कार खाई में गिरने से 3 की मौत !    डीजे पर झगड़ा, दूल्हे के भाई की मौत !    तेजाब हमला नाबालिग बेटियों समेत पिता घायल !    गंभीर आरोप, नहीं मिलेगी जमानत !    प्रशिक्षकों को देंगे 15 लाख का इनाम !    पानीपत में आज फिर होगी बात !    अब भाजपा को रोशन करेंगे 'रवि' !    शराब के लिए पैसे नहीं दिए तो मां को मार डाला !    ‘आवेदन मांगे पर नहीं किए हिंदी शिक्षकों के तबादले’ !    नितिन बने चैंपियन !    

पानी के सहारे सत्ता का सपना

Posted On November - 11 - 2016

हमीर सिंह
11111cd _syl_rive_759पंजाब जल समझौता रद्द करने सबंधी 2004 में बनाए कानून को अवैध करार देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सियासी माहौल गरमा गया है। सभी दल इस मुद्दे को लेकर अपनी-अपनी गोटियां फिट करने के लिए मैदान में उतर गये हैं। प्रदेश के चुनावी माहौल में वैसे तो वास्तविक मुद्दों की कमी नहीं है। किसान-मजदूरों की खुदकुशी, बेरोजगारी, नशे में फंसे युवा जैसे कई ऐसे मुद्दे हैं, जिनकी अब तक कोई सुध नहीं ले रहा था। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद राजनीतिक दल एकदम से सकि्रय हो गये हैं। पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष कैप्टन अमरेंदर सिंह ने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस के विधायकों ने भी विधानसभा से इस्तीफा दे दिया है। अकाली दल इसमें कहां पीछे रहने वाला था। उसने अकाली-भाजपा सरकार ने 16 नवंबर को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का एेलान किया है। सरकार इस कानून को रद्द करने की दिशा में काम कर रही है। दिल्ली के मु्ख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल भले ही अभी कुछ नहीं बोले, लेकिन आम आदमी पार्टी ने कपूरी से मोर्चा लगाने का एेलान कर दिया है। पंजाब-हरियाणा सीमा पर कपूरी वह गांव है, यहां 8 अप्रैल 1982 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सतलुज-यमुना जोड़ नहर (एसवाईएल) की आधारशिला रखी थी और अकाली दल एवं सीपीएम ने उसी दिन से मोर्चा लगाने का एेलान कर दिया था।
इस मु्द्दे पर पंजाब की कोई भी पार्टी खुद को कमजोर नहीं दिखने देना चाहती। एसवाईएल का मुद्दा आने के बाद असल जो मुद्दे थे वे कहीं खो गये हैं। सबसे ज्यादा राहत अकाली दल महसूस कर रहा है। दस साल की सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रहा अकाली दल इस मुद्दे को ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं।
पानी का मुद्दा और इस पर सियासत कोई नई नहीं है। एक नवंबर 1966 को पंजाब पुनर्गठन कानून के तहत भाषा के आधार पर बने पंजाब राज्य के समय से ही पानी का मुद्दा यहां की राजनीति के केंद्र में रहा है। पंजाब में से हरियाणा राज्य बनने के बाद से ही चंडीगढ़, पंजाबी भाषा बोलने वाले क्षेत्र और पानी का बंटवारा बड़े तनाव के मु्द्दे रहे हैं। देश में लगी इमरजेंसी के दौरान 24 मार्च 1976 को तत्काली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रावी-ब्यास नदी के कुल 15.85 मिलियन एकड़ फुट (एमएएफ) पानी में से 3.5-3.5 मिलियन एकड़ फुट पानी पंजाब और हरियाणा में बांट दिया था। .2 एमएएफ पानी दिल्ली के लिए सुरक्षित कर दिया था। आठ एमएएफ पानी राजस्थान को दे दिया गया था। इमरजेंसी हटने के बाद पंजाब सरकार ने दावा किया कि पंजाब पुनर्गठन एक्ट की धारा 78 गैर-संवैधानिक है, जिसने केंद्र सरकार को पानी के बंटवारे में दखल देेने का हक दे दिया। संवैधानिक रूप से पानी बंटवारे का मुद्दा राज्य सूची में आता है। इस में केंद्र दखल नहीं दे सकता। पंजाब सरकार 1979 में सुप्रीम कोर्ट पहुंच गयी और इसे रद्द करने की मांग की। सुनवाई चल ही रही थी कि 31 दसंबर 1981 को केंद्र सरकार के दखल से पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों के बीच समझौता करवा के केस वापस लेने का भी फैसला कर लिया। इसी समझौते के बाद 8 अप्रैल 1982 को एसवाईएल की आधार शिला रखी गई।
अकाली दल द्वारा पानी पर लगाया यह मोर्चा बाद में धर्मयुद्ध मोर्चे में तब्दील हो गया और इसी का अगला पड़ाव राज्य मेें उग्रवाद के रूप में देखने को मिला। पंजाब में उग्रवाद के दौरान पुलिस और उग्रवादियों की गोलियों से हजारों जाने गईं। 24 जुलाई 1985 को हुए राजीव-लौंगोवाल समझौते की अन्य बातें लागू नहीं हुई, लेकिन इस दौरान एसवाईएल का निर्माण तेजी से हुआ। सियासत का अपना ही रंग होता है, पानी की एक बूंद नहीं जाने देंगे के नारे लगाने वाला शिरोमणि अकाली दल सत्ता में आते ही एसवाईएल बनवाने भी लग गया था। इस समझौते के दौरान ही इराडी ट्रिब्यूनल का गठन हुआ। 1987 में अंतरिम रिपोर्ट देने के बाद ट्रिब्यूनल का काम ठंडे बस्ते में चला गया।
पंजाब में 73 फीसदी हिस्सा भूजल से सींचा जाता है। केवल 27 फीसदी रकबे में ही नदी जल से सिंचाई होती है। करीब 14 लाख ट्यूबवेल लगातार चलने से प्रदेश का भूजल खतरनाक हद तक गिर गया । पानी के मुद्दे पर पंजाब की सियासत एक बार फिर से उसी जगह आ खड़ी हुई है, जहां से यह चली थी। रायपेरियन सिद्धांत के आधार पर नदी जल का बंटवारे की मांग और एक बूंद भी पानी न देने की बातें माहौल मेंं गरमाहट ला रही हैं। एक बार फिर यह मुद्दा पार्टियों के लिए सत्ता पाने का रास्ता बन गया है। अब देखना यह है कि इस मुद्दे का सबसे ज्यादा फायदा किसका होता है।


Comments Off on पानी के सहारे सत्ता का सपना
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

समाचार में हाल लोकप्रिय

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.