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खोया आधार पाने को कुछ भी करेगी भाजपा

Posted On November - 11 - 2016

अतुल सिन्हा
11111cd _BJP_Flagपूरा देश जहां रातोंरात रद्दी में बदल दिए गए 500 और 1000 के नोटों के जंजाल में फंसा है, वहीं काले धन के नाम पर इतना बड़ा कदम उठाने वाले नरेंद्र मोदी के गुजरात में चुनावी हवा कुछ बदली-बदली सी है। पूरे देश की तरह गुजरात के तमाम शहरों और गांवों में भी लोग सारे कामकाज छोड़कर अपने पुराने नोट बदलने की मशक्कत में लगे हैं। ये मुश्किलें तो आम आदमी झेल रहा है, लेकिन राजनीतिक पार्टियां भी चुनावी मौसम में अपने-अपने खर्चे और हिसाब-किताब को लेकर परेशान हैं।
अगले महीने गुजरात के करीब 10,000 ग्राम पंचायतों के चुनाव हैं और भाजपा इसे लेकर वोटरों को लुभाने के रास्ते भी तलाश रही है। दरअसल, पिछले पंचायत चुनावों में पार्टी को ग्रामीण इलाकों में तगड़ा झटका लग चुका है और वह चाहती है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले सभी 182 विधानसभा क्षेत्रों में उसका बिखरा आधार फिर से हासिल हो सके। इसलिए ग्राम पंचायतों के बहाने इस बार पार्टी दिवाली और नए साल पर स्नेह मिलन कार्यक्रमों की लंबी चौड़ी रूपरेखा बना चुकी है। इस तरह के स्नेह मिलन समारोह पार्टी पहले भी करती रही है, लेकिन इस बार उसकी रणनीति शहरों से ज्यादा गांवों पर केंद्रित है। दिवाली मिलन के ऐसे ही कुछ कार्यक्रमों के दौरान पार्टी के नेताओं ने मोदी सरकार की उपलब्धियां और गांव-गांव तक सरकारी कार्यक्रमों के तहत लोगों को लाभ पहुंचाने की बात जोर-शोर से कही। केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता पुरुषोत्तम रूपाला इन कार्यक्रमों को सीधे तौर पर ग्राम पंचायत चुनावों से जोड़कर देखने को गलत मानते हैं, क्योंकि ये चुनाव पार्टी सिंबल पर नहीं लड़े जाते, लेकिन वे भी ये मानते हैं कि पार्टियां अप्रत्यक्ष रूप से इन चुनावों को प्रभावित तो करती ही हैं और यहां से पार्टियों को अपने जनाधार और वोट बैंक का अंदाजा भी मिलता है।
दूसरी तरफ कांग्रेस भी जिला सम्मेलनों के जरिये चुनावी तैयारियों में लगी है। और यह मुद्दा भी उठा रही है कि पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बावजूद गुजरात में आखिर कैसे शराब माफिया सक्रिय हैं, कैसे वहां फर्जी परमिट बनवाकर लोग शराब हासिल करने में कामयाब हो जाते हैं और कैसे सरकार की दोहरी नीतियों की वजह से शराबबंदी कानून यहां ठीक तरह से लागू नहीं हो पाता है। दूसरी तरफ कुछ संगठनों ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि मौजूदा शराबबंदी कानून में बदलाव किया जाए। हाल ही में गांधीनगर में हुए व्यसन मुक्ति महासम्मेलन में यह मांग जोरदार तरीके से उठाई गई कि राज्य में कानून सख्ती से लागू किया जाए और इसकी कमियों को दूर किया जाए। राज्य के वैधानिक संसदीय मामलों के मंत्री भूपेंद्र सिंह चूडासमा ने यह भरोसा भी दिलाया कि सरकार इस मामले में अगले सत्र में प्रस्ताव ला सकती है।
जाहिर है इस समय गुजरात सरकार के कामकाज से और कई तरह के विवादों और संकटों से लोग खुश नहीं हैं। ऐसे में काला धन के नाम पर मोदी का नया सर्जिकल स्ट्राइक वहां के लोगों को रास नहीं आ रहा। दिल्ली में रहने वाले गुजरात के कई लोग मानते हैं कि बड़े नोट बंद करने का ये फैसला बेशक अचानक जनता के सामने आया हो, लेकिन इसकी तैयारी काफी वक्त से की जा रही थी और तमाम बड़े व्यवसायियों और कारोबारियों की इसकी भनक थी, इसलिए कुछ महीने पहले सोशल मीडिया पर इस तरह की अफवाह भी उड़वाई गई थी। ऐसे में काले धन के कारोबारी बेवकूफ नहीं हैं, यह बात सरकार भी जानती है। लेकिन अपनी ब्रांडिंग और मार्केटिंग में माहिर मोदी के लिए जनता को यह बताने की रणनीति बेहद दूरगामी है कि भ्रष्टाचार रोकने और काला धन को बाहर लाने के मामले में सरकार कितनी सक्रिय है और आम लोगों की कितनी हितैषी है। मोदी खुद ये बताते हैं कि करीब सवा लाख करोड़ का काला धन पहले ही सरकारी खजाने में आ चुका है, ऐसे में आम लोगों को क्या फायदा हुआ.. महंगाई में कमी नहीं हुई, रोज़मर्रा की मुश्किलें बरकार हैं लेकिन सरकारी खजाना लबालब है। प्रधानमंत्री कभी अमेरिका तो कभी जापान में पाए जाते हैं। 38 साल पहले जब मोरारजी देसाई ने 1000, 5000 और 10000 के नोटों पर रोक लगाई थी तब उतना हंगामा इसलिए नहीं मचा था क्योंकि ये नोट कम ही लोगों के पास होते थे लेकिन आज 500 और 1000 के नोट हर आम आदमी के पास हैं और उसकी ज़रूरत बन चुका है। ऐसे में काले धन के नाम पर इन्हें रोककर नए 2000 के नोट लाने को लेकर अब भी कई सवाल उठ रहे हैं। ऐसे ही तमाम सवालों के बीच गुजरात में चुनावी गहमा गहमी बरकरार है लेकिन फिलहाल आम लोग जो मुश्किलें उठा रहा है उससे आशंका जताई जा रही है कि कहीं गुजरात में मोदी के इस सर्जिकल स्ट्राइक का वार कहीं उल्टा न पड़ जाए।


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