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विदेशों में भारतीय दवाओं का बोलबाला

Posted On September - 19 - 2016

11909cd _EU_bansयूरोपीय यूनियन 700 भारतीय दवाओं पर लगाया प्रतिबंध अब हटाने पर विचार कर रहा है। प्रतिबंध हटाने के पीछे दुनिया में भारतीय दवाओं की बढ़ती साख बताई जा रही है। भारतीय फार्मा सेक्टर दुनिया के पांच सबसे उभरते बाजारों में से एक है।
भारत का फार्मा उद्योग मात्रा के लिहाज से दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा और मूल्य के हिसाब से 14वां बाजार है। प्राइस वाटरहाउस कूपर्स (पीडब्ल्यू सी) की एक रिपोर्टस के अनुसार वर्ष 2020 तक भारत का फार्मा बाजार 74 अरब डॉलर का हो जाएगा। इस बाजार में साल-दर-साल 14 से 18 फीसदी की बढ़त होने की उम्मीद है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां इस सेक्टर को लेकर काफी सकारात्मक हैं। जेनेवा में पिछले दिनों हुई वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में भारत के प्रति आभार प्रकट किया गया था ।
इसकी वजह यह थी कि भारत में बनी सस्ती दवाओं (जेनेरिक) की वजह से दुनिया में लाखों लोगों की जान बचती है। कई विकासशील देशों में भारतीय दवाओं की वजह से लाखों लो ग कर्ज में डूबने से बचे हैं। भारतीय दवाओं का कारोबार विदेशों में तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि इन्हें वि देशी कंपनियों से चुनौतियां भी मिल रही हैं। विकसित देशों ने हमारी दवाओं पर कई तरह के प्रतिबंध भी लगाकर रखे हैं।

कब लगा था प्रतिबंध
भारतीय दवा निर्माता कंपनी जीवीके बायोसाइंसेज की तकरीबन 700 जेनरिक दवाइयों पर यूरोपीय संघ ने जुलाई 2015 में पाबंदी लगा दी थी। यह कार्रवाई क्लीनिकल ट्रायल के आंकड़ों में खामियां पाए जाने के बाद की गई है। जर्मनी की दवा नियामक संस्था फेडरल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिसिन्स एंड मेडिकल प्रोडक्ट्स ने जनवरी में इन दवाओं पर रोक लगाने की सिफारिश की थी। ऐसा कहा गया था कि जीवीके कंपनी ने इन दवाइयों के क्लीनिकल ट्रायल के फर्जी आंकड़े दिए हैं।

अब क्यों हटाना चाहते हैं रोक
59 के यूरोपीय यूनियन भारत से अपने संबंधों को मजबूती प्रदान करना चाहता है। इसके तहत वह इन दवाओं से कुछ शर्तों के साथ पाबंदी हटाने की तैयारी कर रहा है। स्मार्टसिटी परियोजना, भारत की स्वच्छ गंगा, नवीकरणीय ऊर्जा और सूचना तकनीक व संचार के कार्यक्रमों में भारत और यूरोपीय यूनियन की साझेदारी चल रही है। ऐसे प्रतिबंधों से इन योजनाओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है। इस प्रतिबंध के बाद से यूरोप में दवाओं के निर्यात में भी करीब 20 प्रतिशत की कमी देखी गई थी।

ये दवाएं होती हैं सप्लाई

  • कैंसर, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी बीमारियों और संक्रमण संबंधी दवाएं सबसे ज्यादा भारत से सप्लाई होती हैं।
  • कैंसर की एक महीने की ब्रांडेड दवा एक लाख रुपए की आती है। भारतीय फार्मा कंपनी यह दवा सिर्फ 10 हजार रुपए में देती है।
  • अमेरिका और इंग्लैंड जैसे विकसित देशों के लिए भी भारत सस्ती दवाओं का सबसे बड़ा सप्लायर बनकर उभरा है।
  • सन 2000 में एड्स की दवाओं का सालाना खर्च 80 हजार रुपए था। भारत में बनी जेनेरिक दवाइयों की वजह से विकासशील देशों में यह खर्च मात्र 5 हजार रुपए हो गया।

एक कंपनी पर लगा था भारी जुर्माना
अमेरिका में भारतीय दवा निर्माता कंपनी रैनबैक्सी पर 2013 में करीब 2742 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया था। अमेरिकी सरकार के अनुसार, किसी भी जेनेरिक दवा निर्माता द्वारा दिया जाने वाला यह सबसे बड़ा हर्जाना था। एक अन्य भारतीय कंपनी को मुश्किलों का सामना करना पड़ा, वह थी वॉककहार्ट, जिसके अमेरिका स्थित इलिनोइस संयंत्र में कई खामियां पाई गईं। 2014 में ल्यूपिन और यूनिकेम लेबोरेटरीज उन छह वैश्विक दवा कंपनियों में शामिल रही जिन पर यूरोपीय नियामक ने एक फ्रांसीसी कंपनी सर्वियर के साथ सौदा करने के मामले में 42.77 करोड यूरो का सामूहिक जुर्माना लगाया ताकि यूरोपीय संघ में रक्तचाप की दवा पेरिनडॉप्रिल के सस्ते प्रारुप पर रोक लगाई जा सके।

11909cd _Medicinesइन देशों में दवा का कारोबार
आंकड़ों की माने तो भारतीय फार्मा बाज़ार तेजी से बढ़ रहा है। अप्रैल 2016 तक भारतीय फार्मा उद्योग में वृद्धि का जो दौर दिखा उसके मुताबिक यह उद्योग 2,52,000 करोड़ रुपये पर जा पहुंचा है। दुनिया के कई बड़े और ताकतवर मुल्कों से ज्यादा का फार्मा का काराबोर भारतीय फार्मास्यूटिकल कंपनियां करती हैं।

  • अमेरिका-20 हजार अरब रुपए
  • जापान-7.5 हजार अरब रुपए
  • चीन- 6.5 हजार अरब रुपए
  • भारत – 2.5 हजार अरब रुपए
  • भारतीय फार्मा बाजार वर्ष 2020 तक फार्मा बाजार 47598 करोड़ का होने की उम्मीद।
  • 70 फीसदी दवाएं भारत से विकासशील देशों में भेजी जाती हैं।

तरक्की की रफ्तार धीमी
11909cd _pharmaceuticalsसीआईआई और प्राइस वॉटरहाउस कूपर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का दवा उद्योग तरक्की तो कर रहा है, लेकिन इसकी रफ्तार में कमी आई है। 2012 में जहां कारोबार 65,654 करोड़ रुपए का था, 2013 में यह सि र्फ 72,069 करोड़ तक पहुंचा। इसमें जेनरिक दवाओं का हि स्सा करीब 40 हजार करोड़ रुपए है। इस दौर में इसकी ग्रोथ रेट करीब 9.8 फीसदी रही, जबकि पहले यह 15 से 16 फीसदी थी। कमी की वजह देश में रेगुलेटरी रूल्स में कड़ा ई, दवा कीमतों के नए आदेश के साथ ही क्लिनिकल ट्रायल के नियमों में कठोरता और अमेरिकी कार्रवाई है।

अमेरिका और भारतीय बाजार
भारत की दवा कंपनियां अमेरिका को करीब 21 हजार करोड़ रुपए मूल्य की दवाएं सप्लाई कर रही हैं। इससे वहां की कंपनियों में घबराहट है, जिन का वहां की सरकार पर खासा दबाव है। अंतरराष्ट्रीय कारोबार के नए प्रावधानों के कारण अमेरिका भारत से आयात पर तो सीधे रोक नहीं लगा सकता है, लेकिन दूसरे तरीके जरूर आजमाता रहता है।

आंकड़ों पर नज़र

  • इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के अनुसार भारतीय दवाओं का निर्यात 2015-16 तक 1.10 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच जाएगा। वर्ष 2014-15 में यह 91 हजार करोड़ रुपए के करीब रहा। निर्यात में वृद्धि 10 से 12 प्रतिशत रही थी, जो कि 2013-14 में 14 प्रतिशत तक थी।
  • 80 फीसदी मरीज महंगाई के चलते इलाज नहीं करा पाते हैं
  • 10 करोड़ लोग महंगे इलाज के चलते गरीबी में जी रहे।
  • 150 करोड़ लोगों का आधे से ज्यादा खर्च सिर्फ इलाज पर होता है।
  • 10180 करोड़ की दवाओं का निर्यात भारत से यूरोप में गत वर्ष हुआ।

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