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एक हजार चिट‍्ठी लिखकर स्कूली बच्चों ने पुलिस से कहा- कुछ कीजिए

Posted On December - 29 - 2016
केरल के कोट‍्टायम में स्कूल में पढ़ रहे बच्चे।

केरल के कोट‍्टायम में स्कूल में पढ़ रहे बच्चे।

कोई चिट‍्ठी अब दरवाजे के नीचे से घर के अंदर नहीं डाली जाती। डाकिया कब आता है, कब जाता है, किसी को नहीं मालूम। कभी-कभार खाकी पहने साइकिल सवार कोई सरकारी चिट‍्ठी आकर पकड़ा जाए तो अलग बात है। इंटरनेट के जमाने में चिट‍्ठी भी अब बीते समय की बात हो गई लगती है, लेकिन ओल्ड इज गोल्ड की तरह चिट‍्ठी अब भी हथियार की तरह है। छपे हुए अक्षर में जैसा दम है वैसी ही ताकत लिखे हुए अक्षर में भी है। केरल के कोट‍्टायम जिले में पुलिस और डाक विभाग ने मिलकर जनसमस्याओं को सुलझाने का एक अनोखा प्रयोग किया है। अब स्कूल के बच्चे अपने मन की बात अपने तक सीमित नहीं रखते हैं, वे पेन उठाते हैं और कागज पर चिट‍्ठी लिखकर डाक विभाग के हवाले कर देते हैं। डाक विभाग उसे पुिलस और अन्य सरकारी विभागाें को भेज देता है, हजारों की तादाद में जब इस तरह की चिट‍्ठी पहुंचती हैं तो अफसरों की आंख खुल जाती हैं और वे समस्या का समाधान कर देते हैं। चिट‍्ठी के जरिये समाज को सुधारने की कहानी।
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डाक विभाग की ओर से 9 से 15 अक्तूबर के बीच देश भर में राष्ट्रीय डाक सप्ताह मनाया जाता है, यह बताने के लिए की हाथ से लिखी चिट‍्ठी आज भी क्यों प्रासंगिक है। कोट‍्टायम में डाक विभाग के डिवीजनल सीनियर सुपरिंटेंडेंट अलेक्जीन जॉर्ज के मुताबिक डीसीपी एन रामचंद्रन ने एक स्कूल में लगी प्रदर्शनी के दौरान इसका जिक्र किया था कि किस प्रकार आज की पीढ़ी चिट‍्ठी लिखने की कला से अनजान हो चुकी है। उनकी इस बात ने बच्चों को काफी प्रेरित किया था। इसके बाद हमने इस आइडिया पर काम किया कि क्यों न बच्चों से चिट्ठियां लिखवाई जाएं। हमारी कोशिश थी कि न केवल बच्चे बल्कि बड़े भी इसकी जरूरत को समझें कि हाथ से लिखना क्यों जरूरी है। जाहिर है, पत्र लिखना खुद को जाहिर करने का सबसे बेहतरीन साधन है। जॉर्ज के अनुसार हमने बच्चों से कहा कि वे पत्रों के माध्यम से अपनी समस्याओं को सामने ला सकते हैं। इससे जहां उनकी बोरियत खत्म होगी वहीं रचनात्मक करने का भी मौका मिलेगा।
कोट‍्टायम में डाक विभाग के चार डिवीजन हैं। इन डिवीजन में काम करने वाले कर्मचारी विभिन्न स्कूलों में गए और इस आइडिया के अनुसार चिट‍्ठी लिखने का बच्चों से आग्रह किया। इसके बाद उन्हें किसी भी विषय पर जिसको वे गहराई से समझते हैं, पर लिखने को कहा। बच्चों से कहा गया कि अगर उन्हें पुलिस का काम पसंद है तो उसकी भी तारीफ कर सकते हैं, और अगर उन्हें किसी बात की परेशानी है तो उसका भी जिक्र कर सकते हैं। जॉर्ज बताते हैं, हमें 1 हजार से ज्यादा पत्र मिले, जिन्हें हमने पुिलस विभाग के हवाले कर दिया। पुलिस ने हमें बताया कि सभी पत्रों को नहीं पढ़ा जा सका लेकिन ज्यादातर को पढ़कर हमने अंदाजा लगाया कि बच्चों को दिन प्रतिदिन किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
इन चिट्ठियों में लड़कियों ने बताया कि किस प्रकार बसों और दूसरे वाहनों में आते-जाते वक्त उनसे छेड़छाड़ की वारदातें घटती हैं। वहीं क्लास में आपत्तिजनक बातें और परेशान किए जाने की भी उन्होंने शिकायत की। डीसीपी एम रामचंद्रन कहते हैं, इस तरह से पत्र लिखवा कर हमने सिर्फ पुराने दौर को लौटाने की कोशिश नहीं की है, बल्कि इसके जरिए बच्चों को हालात को समझने और अपने विचारों को जाहिर करने का अवसर भी प्रदान किया है। हमने एक 6 सदस्यीय टीम का गठन किया है जोकि बच्चों की आेर से जाहिर की गई समस्याओं का निपटारा करेगी। अगर मामला गंभीर हुआ तो हम बच्चों से बात करेंगे। हम उनसे व्यक्ितगत रूप से मिलेंगे और उनकी दिक्कत को दूर करने का प्रयास करेंगे।
 भा.भू.,चंडीगढ़


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