मोदी और ट्रंप ने फोन पर की बातचीत !    साढ़ू को करोड़ों का फायदा पहुंचाने के मामले में केजरीवाल की मुशिकलें बढ़ीं !    विभाग किये छोटे, कर रही निजीकरण !    रिमी सेन भाजपा में, सनी देओल की भी चर्चा !    शिल्पा शेट्टी बोलीं-मुलाकात के बाद आया 'चैन' !    शाहरुख को देखने स्टेशन पर भगदड़, एक की मौत !    बुजुर्गों ने की सरकार की हाय-हाय !    गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में दिखेगा धनुष का ‘शौर्य’  !    यूपी में बहुमत तो बनेगा मंदिर : भाजपा !    सीबीआई की परीक्षा !    

अपने ही गिराते हैं नशेमन पे बिजलियां

Posted On December - 30 - 2016

cm copyमुलायम परिवार में चल रहे ‘दंगल’ को देखकर इतिहास की वह घटना याद आ जाती है जब हुमायूं की मौत के बाद अकबर का राज्यारोहण हुआ था। उस समय अकबर की उम्र 14 साल थी। अकबर को गद्दी पर बैठाकर बैरम खां, जिन्हें अकबर बाबा कहते थे, ने सत्ता अपने हाथ में ली। अकबर गद्दी पर विराजमान थे और शासन बैरम खां चला रहे थे। अकबर जब 16 साल के हुए, तो उन्होंने सत्ता को अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया। अपने ढंग से विभिन्न राज्यों में पदाधिकारी नियुक्त किये। बैरम को जब यह लगा कि अकबर धीरे-धीरे सत्ता अपने हाथ में ले रहे हैं, तो उन्होंने बगावत कर दी। इतिहास गवाह है कि यह बगावत कई बार  हुई और अकबर ने बैरम खां को कई बार माफ भी किया, लेकिन फिर चतुराई से अकबर ने बैरम खां को हज के लिए भेज दिया था।  लेकिन अखिलेश के साथ उलट हुआ। मुलायम ने कठोर कदम उठाते हुए अपने बेटे व मुख्यमंत्री अखिलेश को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है। सपा परिवार टूट  गया है । अखिलेश  अब क्या करेंगे? सपा का क्या होगा? इन सबके बारे में बता रहे हैं  बृजेश शुक्ल…

कैसे शुरू हुई थी रार
2012 के विधानसभा चुनाव में जब समाजवादी पार्टी को बहुमत मिला, तो यादव कुनबे के अधिकांश लोग चाहते थे कि मुलायम सिंह यादव ही मुख्यमंत्री बनें। लेकिन मुलायम ने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने की जिद पकड़ी और अखिलेश का सकुशल राज्यारोहण करने का जिम्मा राम गोपाल यादव को दिया। वास्तव में शिवपाल सिंह यादव तब भी अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाये जाने का विरोध कर रहे थे। अखिलेश मुख्यमंत्री बन गये। लेकिन यह आरोप लगे कि अखिलेश तो आधे मुख्यमंत्री हैं। उनके पिता और चाचा ही शासन चलाते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में यादव परिवार ने एक स्वप्न देखा कि राज्य में सपा इतनी सीटें जीत जाये, जिससे दिल्ली की सत्ता बिना सपा की मर्जी के न बन सके। समाजवादी पार्टी के यह मानकर चल रहे थे कि केंद्र में बहुमत किसी को नहीं मिलेगा और तब सभी धर्म निरपेक्ष दलों की मजबूरी होगी कि प्रधानमंत्री पद के लिए मुलायम सिंह यादव के नाम पर सहमति जता दें। मुलायम प्रधानमंत्री बन जायेंगे, लेकिन मोदी की ऐसी लहर चली कि  समाजवादी पार्टी को सिर्फ पांच सीटें मिली वह भी परिवार की। लड़ाई यहीं से शुरू हुई। शिवपाल सिंह यादव ने सत्ता में पकड़ बनाने की कोशिशें और तेज कर दी। उन्होंने आवाज उठाई कि मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री बना दिया जाये। मुख्यमंत्री पद संभालना अखिलेश के बूते की बात नहीं। लेकिन इस पराजय ने सत्ता के नये समीकरणों को जन्म दे दिया। अखिलेश यादव ने जब हार का ठीकरा अपने ऊपर फूटते देखा तो उन्होंने तय कर लिया कि सत्ता भी वही चलायेंगे और फैसले भी वही लेंगे। अखिलेश ने सरकार के सारे पेंच कसने शुरू कर दिये। विकास की नयी योजनाएं बनाईं, अपने मनपसंद अफसरों को मुख्य स्थानों पर बैठाया। यह निर्देश भी दे दिये कि सभी विभागों के महत्वपूर्ण निर्णयों की जानकारी उन्हें दी जाये। इस निर्णय ने शिवपाल यादव सहित उन तमाम लोगों को हिला दिया, जो अब तक सत्ता के केंद्र में थे और अफसरों की तैनाती से लेकर हर निर्णय अपनी मर्जी से कराते थे। शिवपाल सिंह यादव ने इसकी शिकायत मुलायम सिंह यादव से की।

क्यों बढ़ी पारिवारिक कारण
इस सारी लड़ाई में मुलायम सिंह यादव अपने पुत्र के साथ न होकर भाई के साथ खड़े हैं। जब से परिवार दो भागों में बंटा है, तब से इस बात की चर्चा आम है कि शिवपाल सिंह यादव और अखिलेश की सौतेली मां के परिवार के बीच आना-जाना है, जबकि अखिलेश यादव ने सौतेली मां साधना यादव के परिवार को कभी अपना माना ही नहीं। समाजवादी पार्टी के एक नेता बताते हैं कि इस लड़ाई में उन लोगों की भी भूमिका है, जिनके पास मुलायम सिंह को अपनी बात समझाने का मौका ज्यादा मिलता है। साधना यादव और उनका परिवार मुलायम के साथ ही रहता है, जबकि अखिलेश यादव अलग रहते हैं। मुलायम को लगता है कि अखिलेश परिवार को दरकिनार कर दोस्तों के कहने पर चल रहे हैं। मुलायम ने अखिलेश से कहा था कि देश दीपक सिंहल को फिर से मुख्यसचिव बना दिया जाए और शिवपाल यादव को फिर से मंत्री बनाकर उनके पुराने विभाग लौटा दिए जाएं, लेकिन अखिलेश यादव ने अपने पिता की अन्य बातें तो मान ली, लेकिन यह दोनों बातों को अनसुना कर दिया। इससे परिवार में कलह और बढ़ गई।

सियासी कारण
आरोप है कि अमर सिंह सपा की आंतरिक स्थितियों पर पैनी नजर रखे हुए थे। सपा के कुछ नेताओं का मानना है कि अमर सिंह उन नेताओं के संपर्क में थे, जो अखिलेश के खिलाफ अभियान चला रहे थे। आरोप यहां तक लगते हैं कि इस संबंध में दिल्ली में कई बैठकें हुईं। अमर सिंह ने यह तक कह डाला कि जल्द ही उत्तर प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन हो जायेगा। कहा यह भी जाता है कि अमर सिंह शिवपाल यादव की मुख्यमंत्री बनने की उस चाहत को हवा दे रहे थे, जो अखिलेश के बनने के बाद टूट गई थी। मुख्यमंत्री को इसकी सूचनायें मिल रही थीं। पार्टी के थिंक टैंक कहे जाने वाले राम गोपाल यादव पूरी तरह अखिलेश के साथ खड़े थ्ो। अमर सिंह यह मानते रहे कि राम गोपाल यादव के कारण ही उनकी समाजवादी पार्टी से छुट्टी हई थी। जब अमर सिंह की सपा में वापसी हो रही थी, तब भी राम गोपाल यादव और आजम खां ने इसका भारी विरोध किया था। राम गोपाल यादव जो कभी मुलायम सिंह के अतिप्रिय थे, उनसे ही मुलायम नाराज हो गये। मुलायम सिंह यह मान बैठे कि राम गोपाल यादव के कारण फूट पड़ रही है। राम गोपाल और अखिलेश ने अमर सिंह को बाहरी का नाम दिया और बार-बार यह आरोप लगाया कि इस बाहरी के कारण ही मुलायम परिवार में फूट पड़ी और यह जिस परिवार में घुसे वहां आपसी झगड़े करा दिया।

सपा परिवार
spa copy1969 में मुलायम सिंह यादव अकेले ही राजनीति की राह पर चले थे। वह इटावा के जसवंत नगर से विधानसभा सीट पर विधायक चुने गये। 1977 में वह उत्तर प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार में मंत्री बने। इसके बाद मुलायम सिंह की कांग्रेस के नेता बलराम सिंह यादव से भिडंत हुई। यह कई बार हिंसक हुई। बैलेट के बजाय बुलेट के दम पर इस जंग का निर्णय करने की कोशिशें हुईं, लेकिन जंग मुलायम जीते और इसमें सहायक बने मुलायम के भाई शिवपाल सिंह यादव, उनके चचेरे भाई राम गोपाल यादव। मुलायम परिवार की राजनीतिक ताकत ज्यों-ज्यों बढ़ती गई, परिवार के तमाम सदस्य भी राजनीति में आते गये। राम गोपाल के पुत्र अक्षय यादव मैनपुरी से सटी सीट फिरोजाबाद से सांसद हैं। मुलायम के ही एक अन्य भतीजे रणवीर सिंह यादव के पुत्र तेजप्रताप यादव मैनपुरी से सांसद हैं। मुलायम के एक और भतीजे धर्मेन्द्र यादव बदायूं से सांसद हैं। पुत्रवधू डिंपल कन्नौज से सांसद हैं। मुलायम आजमगढ़ से सांसद हैं। राम गोपाल राज्यसभा के सदस्य हैं। शिवपाल के बेटे आदित्य यादव सहकारी संस्था पीसीएफ के चेयरमैन हैं।
3 बार बनी सरकार
उत्तर प्रदेश में अब तक समाजवादी पार्टी की तीन बार सरकार बन चुकी है। मुलायम िसंह के नेतृत्व में पहली बार 1993 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी। यह केवल 183 दिन चल पाई । इसके बाद मुलायम सिंह को सत्ता के लिए दस साल तक इंतजार करना पड़ा। 2003 में एक बार फिर सपा की सरकार बनी। मुलायम मुख्यमंत्री बने। इसके बाद वर्ष 20012 सपा की सरकार बनी और अखिलेश सीएम बने।

35 से 40 सीटों पर ही था विवाद
समाजवादी पार्टी दो फाड़ हो गयी है । 29 दिसम्बर की रात जिस समय पूरा देश सो रहा था, राजधानी लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग में सांयरन बजाती दौड़ती गाड़ियां यह बताने के लिए काफी थी कि समाजवादी पार्टी में कोई निर्णय होकर रहेगा। अखिलेश और शिवपाल खेमा एक दूसरे को शह और मात देने के खेल में लगे थे। वास्तव में पूरा यादव परिवार इसी विक्रमादित्य मार्ग पर रहता है। शिवपाल यादव बार-बार मुलायम सिंह यादव से मिलने पहुंच रहे थे। अखिलेश ने जब शाम को मुलायम से अलग अपने 235 उम्मीदवारों की सूची जारी की, तो स्पष्ट हो गया कि अब समाजवादी पार्टी की लड़ाई निर्णायक मोड़ में पहुंच गई है। इन 235 प्रत्याशियों में 195 नाम वहीं थे, जिन्हें मुलायम सिंह यादव ने जारी किया था। दिलचस्प तथ्य यह है कि इस सूची में अखिलेश यादव के छोटे भाई की पत्नी अर्पणा यादव का नाम नहीं था। अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह यादव से लगातार कह रहे थे कि प्रत्याशियों की उनकी सूची के नामों पर भी विचार किया जाये। एकतरफा नामों की घोषणा न की जाये। लेकिन शिवपाल यादव के कदम से साफ जाहिर था कि वह अखिलेश से युद्ध के लिए तैयार हैं। शायद शिवपाल यादव यह समझ रहे थे कि अखिलेश यादव के सामने उनके द्वारा घोषित नामों को स्वीकार कर लेने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि विवाद सिर्फ 35-40 सीटों पर था, जिसे आपसी बातचीत कर निपटाया जा सकता था।
बाप-बेटे का अपना-अपना सर्वे
mulayam_sp-2-3_650_022215090551 copyअखिलेश जब 29 दिसम्बर को मुलायम सिंह यादव से मिलने गये तब उनके बातों को गंभीरता से नहीं लिया गया। अखिलेश का कहना था कि जो सूची जारी की गई है, उसमें संशोधन किया जाये। मुलायम ने अखिलेश से कहा कि उन्होंने सर्वे के आधार पर टिकट बांटे हैं। यानी जो जीतने वाला है, उसे ही टिकट दिया गया है। अखिलेश ने अपने सर्वे को सामने रखा और कहा कि उनका सर्वे अलग है। अब अखिलेश ने यह ठान लिया है कि जिन प्रत्याशियों पर उनको आपत्ति है, उन पर वह अलग प्रत्याशी लड़ायेंगे। ऐसे प्रत्याशियों की संख्या 50 से भी अधिक है।

इसलिए नाराज हुए अखिलेश
आरोप है कि अखिलेश यादव के समर्थकों को टिकट नहीं दिया गया। कैबिनेट मंत्री अरविन्द सिंह गोप पार्टी के पुराने नेता हैं और बाराबंकी में उनका प्रभाव है, उनको टिकट नहीं दिया गया। राम गोविन्द चाैधरी बहुत पुराने समाजवादी नेता है और समाजवादियों के बीच उनका सम्मान भी है, लेकिन उन्हें टिकट नहीं दिया गया। अयोध्या के विधायक पवन पाण्डेय अखिलेश के बहुत नजदीकी है, लेकिन उनकी जगह पार्टी के ही एक वरिष्ठ नेता जयशंकर पाण्डेय के पुत्र को टिकट दे दिया गया। अभी कुछ माह पहले ही सीतापुर के बिसवां क्षेत्र के विधायक रामपाल के अवैध कब्जों को ढहाया गया था। सरकारी जमीन पर किये गये कब्जे को हटाने का निर्देश हाईकोर्ट ने दिया था। तब रामपाल ने अखिलेश को दुर्योधन करार दिया था।  लेकिन दो दिन पहले रामपाल को पार्टी में लाया गया और उन्हें टिकट दे दिया गया। अखिलेश इस बात का लगातार विरोध कर रहे थे कि अतीक अहमद को टिकट न दिया जाये। अतीक अहमद को इलाहाबाद से दो सौ किलोमीटर दूर लाकर कानपुर से टिकट दिया गया। अतीक अहमद ने कानपुर पहुंचने पर एक विज्ञापन दिया उनके समर्थक असहला न लायें। वास्तव में अतीक अहमद का इतिहास ही असलहों और गुंडागर्दी से भरा है। समाजवादी पार्टी में यह सवाल उठ रहे हैं कि मुलायम और शिवपाल ने अतीक अहमद में ऐसी क्या खूबी देखी जो उनको अखिलेश के विरोध के बावजूद टिकट देने को उतावले हो गये।  अमरमणि का बेटा अमनमणि त्रिपाठी पर अपनी पत्नी की हत्या का आरोप है, सीबीआई ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। अखिलेश के कहने के बावजूद अमनमणि का टिकट नहीं काटा गया और उसका टिकट बरकरार रखा गया, जबकि वह इस समय जेल में हैं। यदि सपा में ही यह प्रश्न पूछे जा रहे हैं कि क्या गुंडों की फौज इकट्ठा की जा रही है। सपा में एक दूसरे को मात देने की जो कोशिशें हो रही है उससे स्थिति बिगड़ गयी है। मुलायम खुलकर अपने भाई शिवपाल के साथ खड़े हो गए हैं। इससे वह एक पार्टी बन गये हैं।

आगे क्या
अखिलेख के लिए : कांग्रेस से कर सकते हैं गठबंधन
अखिलेश उन तमाम विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। उनकी कोशिश हैं कि कांग्रेस से समझौता हो जाये। अखिलेश ने जिन 235 प्रत्याशियों की सूची जारी की है, उनमें 7 ही ऐसे हैं, जिनमें पिछले चुनाव में कांग्रेस जीती थी। पिछले चुनाव में कांग्रेस द्वारा जीती गई 15 सीटों पर प्रत्यािशयों की घोषणा नहीं हुई है। अखिलेश कह चुके हैं कि अगर सपा और कांग्रेस का गठबंधन हो जाए तो वह 300 सीटें जीत सकते हैं। अखिलेश पिछले दिनों दिल्ली दौरे में प्रियंका गांधी से मिल चुके हैं।
सपा के लिए : मुलायम को खुद उतरना पड़ेगा मैदान में  
अखिलेश को पार्टी से निकालने के बाद सपा को बचाने के लिए खुद मुलायम को मैदान में उतरना पड़ेगा। अखिलेश इस समय सपा का मुख्य चेहरा बन चुके थे। कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज अखिलेश के साथ है न कि शिवपाल के। अखिलेश के अलग होने के बाद सपा किसी से समझौता कर पायेगी इसकी गुंजाइश कम है।
फायदा भाजपा-बसपा को  
सपा के टूटने का फायदा भाजपा व बसपा को होगा। बसपा के लिए मुस्लिम वोट अासान हो जाएंगे। बिखरी सपा के साथ मुस्लिम वोट नहीं जायेंगे। उधर, भाजपा को यादव वोटों का फायदा हो सकता है। भाजपा यादव मतदाताओं को यह समझाने का प्रयास करेगी कि यदि वे भाजपा के साथ नहीं आए तो बसपा सत्ता में आ सकती है।


Comments Off on अपने ही गिराते हैं नशेमन पे बिजलियां
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

समाचार में हाल लोकप्रिय

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.