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आखिर किधर बहे जलधारा

Posted On November - 18 - 2016

पानी पर भी राजनीतिक रोटियां सेंकी जा सकती हैं, यह कोई राजनेताओं से सीखे। पंजाब के चुनाव को देखते हुए पंजाब और हरियाणा की सियासत का तापमान इतना बढ़ गया कि एसवाईएल के पानी में उबाल आ गया है। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल व कांग्रेस के कैप्टन अमरेंद्र सिंह किसी  मुद्दे पर साथ आएं या नहीं, लेकिन यह ऐसा मसला है जब दोनों की राह एक ही मंजिल पर जाती है। वे एसवाईएल की जलधारा को हरियाणा जाने से रोकने के लिए एकजुट हैं। अन्य दल भी उनके साथ हैं। उधर, हरियाणा में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर और उनके धुर विरोधी पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा व इनेलो के अभय चौटाला भी पानी हरियाणा में लाने के लिए एक साथ आ गये हैं। सर्वदलीय बैठक के बाद फैसला लिया गया कि कांग्रेस और इनेलो नेता खट्टर के नेतृत्व में राष्ट्रपति व पीएम से मुलाकात करेंगे। -दिनेश भारद्वाज

c copyये हैं सुप्रीम कोर्ट  के आदेश
एसवाईएल के पानी को लेकर चल रही सियासी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने 12 साल बाद एक बार फिर हरियाणा के हक में फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह सेंट्रल एजेंसी के जरिये पंजाब के एरिया में एसवाईएल नहर का निर्माण करवाए, जिससे हरियाणा के सूखे खेतों तक पानी पहुंच सके। सुप्रीम कोर्ट ने 2004 में बने कानून को अमान्य करार देते हुए कहा कि पंजाब एकतरफा संधि को निरस्त नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को नहर पूरा करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में प्रेजिडेंशियल रेफ्रेंस का हवाला दिया, जिसके आधार पर यह फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि हमने जो भी सवाल पूछे थे, सभी के जवाब नकारात्मक हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया था कि क्या पंजाब को यह अधिकार है कि वह अपनी विधानसभा में कोई ऐसा आदेश पारित करे, जिससे दो राज्यों के बीच किसी संधि को खत्म किया जाए? इसका जवाब नहीं में आया।

किसका साथ देगा केंद्र?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐसे मौके पर आया है, जब पंजाब में विधानसभा के चुनाव नजदीक हैं। कभी भी विधानसभा चुनाव का डंका बज सकता है। उत्तर प्रदेश की तरह पंजाब के विधानसभा चुनाव भी भाजपा मुख्य तौर पर पीएम नरेंद्र मोदी की ढाई वर्ष की केंद्र सरकार की लोकप्रियता का ‘पैमाना’ साबित हो सकते हैं। केंद्र सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच के फैसले को लागू करने की चुनौती है तो दूसरी ओर पंजाब के विधानसभा चुनाव सामने खड़े हैं। इन चुनावों में भाजपा का शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के साथ गठबंधन भी है। पंजाब की भाजपा इकाई पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में अकाली दल के साथ खड़ी है। उधर, हरियाणा में भाजपा की ही सरकार है और मनोहरलाल खट्टर मुख्यमंत्री हैं। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार किसके साथ खड़ी होती है हरियाणा या पंजाब।

5 राज्यों में बंटा था पानी
दूसरे राज्यों द्वारा पानी की मांग करने के बाद केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के साथ बैठकर इस विवाद को सुलझाने की कोशिश की। 31 दिसंबर, 1981 को हुए समझौते के तहत पंजाब को 42.20 लाख एकड़ फुट, राजस्थान को 36 लाख एकड़ फुट, हरियाणा को 35 लाख फुट एकड़, जम्मू-कश्मीर को छह लाख 50 हजार लाख फुट एकड़ व दिल्ली को दो लाख फुट एकड़ पानी आवंटित किया गया। इस समझौते में भी पंजाब के हिस्से में अधिक पानी आया। विवाद बढ़ने लगा तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हरियाणा को उसके हिस्से का पानी दिए जाने के उद्देश्य से सतलुज-यमुना लिंक नहर के निर्माण की घोषणा कर डाली। आठ अप्रैल 1982 को इंदिरा गांधी ने पंजाब के पटियाला जिले के गांव कपूरी में 21 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली एसवाईएल नहर के निर्माण की आधारशिला रखते हुए पंजाब में थीन बांध, शाहपुर कंडी परियोजना, आनंदपुर साहिब व मुकेरियां में बिजली घर के निर्माण की घोषणा भी की थी।

 इन जिलों को फायदा
अगर एसवाईएल का पानी हरियाणा में आया तो सबसे ज्यादा फायदा दक्षिण हरियाणा को होगा। अहीरवाल के महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, गुड़गांव, मेवात व झज्जर जिलों के किसानों को खेतों में सिंचाई के लिए पानी मिलेगा। सूखे की चपेट में आ चुके इन जिलों में सिंचाई ही नहीं पेयजल का संकट भी लगातार बढ़ रहा है। राजनीति के जानकारों की मानें तो एसवाईएल निर्माण का यह सबसे बेहतर मौका है, बशर्ते कि सरकार अपनी ‘ताकत’ दिखाए। पंजाब के चुनावों को अगर सामने रखकर एसवाईएल का फैसला होता है तो कम से कम विधानसभा चुनाव से पहले तो नहर निर्माण की शुरुआत होती नजर नहीं आ रही है।

यूं चली पानी के लिए जद्दोजहद  
* 24 मार्च 1976 : केंद्र ने अधिसूचना जारी कर पहली बार हरियाणा के लिए 3.5 एमएएफ पानी की मात्रा तय की।
* 13 दिसंबर 1981 : नया अनुबंध हुआ। पंजाब को 4.22, हरियाणा को 3.50, राजस्थान को 8.60, दिल्ली को 0.20 एमएएफ व जम्मू-कश्मीर के लिए 0.65 एमएएफ पानी की मात्रा तय की गई।
* 8 अप्रैल 1982 : इंदिरा गांधी ने पटियाला के कपूरी गांव के पास नहर खुदाई के काम का उद्घघाटन किया। विरोध के कारण पंजाब के हालात बिगड़ गए।
* 24 जुलाई 1985 : राजीव-लौंगोवाल समझौता हुआ। पंजाब ने नहर बनाने की सहमति दी।
1996 : समझौता सिरे नहीं चढ़ने पर हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
* 15 जनवरी 2002 : सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब को एक वर्ष में एसवाईएल बनाने का निर्देश दिया।
* 4 जून 2004 : सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पंजाब की याचिका खारिज हुई।
* 2004 : पंजाब ने पंजाब टर्मिनेशन आफ एग्रीमेंट एक्ट-2004 बनाकर तमाम जल समझौते रद कर दिए। संघीय ढांचे की अवधारणा पर चोट पहुंचने का डर देखकर राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से रेफरेंस मांगा। 12 वर्ष ठंडे बस्ते में रहा।
* 20 अक्तूबर 2015 : हरियाणा की मनोहर लाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से राष्ट्रपति के रेफरेंस पर सुनवाई के लिए संविधान पीठ गठित करने का अनुरोध किया।

कहानी एसवाईएल की
एसवाईएल यानी सतलुज यमुना लिंक नहर। सतलुज नदी पंजाब में बहती है और यमुना हरियाणा से होकर गुजरती है। इन दोनों नदियों को लिंक किया जाना है। इसीलिए इसका नाम दिया गया है एसवाईएल।

गठन के समय ही बंट गया था पानी
हरियाणा का गठन होने के बाद पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के तहत पानी के मुद्दे पर फैसला हुआ कि अगर दोनों राज्य अपने स्तर पर विवाद को दो वर्ष में नहीं सुलझाते तो फिर केंद्र सरकार इसमें हस्तक्षेप करेगी। दो वर्ष बाद केंद्र सरकार ने अपना फैसला सुनाते हुए हरियाणा को 37.8 लाख एकड़ फुट तथा पंजाब को 32.2 लाख एकड़ फुट पानी दिया। पंजाब ने उस समय केंद्र सरकार के फैसले का खुला विरोध किया। पंजाब का कहना था कि हरियाणा को ज्यादा पानी देने से उसके यहां खेती भूमि प्रभावित होगी और किसानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

इंदिरा गांधी को देना पड़ा दखल
दोनों राज्यों में विरोध बढ़ा मो 1976 में पीएम इंदिरा गांधी को हस्तक्षेप करना पड़ा। इंदिरा की मौजूदगी में दोनों राज्यों में जल समझौता हुआ। औसतन 35-35 लाख एकड़ फुट पानी दोनों में बांटा गया। 1980 में आई एक रिपोर्ट में कहा गया कि रावी-ब्यास आदि नदियों का पानी बढ़कर 171 लाख 70 हजार एकड़ फुट तक पहुंच गया है। ऐसे में पंजाब व हरियाणा के अलावा राजस्थान, जम्मू-कश्मीर तथा दिल्ली आदि राज्यों ने भी पानी पर अपना दावा ठोक दिया।

हरियाणा में 95% बनी, पंजाब में रुका है काम
पंजाब और हरियाणा के बीच एसवाईएल का समझौता होने के बाद दोनों राज्यों में अपने-अपने हिस्से में नहर निर्माण पर भी बातचीत हो गई थी। पंजाब के एरिया में 121 और हरियाणा में 91 किलोमीटर लम्बी नहर की खुदाई होनी थी। हरियाणा ने अपने हिस्से की नहर को 1980 तक 95 प्रतिशत तक पूरा कर लिया था। हरियाणा ने पंजाब के सामने उसके हिस्से में निर्माण का मुद्दा उठाया और 16 नवंबर, 1976 को नहर निर्माण के लिए 1 करोड़ रुपये पंजाब सरकार को जमा करवाए।  हरियाणा में एसवाईएल का पानी पहुंचाने के लिए सिवानी, जूई, लोहारू, जवाहरलाल नेहरू उठान नहरें एवं गुड़गांव नहर का निर्माण हुआ। लेकिन पंजाब में इस नहर का निर्माण रुका हुआ है।

हरियाणा में कई जगहों से टूट चुकी है
राज्य में एसवाईएल को बने हुए ढाई दशक से अधिक समय हो चुका है। इस नहर में जगह-जगह घास खड़ी हो है, वहीं कई जगहों से दीवारें भी टूट गई हैं। नहर में बड़े-बड़े पेड़ भी खड़े नज़र आ रहे हैं। इस नहर की क्षमता 7274 क्यूसिक तय की गई थी, लेकिन इतने वर्षों में गंदगी जमा होने के कारण यह क्षमता कम हो चुकी है। नरवाना ब्रांच पर तैनात सिंचाई विभाग के कर्मचारियों का भी मानना है कि पानी छोड़ने से पहले पूरी नहर की सफाई करनी होगी। कहीं-कहीं तो इसमें मिट्टी भर चुकी है। पानी लाने से पहले इसे साफ करना होगा।

11811cd _syl punjabकर्मचारी भी हो चुके हैं एडजस्ट
एसवाईएल नहर की खुदाई के साथ ही प्रदेश में इसके लिए अलग से स्टाफ नियुक्त किया गया था। सिंचाई विभाग ने इसके लिए अलग से विंग बनाया था। एक्सईएन स्तर के अधिकारी को विंग का इंचार्ज बनाया गया था। फील्ड में भी स्टाफ नियुक्त किया गया था लेकिन समय के साथ-साथ स्टॉफ को सिंचाई विभाग में ही एडजस्ट कर दिया गया। कुछ लोग सेवानिवृत्त भी हो गए। अब इस विंग में किसी तरह का स्टाफ नहीं है।

आतंकवाद का भी पड़ा असर
एक ओर पंजाब और हरियाणा जल बंटवारे को लेकर झगड़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर पंजाब में आतंकवाद पैर पसार चुका था। आतंकवाद का असर एसवाईएल नहर निर्माण पर भी पड़ा। 1988 में पंजाब में गांव मजात में आतंकवादियों ने एसवाईएल के निर्माण में लगे तीस मजदूरों को मौत के घाट उतार दिया था। इसके बाद कुछ दिन तक नहर के निर्माण का काम बंद रहा और बाद में पुलिस पहरे में निर्माण शुरू हुआ। आतंकवादियों ने 3 जुलाई, 1990 को एसवाईएल के चीफ इंजीनियर की हत्या कर दी। इसके बाद नहर का निर्माण कार्य पूरी तरह से बंद कर दिया गया।

हरियाणा में 61 प्रतिशत कम पानी
राज्य के सिंचाई मंत्री भी रहे ओमप्रकाश धनखड़ का कहना है कि हरियाणा के पास उसकी आवश्यकता के हिसाब से पानी नहीं है। प्रदेश में 61 प्रतिशत पानी की कमी है। राज्य के 126 ब्लॉक में से 71 ब्लॉक में भू-जल का अतिदोहन किया जा चुका है।

राज्य के साथ बदल जाती है पार्टी-धारा
कौन किधर
कांग्रेस
केंद्रीय नेतृत्व : अभी तक कोई स्टैंड साफ नहीं है। केंद्रीय नेतृत्व दुविधा में है। पंजाब के कांग्रेसियों का समर्थन करते हैं तो सीधे-सीधे हरियाणा का विरोध होगा। हरियाणा का समर्थन करेंगे तो पंजाब के विधानसभा चुनाव में क्या होगा? इसिलए एक खामोशी ही रास्ता है।
पंजाब कांग्रेस : स्टैंड साफ है। एसवाईएल निर्माण का विरोध और हरियाणा को हिस्से का पानी देने से इनकार। पूर्व सीएम अमरेंद्र सिंह लोकसभा से इस्तीफा तक दे चुके हैं और राष्ट्रपति से भी मुलाकात कर चुके हैं। मजबूरी भी है चुनाव भी सिर पर हैं।
हरियाणा कांग्रेस : पार्टी का एसवाईएल को लेकर रुख साफ है। वह हरियाणा के लिए एसवाईएल के पानी की मांग पर अड़ी है। इससे अच्छा मौका कांग्रेस के लिए नहीं हो सकता जब वह खुलकर एसवाईएल के पानी के लिए समर्थन कर रही है, क्योंकि केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार नहीं है, जो उसे इसके लिए सोचना पड़े।

भाजपा
केंद्रीय नेतृत्व : कांग्रेस की तरह भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी चुप्पी साधी हुई है। कांग्रेस मुक्त भारत का अभियान लेकर चल रहे हैं। पंजाब के चुनाव सिर पर हैं। ऐसे में निर्माण की पहल करें भी तो कैसे। पंजाब में अकाली दल के साथ उनकी गठबंधन सरकार तो हरियाणा में पहली बार पूर्ण बहुमत से पार्टी की सरकार है।  यानी दुविधा और असमंजस है।
पंजाब भाजपा : अकाली दल के साथ गठबंधन है। लगातार दस वर्षोंं से सत्ता में हैं। तीसरी बार आने की कोशिश। इस बार नहर के मुद्दे ही पार पाने की कवायद। राजनीतिक रूप से भी विरोध करना ही ‘फर्ज’ बनता है। समर्थन में ही सियासी फायदा है।
हरियाणा भाजपा : पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता। सबसे बड़ा डर, अगर एसवाईएल का पानी नहीं मिला तो चुनावों में क्या कहेंगे। उधर, पंजाब में भी गठबंधन सरकार आने की चाह।

आप
केंद्रीय नेतृत्व :  दिल्ली में सरकार है। पंजाब में सत्ता में आने की कोशिश। खुद सीएम अरविंद केजरीवाल पंजाब का समर्थन कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद से केंद्रीय नेतृत्व चुप है। कोई स्टैंड स्पष्ट नहीं।
पंजाब यूनिट : लोकसभा में चार सांसद जीते तो विधानसभा की उम्मीदें भी बढ़ गयी हैं। खूब प्रचार भी हुआ। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही कपूरी में मोर्चा शुरू कर दिया। यानी हरियाणा को पानी नहीं देने का खुलकर विरोध। लेकिन बोलने को कोई राजी नहीं।
हरियाणा यूनिट : पार्टी की जड़ें जमाने की कोशिशें हो रही हैं लेकिन वर्तमान में पंजाब की चिंता इससे अधिक है। सो, एसवाईएल पर पूरी तरह से मौन। कोई पूछता भी है तो जवाब नहीं मिलता। हरियाणा इकाई की परेशानी यह है कि अगर वह इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करती है और हरियाणा के लिए पानी मांगती है तो पंजाब में पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

इनेलो
चौ़. देवीलाल ने एसवाईएल के लिए ‘न्याययुद्ध’ किया। न्याययुद्ध ने ही उन्हें सत्ता तक भी पहुंचा दिया था। नहर निर्माण की कोशिशें भी की, लेकिन सिरे नहीं चढ़ी। 1999 से 2004 तक चौटाला सत्ता में रहे। इसी दौरान 2002 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला हरियाणा के हक में आया, लेकिन केंद्र में भाजपा के साथ गठबंधन होने के बाद भी नहर नहीं बन सकी। पंजाब में बादल परिवार के साथ पारिवारिक रिश्ते हैं। अकाली दल के साथ चुनावों में गठबंधन भी रहा है। एसवाईएल पर जब पंजाब धक्काशाही पर उतरा तो अकाली दल से राजनीतिक रिश्ते तोड़ने का ऐलान कर डाला। पारिवारिक रिश्ते आज भी कायम।

पानी तो लेकर ही रहेंगे
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब पंजाब कैबिनेट के फैसलों और विधानसभा में पास प्रस्तावों का कोई औचित्य नहीं है। पानी तो पंजाब को देना ही पड़ेगा। हम इसे लेकर रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू हो इसके लिए राष्ट्रपति व पीएम से मुलाकात करेंगे।
-मनोहरलाल खट्टर
मुख्यमंत्री, हरियाणा

हमारे लिए यह सबसे अच्छा मौका है
2004 में जब पंजाब ने जल समझौतों को रद्द करने का कानून बनाया तो मैं खुद सांसदों को लेकर पीएम से मिला था। प्रेजिडेंशिल रेफरेंस को लेकर भी हमारी सरकार ने 17 बार सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी। पानी लेने का यह सबसे बढ़िया मौका है।
-भूपेंद्र सिंह हुड्डा
पूर्व मुख्यमंत्री, हरियाणा

भाजपा पंजाब में गठबंधन तोड़े
यह जिम्मेदारी प्रदेश की खट्टर सरकार की है कि वह केंद्र सरकार पर दबाव बनाए ताकि सेंट्रल एजेंसी के माध्यम से पंजाब में नहर का निर्माण हो सके। सुप्रीम कोर्ट की हिदायतों में अब रुकावट नहीं है। भाजपा पंजाब में अकाली दल से गठबंधन तोड़े।
-अभय सिंह चौटाला
नेता प्रतिपक्ष, हरियाणा

केंद्र करवाये नहर का निर्माण
पंजाब की बादल सरकार को नहर का निर्माण करवाना चाहिए। अगर बादल निर्माण नहीं करवाते तो फिर केंद्र सरकार को चाहिए कि वह पुलिस, पैरा-मिल्ट्री फोर्स या फिर मिल्ट्री को तैनात करके पंजाब में इस नहर का निर्माण करवाए।
-अनिल विज, कैबिनेट मंत्री हरियाणा।

सुप्रीम कोर्ट ने भी माना हरियाणा का हक
एसवाईएल नहर के मामले को भूतपूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट लेकर गए थे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला सराहनीय है। इस निर्णय में पंजाब के पक्ष को असंवैधानिक और हरियाणा के पक्ष को सही ठहराया गया है।
– डा. अशोक तंवर, प्रदेशाध्यक्ष, हरियाणा कांग्रेस ।

भजनलाल ने पूरा जीवन लगा दिया
स्व. भजनलाल ने एसवाईएल का पानी हरियाणा में लाने के लिए पूरा जीवन लगा दिया था। उन्होंने 9 अप्रैल, 1982 को इंदिरा गांधी से कपूरी गांव में एसवाईएल की खुदाई शुरू करवायी। नहर का ज्यादातर काम उनके कार्यकाल में ही पूरा हुआ था।
-कुलदीप बिश्नोई,
वरिष्ठ कांग्रेस नेता।


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