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कविता

Posted On December - 20 - 2016

धुंध के चित्र
भ्रम पैदा करने वाली
धुंध के छंट जाने पर ही
साफ दिखाई पड़ता है बहुत कुछ
फिर चाहे सामने की दृश्यावली हो
या रिश्तों की रागात्मकता।

मोतियाबिंद-सा उतार देती है धुंध
चालक की आंखों में
और पैदा कर अदृश्यता
छीन लेती है जीवन।

सुबह-सुबह की धुंध में
गुप-चुप गोष्ठी करते
बहुत से पक्षी
विचार-मग्न तार पर बैठे
कुछ तो निर्णय ले रहे होते हैं
अपने पक्ष में
मनुष्य की समझ से परे।

दौड़ती–भागती ज़िन्दगी में
कुछ पल के लिए ठहराव
ले आती धुंध
बच्ची-सी भली लगती है।

अहंकार की धुंध
लौटा देती है स्वीकार्यता
मिटा देती है प्रेम।

हवा की सवारी करती नन्ही बूंदें
धुंध में बाहर जाने पर
छू कर चेहरे को
ले आती हैं नमी
और बालों में मोतियों-सी जड़ कर
करती हैं अनोखा शृंगार।

दूर तक कुछ न दिखाई देना
मुझे मेरे अपनों के पास
भूले-बिसरों के पास
बहुत पास
ले आती है धुंध।

– शील कौशिक


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