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साधारण घर की बेटी ने ताइक्वांडो में गाड़े झंडे

Posted On November - 7 - 2016

पुरुषोत्तम शर्मा, सोनीपत
10511CD _06वह इसलिए खेलती है, ताकि कोई बेटियों को कमजोर ना समझे और यह हिमाकत ना कर पाए कि वह किसी से कम है। हर कदम और हर मुकाम पर बेटियां बेटों से कहीं आगे हैं। हालांकि कुछ मुश्किलें राह में जरूर आई और सबकी आती भी हैं, लेकिन अगर हौसले और हिम्मत से आगे बढ़ें तो फिर कुछ भी नामुमकिन नहीं है। यही हौसला कुछ अलग करने का जज्बा पैदा करता है और यही आपको दूसरों से अलग बनाता है। वरना, तो सब भीड़ में जी ही रहे हैं। अपना कोई मुकाम बनाना है, तो थोड़ा कष्ट तो उठाना ही होगा। यह कहना है ताइक्वांडो की उभरती हुई युवा खिलाड़ी श्रुति भारद्वाज का।
सोनीपत के राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय की इस छात्रा के हौसले देखते ही बनते हैं। ये महज तीन साल पहले ताइक्वांडो खेल में आई और ऐसी छाई कि एक के बाद एक प्रतियोगिता को अपने नाम किया। हाल ही में तेलंगाना में आयोजित राष्ट्रीय स्कूल खेलों में इस बेटी ने अंडर-17 आयुवर्ग के 44 किलोग्राम भारवर्ग में रजत पदक जीता है।

सोनीपत में अभ्यास करतीं श्रुति।

सोनीपत में अभ्यास करतीं श्रुति।

टैन सूडा में स्टेट चैंपियनशिप में गोल्ड, हरियाणा कप में गोल्ड, नेशनल ओपन चैंपियनशिप में 2 स्वर्ण पदक, स्टेट चैंपियनशिप में कांस्य पदक, स्टेट फेडरेशन में रजत पदक और नेशनल स्कूल गेम्स में हाल ही में रजत पदक अपने नाम किया। यह पहला मौका था, जब किसी सरकारी स्कूल की छात्रा ने स्कूल गेम्स में नेशनल स्तर पर पदक जीता है। श्रुति का कहना है कि अब वह ओपन नेशनल चैंपियनशिप के लिए तैयारी कर रही है।
शुरू में पिता ने किया विरोध
हालांकि शुरुआत में पिता ने थोड़ा विरोध किया कि कहां अभ्यास करेगी, कैसे सब कुछ होगा। पर बेटी की लगन और मेहनत के सामने वह हार गये। उन्होंने हामी भरी, तो पहले उसने स्कूल में ही सीखने का प्रयास किया और बाद में ताइक्वांडो के कोच मनोज पांचाल का सान्निध्य मिला। इसके बाद तो श्रुति की चल निकली। महज छह माह बाद ही श्रुति को जिला फेडरेशन में खेलने के लिए मौका मिला। इसमें श्रुति ने 2014 में अपने आयुवर्ग में गोल्ड मैडल हासिल किया। इसके बाद तो उसने कभी मुड़ कर नहीं देखा।


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