्यू को पूरी तरह नष्ट कर देता है। इससे उस अंग का काम प्रभावित होता है। मसलन फेफड़ों में टीबी हो तो फेफड़ों को धीरे-धीरे बेकार कर देती है। गर्भाशय में हो तो इनफर्टिलिटी (बांझपन) की वजह बन सकती है। हड्डी में हो तो हड्डी को गला देती है। मस्तिष्क में हो तो मरीज को मिर्गी के दौरे पड़ सकते हैं। लीवर में है तो पेट में पानी भर सकता है।

13 copy स्थिति बिगड़ने के ये हैं कारण

  • बजट में कटौती वि श्व स्वा स्थ्य संगठन ने हाल में अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि इस मद में धन की कमी की वजह से जानलेवा बीमारी के खिलाफ वैश्विक लड़़ाई कमजोर पड़ रही है। हालांकि भारत में लड़ाई कमजोर पड़ने की वजह बजट की कमी नहीं, बल्कि कटौती को माना जा रहा है। जानकारों का मानना है कि टीबी पर नियंत्रण के लिए चलाई गई विभिन्न परियोजनाओं की वजह से वर्ष 1990 से 2013 के दौरा न इस पर अंकुश लगाने में कुछ हद तक कामयाबी मिली थी। मगर केंद्र सरकार द्वारा इस मद में धन की कटौती से योजनाओं पर प्रति कूल असर पड़ा है। केंद्र ने 2012 से 2015 के दौरान टीबी संबंधित परियोजनाओं के लिए महज 24.30 करोड़ डॉलर की रकम जारी की, जबकि संस्था ओं ने विभि न्न योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए कम से कम 43 करोड़ डॉलर की मांग रखी थी।
  • जनसंख्या का घनत्व टीबी संक्रमण के जरिए फैलती है, इसलिए बेहद कम जगह में बहुत ज्या दा लोगों के रहने से भी इस बीमारी को फैलने में मदद मि लती है। ऐसे में अप्रत्यक्ष रूप से देश की ज्या दा जनसंख्या से इस बीमार ी के मरीजों में कमी नहीं आ रही। ऐसे में हैरा नी की बात नहीं कि सवा सौ करोड़ की आबा दी वाले इस देश में करीब 40 प्रति शत यानी करीब 48 करोड़ लोगों के शरीर में टीबी का जीवाणु मौजूद है। राहत की बात यह है कि इनमें से 90 प्रति शत अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता से जीवाणु के संक्रमण को बीमारी में तब्दील होने से रोक लेते हैं। मगर 10 फीसदी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से ऐसे नहीं कर पाते हैं।
  • गरीबी व कुपोषण भारत में टीबी के आधे से ज्यादा मामलों का मुख्य कार ण लंबे समय तक पौष्टिक भोजन नहीं मिल पाना है। अध्ययन से यह बात सामने आई है कि भारत में टीबी के 55 प्रति शत मामलों के लि ए कुपोषण जि म्मे दार है। ऑब्जर्वर रिसर्च फा उंडेशन के वि शेषज्ञों का मानना है कि जब तक सभी लोगों को पौष्टिक भोजन और रहन सहन की बेहतर परिस्थिति यां उपलब्ध नहीं करवा दी जाती है। तब तक मात्र डॉक्टरी इलाज से टीबी की समस्या से छुटकारा नहीं पाया जा सकता । जाहिर है गरीबी से निपटे बिना कुपोषण का हल आसान नहीं है। वैसे कई अफ्रीकी देशों में एचआईवी संक्रमण इस बीमारी की सबसे बड़ी वजह है।
  • जागरूकता की कमी टीबी के इलाज के लिए सरकार ने डॉट्स नाम से कार्यक्रम चला रखा है। इसके कई केंद्र देशभर में खुले हैं। इन केंद्र पर मरीजों को विभि न्न दवाओं का एक डोज दि या जाता है, जिसे 18 से 24 महीनों तक लेना होता है। मगर कई मामलों में मरीज दो-तीन हफ्ते बाद स्वस्थ महसूस करने पर अपनी मर्जी से दवा लेना बंद कर देते हैं। ऐसे में उनमें टीवी के लक्षण फि र उभरने लगते हैं और स्थिति बिगड़ भी जाती है।

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