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प्रवासी किसके‍?

Posted On November - 4 - 2016

असम

रीता तिवारी
10411CD _ASAMपूर्वोत्तर राज्य असम में बांग्लादेशी शरणार्थियों के मुद्दे पर राजनीति गरमा गई है। नागरिकता संशोधन विधेयक के मुद्दे पर असम में जारी विवाद के बीच भाजपा नेता और शिक्षा मंत्री हिमंत विश्वशर्मा ने यह बयान देकर आग में घी डालने का काम किया है कि उक्त विधेयक हिंदू और मुस्लिम शरणार्थियों के बीच अंतर करने की भाजपा की नीति है। उन्होंने राज्य के लोगों से अपना दुश्मन चुनने को कहा है। उनका कहना था कि लोग एक-डेढ़ लाख हिंदुओं को दुश्मन मानते हैं या 55 लाख मुस्लिम शरणार्थियों को? इस बयान का भारी विरोध हो रहा है। इस मुद्दे पर राज्य की राजनीति में उबाल आ गया है। अब हिमंत विपक्ष के साथ-साथ अपनी पार्टी के नेताओं के भी निशाने पर हैं। इससे राज्य की साझा सरकार में भाजपा की सहयोगी असम गण परिषद (अगप) के बीच भी दूरी बढ़ने लगी है।
भाजपा के नॉर्थ ईस्‍ट डेमोक्रेटिक अलायंस(नेडा) के संयोजक हिमंत विश्वशर्मा ने इस सप्ताह बांग्‍लादेशी लोगों का मुद्दा उठाते हुए राज्‍य की जनता से अपने दुश्‍मन को चुनने को कहा। उन्‍होंने कहा कि वे 1-1.5 लाख लोग या 55 लाख लोगों में से चुन लें कि उनका दुश्‍मन कौन है? हालांकि उन्‍होंने आंकड़ों को विस्‍तार से नहीं बताया, लेकिन वे हिंदू और मुस्लिम शरणार्थियों की बात कर रहे थे। असम में नागरिकता (संसोधन) बिल पर विपक्ष के सवालों का जवाब देने के दौरान उन्‍होंने यह बयान दिया। हालांकि असम में कितने बांग्‍लादेशी लोग हैं, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन राजनीतिक दलों का कहना है कि राज्‍य में 55 लाख बांग्‍लादेशी मुस्लिम शरणार्थी हैं।
हिमंत का कहना था कि असमिया समुदाय चौराहे पर खड़ा है। हम 11 जिले नहीं बचा सके। अगर यही स्थिति बनी रही तो 2021 की जनगणना में छह जिले और चले जाएंगे। 2031 में बाकी के जिले भी चले जाएंगे। उन्होंने वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर 11 जिलों को मुस्लिम-बहुल बताया। वर्ष 2001 में यह तादाद छह थी। भाजपा नेता ने विधेयक का विरोध करने वालों से पूछा कि किस समुदाय ने असमिया लोगों को अल्‍पसंख्‍यक बनाने की धमकी दी है। नागरिकता (संशोधन) बिल के जरिए पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश में जुल्‍म सह रहे हिंदुओं, बौद्धों, जैन, सिख और पारसियों को नागरिकता देने का प्रस्‍ताव है।
अब पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता तरुण गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा प्रमुख अमित शाह से सवाल किया है कि क्या वे हिमंत के बयान का समर्थन करते हैं? गोगोई का सवाल है कि क्या बांग्लादेश से आने वाले हिंदू और मुस्लिम घुसपैठियों को अलग-अलग नजरिए से देखना ही भाजपा की नीति है? वे कहते हैं कि क्या मोदी के सबका साथ सबका विकास नारे में मुस्लिम शामिल नहीं हैं ? उनका आरोप है कि भाजपा के कुछ नेता राज्य में सांप्रदायिक तनाव पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं। गोगोई ने हिमंत को दूसरा जिन्ना करार दिया है।
इसबीच, अखिल असम छात्र संघ (आसू), अखिल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ और असम जातीयतावादी युवा-छात्र परिषद समेत कई संगठनों ने हिमंत को कट्टरपंथी करार देते हुए उनके बयान के खिलाफ प्रदर्शन किया है। आसू का कहना है कि ऐसे बयान देने वाले नेता को शिक्षा मंत्री के पद पर बने रहने का कोई हक नहीं है। आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने हिमंत के बयान का विरोध करते हुए इससे राज्य में सांप्रदायिक तनाव पैदा होने का अंदेशा जताया है। उन्होंने मंत्री के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण और उकसाने वाला करार दिया है।
aas copy भाजपा नेता के उक्त बयान के बाद अगप व भाजपा गठबंधन के बीच दूरी बढ़ती नजर आ रही है। असम गण परिषद (अगप) के नेता और सरकार के एक मंत्री केशव महंत की इस मामले में टिप्पणी के बाद गठबंधन में पेंच फंसता नजर आ रहा है। हिमंत के बयान का जिक्र किए बिना केशव महंत ने कहा है कि वह असम समझौते के आधार पर विदेशी समस्या (1971 के 25 मार्च तक राज्य में आए लोगों को नागरिकता देना) का समाधान चाहते हैं। यह उनकी पार्टी का दृढ़ संकल्प है। वहीं पूर्व अगप सांसद कुमार दीपक दास ने हिमंत के बयान को उनका व्यक्तिगत विचार बताया है। उन्होंने कहा है कि उनकी टिप्पणी से राज्य वासियों के बीच एक खाई पैदा होगी। अगप नेता व राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत कहते हैं कि असम को विदेशियों की चारागाह नहीं बनने दिया जा सकता। राज्य ने लंबे अरसे तक विदेशियों का बोझ उठाया है। अब 25 मार्च, 1971 के बाद असम में आने वाले बांग्लादेशी शरणार्थियों को किसी भी सूरत में नागरिकता नहीं दी जा सकती चाहे वे किसी भी धर्म को मानने वाले क्यों न हों।
शर्मा के बयान का उनकी अपनी पार्टी में भी विरोध हो रहा है। प्रदेश भाजपा की वरिष्ठ नेता मीरा बरठाकुर ने नागरिकता अधिनियम में संशोधन का विरोध करते हुए कहा है कि धर्म के मुद्दे पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए।
दूसरी ओर, विवाद बढ़ने के बावजूद हिमंत अपने बयान पर कायम हैं। क्या भाजपा बांग्लादेश से आने वाले हिंदू और मुस्लिम शरणार्थियों में फर्क करने की नीति पर चल रही है इस सवाल पर उनका कहना है कि यह सही है। आखिर धर्म के नाम पर ही देश का विभाजन हुआ था। इसलिए यह कोई नई
बात नहीं है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा असमिया लोगों के लिए बेहद संवेदनशील है। इसी मुद्दे पर लंबे अरसे तक असम आंदोलन हो
चुका है। उसी आंदोलन के बाद प्रफुल्ल महंत की अगुवाई वाली अगप सरकार सत्ता में आई थी। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर भड़काऊ बयानों से राज्य में एक बार फिर अस्सी के दशक की पुनरावृत्ति का अंदेशा है।


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