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अभी हूं मैं…

Posted On December - 22 - 2016

Anju organ-donor_chandigarh copyबचपन की वह घटना आगे चलकर इतनी बड़ी कहानी बन जाएगी, किसी ने नहीं सोचा था। उस बच्ची के आसपास कई खिलौने फैले थे, और वह उनसे पूरे चाव से खेल रही थी। एकाएक एक बच्चा वहां आया और एक खिलौना उठाकर खड़ा हो गया। बच्ची ने उसे देखा और पूछा- क्या तुम्हें यह खिलौना चाहिए? बच्चे ने हां कहा तो बच्ची ने उसे वह महंगा खिलौना ले जाने दिया। माता-पिता ने पूछा तो बच्ची बोली- उस बच्चे को भी खेलना था, इसलिए उसकी खुशी के िलए मैंने उसे खिलौना दे दिया।

इस बात को कई साल बीत गए। एक दिन वह युवती अपने चचेरे भाई के साथ स्कूटर पर बैठकर कॉलेज जा रही थी। रास्ते में एक गाड़ी ने उन्हें टक्कर मार दी। युवती घायल हो गई और उसे अस्पताल ले जाया गया। जहां पता चला कि उसके सिर में गहरी चोट आई है। उसे यहां से पीजीआई चंडीगढ़ भेज दिया गया। जहां डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया। उस नेक दिल युवती की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी।

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उस दिन हुआ यह था

यमुनानगर के डीएवी गर्ल्स कॉलेज में छात्राओं को अंगदान के संबंध में दी जा रही जानकारी। सभी फोटो हप्र

यमुनानगर के डीएवी गर्ल्स कॉलेज में छात्राओं को अंगदान के संबंध में दी जा रही जानकारी। सभी फोटो हप्र

अंजू के ताऊ सुरेंद्र धीमान बताते हैं, यह घटना 3 जून 2016 की है। अंजू डीएवी गर्ल्स कॉलेज यमुनानगर में बी.कॉम ऑनर्स की पढ़ाई कर रही थी। सुबह के वक्त वह चचेरे भाई गौरव के साथ बाइक पर बैठकर कॉलेज जा रही थी। रास्ते में नील गाय एकाएक उनके सामने आ गई और उसकी टक्कर से गौरव का संतुलन बिगड़ गया, दोनों नीचे गिर गए। इस दौरान अंजू के सिर में गहरी चोट आई। मदद को पहुंचे लोगों ने हमें हादसे के बारे में बताया। हम उसे एक प्राइवेट अस्पताल में ले गए लेकिन डॉक्टर ने उसे पीजीआई चंडीगढ़ के लिए रैफर कर दिया। हम उसे लेकर पीजीआई पहुंचे लेकिन डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड करार दे दिया। हमारी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। हमें सूझ नहीं रहा था कि क्या करें? जिस बच्ची को कभी गोद में खिलाया था, आज वह मौत के आगोश में समा चुकी थी।

और फिर एक फैसला लिया
सुरेंद्र धीमान के मुताबिक पीजीआई में इसकी पुष्टि हो गई थी कि अंजू ब्रेन डेड हो चुकी है, उसके शरीर के अंग बेशक काम कर रहे थे लेकिन वह अब वापस नहीं लौट सकती थी। इस दौरान डॉक्टरों ने हमें उसके अंग दान करने को प्रेरित किया। अंगदान के लिए काम करने वाली टीम के सदस्यों ने हमें बताया कि अंजू मरने के बाद भी 5 लोगों की जिंदगी बचा सकती है। जोकि एक बहुत बड़ा सामाजिक कार्य है। हम जानते थे वह बच्ची अपनी अब तक की जिंदगी में कितनी हेल्पफुल रही थी। दूसरों की मदद करना उसका स्वभाव था। अंजू के अंगदान करने की अनुमति उसके पिता रमेश धीमान व मां ममता धीमान ने दी। ब्रेन डेड होने के 72 घंटे की प्रक्रिया के दौरान 3 लोगों के शरीर में अंजू के अंग प्रत्यारोपित कर दिए गए। 2 अंगों के लिए उपयुक्त रिसीपिएंट नहीं मिल पाया। धीमान के अनुसार यह दुख की बात है कि अंजू हमारे बीच नहीं है, लेकिन हमें यह जानकर तसल्ली मिलती है कि अब वह दूसरे लोगों में जिंदा है। हमारा पूरा परिवार अब अंगदान के महत्व को बखूबी समझता है और हम लोगों को इसके लिए प्रेरित करते हैं।

आगे आइए अंगदान के लिए

प्रिंसिपल डॉ. सुषमा आर्य छात्राओं के लिए संदेश लिखते हुए।

प्रिंसिपल डॉ. सुषमा आर्य छात्राओं के लिए संदेश लिखते हुए।

डीएवी गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसिपल डाॅ. सुषमा आर्य के अनुसार अंजू हमारे कॉलेज की एक बेस्ट स्टूडेंट थीं। वह बेहद मिलनसार और ऊंचे लक्ष्य वाली लड़की थी। उसकी मौत से हमें सदमा लगा लेकिन फिर भी संतोष है कि वह अंगदान के जरिये आज भी हमारे बीच है। दरअसल, ऐसी घटना जब घ्ाटती है तो हमें अहसास होता है कि अंगदान कितना महत्वपूर्ण है। मानवता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए हमें अंगदान के लिए आगे आना चाहिए। वैसे इसे लेकर काफी भ्रांतियां फैली हुई हैं, जिन्हें दूर किए जाने की जरूरत है। हमने कॉलेज के अंदर अंगदान के लिए प्रेरित करने की मुहिम शुरू की है, इसी का प्रतिफल है कि 500 से ज्यादा छात्राओं व स्टाफ के सदस्यों ने स्वयं को अंगदान के लिए रजिस्टर्ड कराया है। पहले हम रक्तदान के लिए छात्राओं को प्रेरित करते थे लेकिन अब अंगदान भी हमारी मुहिम का हिस्सा बन गया है। कॉलेज के बायोटैक विभाग की छात्राओं ने अब इसे आंदोलन बनाने का बीड़ा उठाया है, वे इसके लिए लगातार काम कर रही हैं। भविष्य में इसके और सुखद परिणाम सामने आएंगे।
क्या है अंगदान
सर्जन डॉ. अनिल अग्रवाल बताते हैं, दुर्घटना में ब्रेनडेड व्यक्ति का हार्ट, लंग्स, लिवर, किडनी, पाचन ग्रंथी व अन्य अंग प्रत्यारोपित किए जा सकते हैं। ब्रेनडेड होने के बाद 3 से 4 घंटे के बीच में हार्ट को डोनेट किया जा सकता है। जबकि लंग्स के डोनेट करने के लिए 4 घंटे का समय होता है। इसके अलावा लिवर का 4 से 6 घंटे में प्रत्यारोपण जरूरी है। जबकि किडनी के लिए 24 घंटे जरूरी हैं। पाचन ग्रंथी को 4 घंटे के भीतर तथा छोटी आंत को 3 घंटे में प्रत्यारोपित हो जाना चािहए।
और सर्वे बताता है देश में 5 लाख लोगों को अंगों की जरूरत है। इनमें से एक लाख 20 हजार से ज्यादा को लाइफ सेविंग ऑर्गन ट्रांसप्लांट चाहिए वहीं 96 हजार से ज्यादा को किडनी की दरकार है।
भ्रांतियां कर रही हैं दूर
डीएवी गर्ल्स कॉलेज के बायोसाइंस विभाग की छात्रा दीपिका, परमीत, अर्शी, आंचल, श्रुति, काजल, शिवानी, वर्षा, दिपाली, दीपा इत्यादि न्यूज बुलेटिन के जरिए छात्राओं को अंगदान के लिए प्रेरित कर रही हैं। बायोसाइंस विभागाध्यक्षा डाॅ. सुनीता कौशिक के अनुसार ब्रेनडेड अवस्था में ऑक्सीजन की कमी से ब्रेन काम करना बंद कर देता है, जबकि शरीर के दूसरे अंगों को वेंटीलेटर सिस्टम से चलाए रखा जा सकता है। प्राकृतिक मृत्यु होने पर अंगों का दान 6 घंटे के अंदर ही कर सकते हैं। कोई व्यक्ति कोमा में है, तो वह अंगदान नहीं कर सकता।
 सुरेंद्र मेहता, यमुनानगर


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