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दीदी का तीसरा मोर्चा

Posted On November - 11 - 2016

रीता तिवारी
11111cd _mamatha_benerjiवर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर तीसरे मोर्चे के गठन की कवायद शुरू कर दी है। वैसे, दूसरी बार जीत कर सत्ता में आने के बाद शपथग्रहण के दिन ही उन्होंने इस दिशा में पहल कर दी थी। लेकिन अब मोदी सरकार के विभिन्न फैसलों का पुरजोर विरोध करते हुए अपने पुराने दोस्तों को साथ लेने की कवायद के जरिए उन्होंने इस प्रक्रिया को तेज करने का मन बनाया है। हाल ही में बंगाल में वामपंथी दलों और कांग्रेस की दोस्ती में आई टूट और तृणमूल कांग्रेस व कांग्रेस के बीच बढ़ती करीबी महज संयोग नहीं है।
इस मोड़ पर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या दीदी की निगाहें दिल्ली की गद्दी पर हैं? हालांकि पहले ऐसे सवाल पर ममता साफ कह चुकी हैं कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने की उनकी कोई मंशा नहीं है। वे चाहती हैं कि सहयोगी दल मिलकर आगे बढ़ें। मैं बंगाल में ही खुश हूं। दीदी ने अपने करीबियों से 2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारियों में जुट जाने को कहा है। उनकी दलील है कि नरेंद्र मोदी की कथित जनविरोधी नीतियों से आम लोग परेशान हैं। अपनी बदली रणनीति के तहत ही ममता मनरेगा की रकम सीधे मजदूरों के खाते में स्थानांतरित करने और भोपाल में सिमी कार्यकर्ताओं के साथ कथित मुठभेड़ समेत विभिन्न मुद्दों पर केंद्र पर बरसती रही हैं। हाल में पांच सौ और हजार के नोटों पर पाबंदी के सरकार के फैसले की भी उन्होंने कड़ी खिंचाई की है और कहा है कि देश में आर्थिक आपातकाल जैसे हालात हैं। वे भाजपा पर लगातार सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने के आरोप लगाती रही हैं। बीते महीने दुर्गापूजा और मुहर्रम के दौरान दो तबकों के बीच हुई झड़पों के लिए भी उन्होंने भगवा पार्टी को ही जिम्मेदार ठहराया है। भाजपा के चेहरे पर लगा कथित नकाब उतारने के लिए तृणमूल कांग्रेस ने उसकी सांप्रदायिक नीतियों का जिक्र करते हुए राज्यभर में एक प्रचार पुस्तिका भी बंटवाई है। इसमें भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कटघरे में खड़ा किया गया है।
बदली रणनीति के तहत यहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और लंबे समय तक उसकी सहयोगी रही कांग्रेस के आपसी रिश्तों पर विधानसभा चुनावों के बाद जमी बर्फ भी अब पिघलने लगी है। भाजपा के भूत ने इन दोनों के बीच दूरियां घटाने में अहम भूमिका निभाई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी, जो बीते महीने एक सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, का हाल-चाल पूछने के बहाने दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच संवादहीनता की स्थिति खत्म हो गई है। अब ममता राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के मुकाबले के लिए कांग्रेस के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत बनाने की पक्षधर हैं। यहां पार्टी के सांसदों और पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ एक बैठक में उन्होंने दो-टूक लहजे में अपनी मंशा साफ कर दी है।
अभिषेक के हादसे के बाद फोन पर उनके स्वास्थ्य की जानकारी लेने वालों में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी भी शामिल थीं। बीते लगभग छह महीनों में यह सोनिया व ममता के बीच पहला संवाद था। उसके बाद राहुल गांधी ने भी ममता को फोन किया। इससे रिश्तों में आई खटास दूर होने के संकेत मिलने लगे थे। बीते साल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शपथग्रहण समारोह में ममता व राहुल के बीच आखिरी मुलाकात हुई थी। अब बदलते राजनीतिक-सामाजिक समीकरणों और भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चा बनाने की रणनीति के तहत ममता एक बार फिर कांग्रेस के करीब आ रही हैं। अपने आवास पर हुई बैठक में उन्होंने साफ कहा कि नीतीश कुमार की जद (यू) या समाजवादी पार्टी के लिए अकेले अपने बूते भाजपा का मुकाबला करना संभव नहीं है। उनका कहना था कि भाजपा के खिलाफ प्रस्तावित किसी भी ऐसे धर्मनिरपेक्ष मोर्चे से कांग्रेस को दूर रखने की स्थिति में मजबूती नहीं आएगी। इसलिए कांग्रेस को साथ लेना जरूरी है। ममता ने कहा कि सिर्फ बंगाल ही नहीं, दिल्ली में भी भाजपा का मुकाबला करना होगा। उन्होंने माना कि कांग्रेस पहले के मुकाबले कुछ कमजोर जरूर हुई है। बावजूद इसके उसकी अनदेखी कर किसी मजबूत धर्मनिरपेक्ष गठजोड़ का गठन संभव नहीं है।
ममता की करीबी एक तृणमूल नेता कहते हैं कि हम समूचे देश में धर्मनिरपेक्ष दलों और पार्टियों को एक करना चाहते हैं। तृणमूल कांग्रेस देश की तमाम धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक साथ लाने में एक अहम भूमिका निभाएगी। पार्टी इस मामले में गोंद की तरह काम करेगी। लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल के नेता सुदीप बनर्जी कहते हैं कि राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से ममता के रुख में यह बदलाव महत्वपूर्ण है। अब संसद के शीतकालीन अधिवेशन में मोदी सरकार के फैसलों व नीतियों के विरोध में कांग्रेस व तृणमूल मिल कर हमलावर रुख अपना सकते हैं।
पश्चिम बंगाल में तीन दशकों से भी लंबे अरसे तक परचम लहराने वाली वामपंथी पार्टियों और खासकर माकपा के पैरों तले जमीन तेजी से खिसकने की वजह से ममता बनर्जी की राह आसान हुई है। बीते विधानसभा चुनाव में हाशिए पर सिमटी माकपा यहां ममता की सरकार को कोई चुनौती पेश करने की स्थिति में नहीं है। वह अपना घर ही नहीं संभाल पा रही है। इस वजह से विपक्ष की चिंता से मुक्त होकर दीदी ने अब पूरा ध्यान तीसरे मोर्चे के गठन पर लगा दिया है। अपनी जमीन को रोकने के माकपा की तमाम कवायद अब तक बेकार ही साबित हुई है। पहले तो उसने केंद्रीय नेतृत्व की मर्जी के खिलाफ जाकर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ तालमेल किया था। लेकिन माया मिली न राम की तर्ज पर उसकी राजनीतिक किस्मत बदलना तो दूर, उलटे उसे लगातार केंद्रीय नेताओं व मोर्चा के सहयोगी दलों के हमले झेलने पड़े। अब छह महीने बाद जब कांग्रेस के साथ दोस्ती टूट गई है, वह संगठन में जान फूंकने के लिए तमाम शाखा संगठनों के नेतृत्व में बदलाव पर विचार कर रही है।


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