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सेवकाई से स्वामीगीरी तक

Posted On November - 4 - 2016

पुडुचेरी

विनय ठाकुर  
10411CD _NARAYAN SAMIपॉंडिचेरी (पुडुचेरी) के मुख्यमंत्री नारायणस्वामी (नारायण सामी) का समय राजनीतिक करिअर के हिसाब से अच्छा चल रहा है। वे सेवकाई के जरिए स्वामीगीरी की कला को सिद्ध करने वाले उन चुनींदा भारतीय नेताओं में हैं जिनकी शक्ति ‘ऊपर’ से आती है। आगामी विधानसभा उपचुनाव की अग्निपरीक्षा में उनकी राह कोई खास कठिन नहीं दिखती है। हालांकि झारखंड जैसे राज्य में मुख्यमंत्री के चुनाव हारने की मिसाल रही है पर वैसी स्थिति के लिए विपक्षी उम्मीदवार के पक्ष में जबर्दस्त गोलबंदी व रणनीति चातुर्य जरूरी है। एआईडीएमके प्रमुख जयलिलता के स्वास्थ्य व कांग्रेस नेता राहुल गांधी के अम्मा के हालचाल के लिए अस्पताल दौरे ने इसे थोड़ा कठिन बना दिया है। तमिलनाडु व पांडिचेरी में कांग्रेस की सहयोगी डीएमके के नेता स्टालिन से लेकर करुणानिधि तक से नारायण स्वामी के ताल्लुकात बेहतर हैं।  जमीनी पकड़ वाले नेता के रूप में अपने को साबित करना उनके राजनीतिक करियर के लिए काफी अहम  है।
केंद्र की राजनीति के लिहाज से पांडिचेरी के मुख्यमंत्री की जीत कोई बड़ी घटना नहीं होगी, पर जिस तरह से लगातार कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की संख्या कम हो रही है उस माहौल में अपने आत्मविश्वास को बनाए रखने के लिए कांग्रेस के लिए यह जरूरी है। इस बात को मुख्यमंत्री नारायण स्वामी भी अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए संख्या के लिहाज से नेल्लीथोप्पे विधानसभा में दलित वोटों की महत्ता नहीं होने के बावजूद वीसीके नेता थिरूमावलावन के समर्थन को महत्व देते हुए प्रचारित किया जा रहा है। 2016 के  विधानसभा चुनावों में बुरी तरह नकार दिए जाने के बावजूद पीपुल्स फ्रंट के चेहरा रहे विजयकांत से सहयोग  को भी अहमियत दी गयी।  2 नवंबर को उन्होंने नेल्लीथोप्पै विधानसभा सीट से अपना नामंकन भर दिया। उनके खिलाफ मैदान में सबसे मजबूत उम्मीदवार के रूप में एआईडीएमके के पूर्व विधायक ओम शक्ति शेखर मैदान में हैं। यह सीट मुख्यमंत्री के लिए कांग्रेसी विधायक ए. जॉनकुमार ने खाली की है।
इस बार के विधानसभा चुनावों में वी. नारायण स्वामी ने अपने प्रयासों से कई व्यवसाइयों को कांग्रेस के  पाले में लाकर चुनावों में  पार्टी का पलड़ा भारी किया। ऐसे विधायकों में जॉनकुमार  भी शामिल थे। वे पॉडिचेरी में सबसे अधिक मतों से चुनाव जीतने वाले विधायकों में शुमार हुए। इसलिए जब मुख्यमंत्री के लिए विधानसभा सीट की तलाश आरंभ हुई तो नेल्लीथोप्पे का नाम शुरू से ही चर्चा में था। नारायण स्वामी को पांडिचेरी की राजनीति में काफी घाघ माना जाता है। उनके विरोधी उन्हें नारी (सियार) का दर्जा देते रहे हैं। कारण वे हाईकमान के नजदीक होने की कला में सिद्धहस्त माने जाते हैं जिसकी वजह से वे यहां के कई जमीनी नेताओं को कुर्सी की दौड़ में पटकनी देने में सफल रहे हैं।
pan copyकांग्रेस के चुनाव में विजय होने पर यहां राजनीतिक गणित (मतदाता संख्या समीकरण) के हिसाब से कौंड्र नेता ओम नम:शिवाय का नाम चर्चा में आया था। आलाकमान की ओर से शासन की अनुभवहीनता के आधार पर जब उनकी दावेदारी खारिज हुई तो उस समुदाय के लोगों ने हिंसक प्रदर्शनों के जरिए दबाव बनाने की कोशिश भी की, पर नारायण स्वामी इन सारी मुश्किलों पर फतह पाने में कामयाब रहे। अपने अनुभव व राजनीतिक चतुराई का फायदा उठाते हुए वे यहां के उपराज्यपाल की हाई वोल्टेज कार्यशैली के चपेट में आने से बचते रहे। इस तरह वे अरविंद केजरीवाल वाले हश्र से बचते हुए जनता को अपने शासन के दौरान होने वाले ठोस फायदों को दिखाने में सफल रहे हैं। रियल एस्टेट से लेकर उद्योगपतियों में उनकी छवि तरक्की की ओर ले जाने वाले नेता की बनी है। लेनेवो जैसी कंपनी के पांडिचेरी में आने की चर्चा से मुख्यमंत्री को फायदा ही होगा।  एक ओर जहां विपक्ष बिखरा नजर आ रहा है, वहीं सत्तापक्ष के विभिन्न धड़ों में दरार भितरघात की सीमा की ओर जाता नहीं दिखता।


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