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एक दांव जीत का

Posted On November - 25 - 2016

पंजाब विधानसभा चुनाव का काउंटडाउन शुरू हो चु्का है। सभी दल एक-दूसरे के नेताओं को अपने पाले में लाकर और नये गठबंधन करके लहर बनाने के प्रयास कर रहे हैं। वादों पर सवार सभी दल दूसरों पर आरोपों के तीर चला रहे हैं। वैसे तो चुनाव में कई दल हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ अकाली, कांग्रेस और पंजाब में पहली बार विधानसभा चुनाव में उतर रही आम आदमी पार्टी के बीच है। कौन किन-किन वादों से पंजाब की चुनावी जंग जीतना चाहता है, बता रहे हैं हमीर सिंह…

संदीप जोशी

संदीप जोशी

आम आदमी पार्टी
भ्रष्टाचार-परिवारवाद पर निशाना
अन्ना हजारे की अगुवाई में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से निकली आम आदमी पार्टी को लोकसभा चुनाव में पंजाब से 24 फीसद वोट हासिल हुए। तब से पार्टी को पंजाब विधानसभा चुनाव में बड़ी ताकत के तौर पर देखा जाने लगा था। नयी होने के कारण इसे अकाली-भाजपा और कांग्रेस की तरह पुराने सवालों के जवाब देने की जरूरत नहीं पड़ती। प्रवासी भारतीय, युवा वर्ग और दलित पार्टी के साथ आ रहे हैं। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल लगातार पंजाब का दौरा कर अकाली सरकार को घेर रहे हैं। वे अपनी रैलियों में भ्रष्टाचार और परिवारवाद पर निशाना साध रहे हैं। उनका कहना है कि अगर आप की सरकार बनी तो वे पंजाब में भ्रष्टाचार पर रोक लगा देंगे। परिवारवाद पर उन्होंने मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल पर धावा बोला। उनका कहना है कि पंजाब में अकाली नहीं बल्कि बादल सरकार है।
रंग ला सकता है बैंस बंधुओं से गठबंधन
केजरीवाल की नरेंद्र मोदी और कई कारपोरेट घरानों के खिलाफ खुली जंग पंजाबियों में उनकी दलेर आदमी की छवि बना रही है। आप एक मूवमेंट की तरह है, इसलिए इसमें नेताओं के अपने-अपने गुट बनाकर ताकत दिखाने की स्थिति में नहीं है। मौजूदा स्थिति को देखते हुए पार्टी ने बादल सरकार के खिलाफ लंबे समय से लड़ते आ रहे सिमरजीत सिंह बैंस और बलविंदर सिंह बैंस (दोनो विधायकों) की पार्टी को पांच सीटें देकर गठबंधन कर लिया है। चुनावी रणनीति के तौर पर यह सही फैसला माना जा रहा है। आम आदमी पार्टी ने बैंस बंधुओं को लुधियाना में पांच विधानसभा सीटें दी हैं। इन पर बैंस बंधु व उनके समर्थित उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरेंगे।
बदलाव लाने का वादा
अपनी रैलियों में अरविंद केजरीवाल अकाली दल पर ही नहीं, बल्कि कांग्रेस पर भी हमला बोल रहे हैं। वे कहते हैं कि कांग्रेस और अकाली अंदर से एक ही हैं। ऐसे ही प्रकाश सिंह बादल हैं और ऐसे ही कैप्टन अमरेंद्र सिंह। दोनों ही परिवारवाद और भ्रष्टाचार से घिरे हुए हैं। वे अपनी रैलियों में बदलाव लाने के लिए आप की सरकार बनाने की अपील कर रहे हैं। केजरीवाल पंजाब को बदलने के लिए एक मौका मांग रहे हैं।
बेनामी संपत्ति पर प्रहार
आप भ्रष्टाचार और नशे को खत्म करने के साथ काली कमाई से बनाई संपत्ति को जब्त करने का वादा कर रही है। केजरीवाल अपनी रैलियों में अकाली मंत्री व सुखबीर सिंह बादल के साले िबक्रम सिंह मजीठिया पर भी निशाना साध रहे हैं। वे आम आदमी की सरकार आने पर मजीठिया को जेल भेजने का वादा कर रहे हैं।
आपसी फूट कर सकती है बंटाधार
आम आदमी पार्टी को गैर पंजाबी पार्टी होने के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। लोकसभा चुनाव से लेकर पार्टी अपने कुनबे को एकजुट नहीं रख पाई है। चार में से दो सांसद डा. धर्मवीर गांधी और हरिंदर सिंह खालसा पहले से ही बागी हैं। पार्टी के संयोजक रहे सुच्चा सिंह छोटेपुर को जिस तरीके से निकाला गया है, उससे भी पार्टी की साख को धक्का लगा है। टिकटों के बंटवारे में बहुत शोर हुआ। वालंटियरों के बजाय पैसे वालों को टिकटें देने और वालंटियरों की बगावतें भी इसके चुनावी गणित को बिगाड़ सकती हैं। अन्य दलों से आए लोगों को भी टिकटें दी जा रही हैं। पंजाब में मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के बारे में उलझन भी उसके लिए बड़ी समस्या है।

अकाली दल
एसवाईएल से उम्मीद
12511cd _SYL_Canalइस बार के विधानसभा चुनाव में अकाली दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती दस साल की सत्ता विरोधी लहर है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी उसे घेरे हुए हैं। लेकिन हाल ही में एसवाईएल पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच के फैसले से उसे राहत मिली है। वह सतलुज-यमुना लिंक नहर के मुद्दे को वोट में तब्दील करने के प्रयास में है। यही कारण है कि अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार ने एसवाईएल का पानी हरियाणा को देने के खिलाफ कानून पास करके किसानों को एसवाईएल के लिए अधिगृहीत की जमीन लौटाने का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही प्रभािवत किसानों को दस-दस हजार रुपए प्रति एकड़ देने का भी एेलान किया है।
इसलिए उठाया कदम
शरोमणि अकाली दल का जमीनी स्तर पर एक पुख्ता वोट बैंक है। अल्पसंख्यकों की नुमाइंदगी की दावेदार होने के कारण इनमें सिख और किसान शामिल हैं। कृषि आधारित राज्य होने के कारण पंजाब की सियासत पर अभी भी किसानों का ही दबदबा है। ज्यादातर गांवों में अकाली दल मजबूत है। इस समय किसानों को सिंचाई के लिए पानी की जो समस्या आ रही है उसमें एसवाईएल के पानी का बंटवारा यहां के किसानों लिए बड़ा मुद्दा है।
पंथक वोटरों का सहारा
किसानों के बाद अकाली दल का सबसे बड़ा वोट बैंक पंथक वोटर हैं। इसलिए अकाली दल विभिन्न धार्मिक यादगारें, दरबार साहिब के इर्द-गिर्द के सौंदर्यीकरण एवं अन्य पंथक मु्द्दों की ओर लौट रही है। अकाली दल के पार्टी अध्यक्ष और विधानसभा चुनाव की कमान संभाल रहे सुखबीर बादल भी यह बात जानते हैं कि पंथक वोटर ही उनकी असली ताकत हैं। यही कारण है कि वे अब उन्हीं को खुश करने में जुटे हैं।
विकास पर आस
इनके अलावा अकाली दल विकास को अपनी जीत की सबसे अहम कड़ी मानता है। पार्टी नेताओं का मानना है कि अकाली-भाजपा सरकार ने दस साल में प्रदेश का जितना विकास कराया है उतना अब तक किसी ने नहीं कराया। अब पार्टी दस साल में कराए गए विकास कार्याें को जनता तक पहुंचाने में जुटी है। इसके लिए अखबारों में विज्ञापनों का सहारा लिया जा रहा है। सरकार की ओर से कराए गसे विकास कार्यों की ‘किताब’ घर-घर बंटवाई जा रही है।
बगावत कर सकती है परेशान
दस साल की सत्ता विरोधी लहर के चलते मतदाताओं की नाराजगी कई जगह काफी बढ़ चुकी है। पंजाब में नशे, खनन, ट्रांसपोर्ट, केबल आदि माफिया के लग रहे आरोपों का कोई वाजब जवाब नहीं है। बादल बजुर्ग हो गये हैं और सुखबीर बादल पार्टी के मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर पार्टी के भीतर और बाहर दोनों में अभी पूरी तरह स्वीकार्य नहीं हैं। बेरोजगारी बहुत बड़ा मु्द्दा है, जो दस साल के शासन के कारण अकाली-भाजपा के खाते में ही आता है। प्रवासी भारतीय और बेरोजगार युवाओं की नाराजगी पार्टी को भारी पड़ सकती है। पार्टी के पांच विधायक इस्तीफा दे चुके हैं।
अगले दिनों में इसे और भी बगावती स्वरों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में अकाली दल पूरी तरह से प्रकाश सिंह बादल के सहारे है। हालांकि सुखबीर सिंह बादल का चुनावी प्रबंधन भी अपना कमाल दिखा सकता है।

कांग्रेस
नशे के खिलाफ खोला मोर्चा
कैप्टन अमरिंदर सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपने से कांग्रेस में जान आ गयी। कांग्रेस की चुनावी रणनीति अमरिंदर के इर्द गिर्द घूम रही है। 2002 से 2007 तक मुख्यमंत्री रहे कैप्टन ने सिखों और किसानों में खास तौर पर अपना रसूख बढ़ा लिया था। फसलों की ठीक बिक्री, बीटी काटन, और जल समझौते रद्द करने के कानूंन के बाद कैप्टन का कद बढ़ गया था। उनको अपने तजुर्बे और सपष्ट बयानी का लाभ मिल सकता है। पहली बार प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार की सेवाएं लेने से चुनाव मुहिम अनुशासित रूप में चल रही है। यह पहली बार है कि कैप्टन इतने लंबे समये से चुनाव मुहिम चला रहे हैं। पार्टी शहरी हिंदू और दलित वोट बैंक के परंपरागत वोट बैंक को साथ लाने के भी प्रयास में है। सिद्धू और प्रगट को साथ लाने का कांग्रेस को लाभ मिल सकता है। कांग्रेस के पास अकाली दल के ख्िालाफ सबसे बड़ा मुद्दा नशे का है। कैप्टन अमरेंद्र सिंह व उनके अन्य नेता अकाली सरकार पर नशे को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं। कैप्टन ने कांग्रेस की सरकार बनने पर तीन महीने में नशा बंद करने का वादा किया है। बिहार में नीतीश की शराबबंदी की तरह कांग्रेस को लगता है कि नशे के खिलाफ उसका अभियान रंग ला सकता है। कांग्रेस बादल सरकार पर प्रदेश को नशे के दलदल में धकेलने का आरोप लगा चुकी है। अकाली नेताओं पर ही नशे की तस्करी मे शामिल होने के आरोप कांग्रेसियों ने लगाए हैं।
किसानों की खुदकुशी का मसला
अकाली सरकार के खिलाफ कांग्रेस किसानों और मजदूरों की खुदकुशी करने के मुद्दे को लेकर भ्ाी निशाना साध रही है। कैप्टन का कहना है कि बादल सरकार ने अपनी जेबें भरने के लिए किसानों के हितों की अनदेखी की है। कभी कृषि में आगे रहने वाले पंजाब के किसान आज खुदकुशी को मजबूर हैं। उन्होंने कांग्रेस की सरकार बनने पर किसानों का कर्ज मार्फ करने और किसी भी तरह की कुर्की नहीं होने देने का वादा किया।
दलितों के हक की लड़ाई
दलितों के खिलाफ अत्याचार को भी कांग्रेस बड़े मुद्दे के तौर पर देख रही है। उसका आरोप है कि अकाली दल की सरकार में दलितों पर अत्याचार बढ़ गया है। बादल सरकार दलितों के हितों की रक्षा नहीं कर पाई है। दलितों के अधिकारों का लगातार हनन किया जा रहा है।
कांग्रेस की परेशानी
अंदरूनी लड़ाई कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा, शमशेर सिंह दूलो कैप्टन को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। कैप्टन के परिवार पर विदेशी बैंक खातों का इलजाम भी उनको बार-बार परेशान कर रहा है। प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बावजूद अब तक हाईकमान उनको मुख्यमंत्री मंत्री पद का दावेदार घोषित नहीं कर रहा जिससे विरोधी यह प्रचार रहे हैं कि संभवत: पंजाब में हरियाणा का इतिहास दोहरा दिया जाए जैसे भजनलाल के नेतृत्व में जीतने के बाद मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हु्ड्डा को बना दिया गया था। कांग्रेस के टिकट आवंटन में देरी और हाईकमान का ज्यादा दखल भी चुनाव मुहिम की राह में रोड़ा बनता है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार का एक कारण टिकटों के बंटवारे में देरी को माना गया था। पार्टी ने सभी दलों से आखिर में टिकटें बांटीं। इससे हुआ ये कि ऐन मौके पर कई सीटों पर कांग्रेस के ही बागी उम्मीदवार खड़े हो गये थे। आम आदमी पार्टी के मैदान में आने के कारण अकाली-भाजपा के दस साल की सत्ता विरोधी भावनाओं का लाभ बंट जाने का खतरा भी मंडरा रहा है।


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