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अभावों में पलीं ये बेटियां विदेश में बढ़ायेंगी देश का मान

Posted On November - 28 - 2016

अजय मल्होत्रा, भिवानी

 कबड्डी का अभ्यास करतीं मांढी गांव की खिलाड़ी। -हप्र

कबड्डी का अभ्यास करतीं मांढी गांव की खिलाड़ी। -हप्र

हरियाणा के भिवानी जिले ने शुरू से ही खेलों में खास नाम कमाया है। बात मुक्केबाजी की हो या कुश्ती की, इस जिले ने देश को बड़े खेल सितारे दिये हैं, फिर भला कबड्डी में यहां के होनहार क्यों पीछे रहते। कबड्डी का नया कीर्तिमान इस जिले के एक गांव की बेटियों ने रचा है। यह गांव है मांढी। अगले साल जनवरी में श्रीलंका में होने वाली इंटरनेशनल स्टूडेंट ओलंपिक कबड्डी प्रतिस्पर्धा के लिए जिस टीम का चयन हुआ है उसकी अधिकतर खिलाड़ी इसी गांव से हैं। 18 अक्तूबर को गुजरात में आयोजित नेशनल स्टूडेंट ओलंपिक कबड्डी में दिल्ली को 40 अंकों से मात देकर हरियाणा की टीम विजेता बनी। अब यह टीम श्रीलंका में अपना दमखम दिखायेगी। खास बात यह है कि इस टीम की 11 खिलाड़ियों में से 6 अकेले मांढी और एक निकटवर्ती गांव काकड़ौली हठी से है। नेशनल स्टूडेंट ओलंपिक एसोसिएशन की ओर से गुजरात के बड़ोदरा में 13 से 18 अक्तूबर तक संपन्न कबड्डी मुकाबलों में हरियाणा की लड़कियों की टीम ने 3 टीमों को हराकर फाइनल में जगह बनायी। अंतिम मुकाबले में दिल्ली को 41 अंकों के विशाल अंतर से हरा कर स्वर्ण पदक जीता। इस टीम में शामिल सुशीला, रेखा, भतेरी, मुनेश, ज्योति मांढी गांव से और रितु श्योराण काकड़ौली से हैं। विजेता टीम की खिलाड़ियों को अब जनवरी 2017 में श्रीलंका में होने वाली खेल स्पर्धा के लिए चुना गया है। दिसंबर के अंतिम सप्ताह से जनवरी के तीसरे सप्ताह तक रोहतक के राजीव गांधी खेल स्टेडियम में इन खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया जायेगा। यहां 24 कोच और नेशनल स्तर के कबड्डी विशेषज्ञ इन्हें जीत का मंत्र देंगे।
आर्थिक संकट : जिला मुख्यालय तक जाने का किराया नहीं तो श्रीलंका कैसे जायेंगी
हरियाणा लड़कियों की इस टीम को इंटरनेशनल स्टूडेंट ओलंपिक कबड्डी प्रतियोगिता में भागीदारी का टिकट तो मिल गया, लेकिन श्रीलंका जाने के लिए टिकट के पैसों का प्रबंध नहीं हो पा रहा है। इन सभी 7 लड़कियों के घरों की आर्थिक हालत काफी खराब है। इनमें से 2 खिलाड़ियों के सिर से पिता का साया उठ चुका है और अब उनकी माता ही उनका पालन-पोषण कर रही हैं। दूसरी लड़कियां भी आर्थिक रूप से कमजोर कृषक परिवारों से संबंध रखती हैं। इन परिवारों के लिए बेटियों को श्रीलंका भेजना तो दूर जिला मुख्यालय तक भेजने के लिए किराये का प्रबंध करना मुश्किल हो जाता है। नेशनल स्टूडेंट ओलंपिक एसोसिएशन ने इन छात्राओं के श्रीलंका दौरे का 40 फीसदी खर्च वहन करने की बात कही है।
40 फीसदी खर्च वहन करेगी एसोसिएशन
हरियाणा में ओलंपिक संघों के संघर्ष में युवा खिलाड़ियों का भविष्य बर्बाद हो रहा है। हमें नेशनल पंजीकृत न होने का हवाला देकर खिलाड़ियों को सुविधाएं नहीं दी जा रहीं। ग्रामीण क्षेत्र से संबध रखने वाली ये छात्राएं नाममात्र सुविधाएं और कम समय के प्रशिक्षण के बावजूद इस मुकाम तक पहुंची हैं। दिसंबर-जनवरी में रोहतक में होने वाले प्रशिक्षण और श्रीलंका आने-जाने के लिए नेशनल स्टूडेंट ओलंपिक एसोसिएशन 40 फीसदी खर्च वहन करने के लिए तैयार है।
– प्रदीप भारद्वाज,
महासचिव, नेशनल स्टूडेंट ओलंपिक एसोसिएशन

रेखा, भतेरी : 5 बहनों के सिर से उठा पिता का साया
श्रीलंका दौरे के लिए चुनी गयी टीम में मांढी निवासी रेखा और भतेरी के सिर से बचपन में ही पिता का साया उठ गया। इसके बाद उनकी माता संतोष देवी अपनी पांच बेटियों के पालन-पोषण के लिए संघर्ष कर रही हैं। रेखा व भतेरी दोनों सुबह गांव के बाहर ही जमकर पसीना बहाती हैं और उसके बाद लड़कियों को स्कूल भेज कर स्वयं खेतों में मजदूरी के लिए निकल जाती हैं। स्कूल में आने के बाद रेखा व भतेरी पहले पशुपालन का काम निपटाती हैं और समय बचा तो मां के साथ खेत में मजदूरी के लिए चली जाती हैं। संतोष देवी को शुरू में बेटियों को स्कूल भेजने में भी झिझक होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है।
सुशीला : मां ने खत्म नहीं होने दी उम्मीदें
मांढी निवासी भतेरी देवी को गुजरात में आयोजित नेशनल प्रतिस्पर्धा में हरियाणा की टीम की जीत की खुशी तो है, लेकिन अब श्रीलंका दौरे पर बेटी सुशीला को भेजने के लिए किराए के पैसे का बंदोबस्त करने की चिंता सताने लगी है। पति प्रेम सिंह के आकस्मिक निधन के बाद 5 संतानों की उम्मीदें भतेरी ने ही जिंदा रखी हंै। वह दिल लगाकर अपनी बेटियों की पढ़ाई करवा रही हैं। भूमिहीन होने के बावजूद वह दिनरात मेहनत कर अपनी बेटियों को शिक्षा दिलवा रही हैं। भतेरी देवी इसी उधेड़बुन में लगी रहती है कि उसकी बेटी के श्रीलंका दौरे के लिए पैसों का प्रबंध हो भी सकेगा या नहीं।
मुनेश : जमींदारों के यहां मजदूरी करते हैं माता-पिता
खिलाड़ी मुनेश की माता नीलम और पिता राजू के पास भी नाममात्र कृषियोग्य भूमि है। इसके चलते वे गांव के साहूकार जमींदारों के खेतों में मजदूरी कर अपनी आजीविका चलाते हैं। इसके साथ-साथ गांव में पशुपालन भी करते हैं। खेती से 6 माह में एक बार मिलने वाली नाममात्र की रकम से वे घर चलाने के साथ-साथ अपने बच्चों की पढ़ाई भी करवा रहे हैं। नीलम और राजू का मानना है कि कितनी भी मेहनत करनी पड़े, लेकिन बच्चों काे कामयाब बनाना है। फिलहाल वे बेटी मुनेश को श्रीलंका में भेजने के नाम पर मायूस नजर आते हैं, लेकिन उन्हें भरोसा है कि वे कुछ न कुछ कर लेंगे।
जयश्री : खर्चे की बात पर हाथ खड़े कर देते हैं परिजन
भिवानी जिले के गांव मांढी निवासी खिलाड़ी जयश्री जांगड़ा के भी 5 भाई- बहन हैं। उनके माता-पिता भी कृषि और पशुपालन से अपने परिवार की आजीविका चलाते हैं। सीमित आय के बावजूद उन्होंने अपनी छात्राओं को कॉलेज स्तर की शिक्षाएं दिलवाई वहीं तीसरे स्थान की जयश्री जांगड़ा को अब कबड्डी के लिए प्रोत्साहित तो करते हैं लेकिन श्रीलंका तक जाने व खेल स्पर्धा में भाग लेने के लिए पैसे का प्रबंध करने की बात पर हाथ खड़े कर देते हैं। उनका कहना है कि वे आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं हैं कि बेटी को विदेश दौरे पर भेज सकें। फिलहाल जयश्री का श्रीलंका दौरा राम भरोसे ही है।
ज्योति : संतुष्ट, लेकिन मदद नहीं कर पाते घरवाले
इसी तरह खिलाड़ी ज्योति का परिवार भी खेतीबाड़ी के सहारे ही अपनी आजीविका चलाता है। ज्योति स्नातक अंतिम वर्ष की छात्रा है। वह खेल के साथ-साथ पढ़ाई में भी ठीक है। इसके परिजन अपनी बेटी के खेल से तो संतुष्ट हैं लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा में भागीदारी के नाम पर कोई मदद करने में असहाय नजर आते हैं। उनका कहना है कि खेल संगठनों और सरकार को जरूरतमंद खिलाड़ियों की मदद करनी चाहिए। ज्योति हर हाल में श्रीलंका जाकर अपनी प्रतिभा दिखाना चाहती है। उसे विश्वास है कि उसके इस दौरे के लिए जरूर कोई न कोई व्यवस्था हो जायेगी।
रितु श्योराण : ऊंट नहीं ले पाये, बेटी के लिए खरीदी बाइक
श्रीलंकाई दौरे के लिए भारतीय टीम में चुनी गयीं काकड़ौली हठी निवासी रितु श्योराण की माता सुमित्रा और पिता सूरजभान के पास खेती के लिए 2 एकड़ जमीन है। घर का गुजारा करने के लिए वे अन्य खेतों में सांझी का काम भी करते हैं। ग्रामीणों ने बताया कि सूरजभान भूमि जोतने के लिए स्वयं का ऊंट नहीं खरीद सके, लेकिन बेटी को स्टेडियम तक छोड़ने के लिए उन्होंने मोटरसाइकिल खरीदी है। आज भी उनके घर में मोबाइल तक की सुविधा नहीं है। इसके बावजूद श्रीलंका दौरे के लिए लाखों रुपयों का जुगाड़ करना इस परिवार के लिए आसमान से तारे तोड़ने के समान है।


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