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किसकी सुनेगी जनता

Posted On December - 2 - 2016

उत्तर प्रदेश में चुनावी डंका बज चुका है। राज्य में महागठबंधन बनाने की कोशिशें निरर्थक साबित हुईं। हर दल को लग रहा है कि जनता उनकी ओर आशा भरी निगाहों से देख रही है, लोग उसे वोट देने का इंतजार कर रहे हैं। इन तमाम अटकलों के बीच कांग्रेस और समाजवादी पार्टी अभी भी चुनावी गठबंधन की आशा-निराशा में झूल रही हैं। राष्ट्रीय लोकदल के अजित सिंह जब सभी प्रमुख दलों से गठजोड़ बनाने में असफल रहे, तो वह जनता दल (यू) के साथ खड़े हो गये। इन सबके बीच राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी रणनीति है और अपने-अपने मुद्दे। बता रहे हैं बृजेश शुक्ल…

संदीप जोशी

संदीप जोशी

समाजवादी पार्टी
विकास और गठजोड़ पर भरोसा
SAPA LOGO copyसमाजवादी पार्टी जब 2014 का लोकसभा चुनाव हार गई, तब सपा सरकार के मुखिया अखिलेश यादव ंने यह तय कर लिया था कि वह विकास के नारे के साथ 2017 के विधानसभा चुनाव में उतरेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले दो वर्षों से विकास कार्य तेजी से हुए हैं। कई योजनायें शुरू हुई, लखनऊ में मेट्रो बनी, उसका उद्घाटन भी किया जा चुका है, सिर्फ 22 महीने में लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे लगभग बनकर तैयार है और इस मार्ग का भी उद्घाटन हो चुका है। राज्य के कई राजमार्गो का निर्माण हुआ। 55 लाख लोगों को समाजवादी पेंशन दी गई। गरीब लोगों को राशन कार्ड बांटे गये। अखिलेश चाहते हैं कि विकास के मुद्दे के साथ वह चुनाव में जायें। लेकिन मुलायम की कोशिश है कि राज्य के कई बड़े नेताओं और क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ ऐसा गठजोड़ बनाया जाये जो अखिलेश को फिर से सत्ता में पहुंचा दे। अंसारी बंधुओं को वह पार्टी में ले चुके हैं। बीच-बीच में कांग्रेस से भी गठजोड़ की बात चलने लगती है। लेकिन अब वह महागठबंधन की बात भूल चुके हैं। इसीलिए अजित सिंह से सपा का समझौता नहीं हुआ। सपा नेताओं का मानना था कि अब अजित सिंह से गठबंधन का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि जाट वोटों का एक हिस्सा भाजपा के साथ चला गया है और जाटों और मुसलमानों के बीच पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जो वैमनस्यता है, उससे अजित सिंह से गठबंधन के बाद मुस्लिम वोट मिलना कठिन होगा। पार्टी टिकट बांटने में भी सतर्कता बरत रही है। सपा विकास के साथ ही पीएम मोदी को भी चुनावी मुद्दा बना रही है। सपा नेताओं के अनुसार, पीएम ने राज्य के विकास के लिए कोई काम नहीं किया। सपा, बसपा पर भी तीखें हमले कर रही है। सपा कांग्रेस के प्रति नरम रूख रखना चाहती है, क्योंकि उसे आशंका है कि यदि वह बहुमत से दूर रही, तो कांग्रेस ही उसकी मददगार साबित हो सकती है। फिलहाल सपा में अब अखिलेश का सिक्का चलने लगा है। मुलायम अब धीरे-धीरे उनके साथ खड़े हो गये हैं।

अखिलेश की अच्छी छवि
विकास पर अपने दावे व अखिलेश यादव का युवा होना सपा के पक्ष में जा रहा है। लगभग 10 साल बाद विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री को हटाने जैसे नकारात्मक मुदद्े पर नहीं है। यादव मतदाता मजबूती से उनके साथ खड़े हैं। मुस्लिम मतदाताओं की पहली पसंद आज भी सपा ही है। अखिलेश की छवि अच्छी है और उन पर भ्रष्टाचार के सीधे आरोप नहीं लगे हैं।

फूट बिगाड़ सकती है खेल
राज्य में बिगड़ी कानून व्यवस्था सपा सपा के लिए सिरदर्द साबित हो सकती है। सपा के कई कार्यकर्ताओं पर पार्टी का झंडा लगाकर दबंगई करने का आरोप है। यह बात भी उसके खिलाफ जा सकती है। सपा में पारिवारिक फूट का विपरीत असर पड़ सकता है।

bsp logo copyबहुजन समाज पार्टी
मोदी-अखिलेश पर निशाना  
बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए यह चुनाव करो या मरो जैसे हैं। बसपा ने चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है। मायावती जानती हैं कि यदि इस बार वह सत्ता में नहीं आई, तो उनकी पार्टी को गहरा धक्का लगेगा। इसीलिए वह हर राजनीतिक टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया देती हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश जब भी कोई बड़ा कार्यक्रम करते हैं तो मायावती तत्काल मीडिया के सामने आती हैं। बसपा सुप्रीमो को लगता है कि कहीं अखिलेश के विकास का पता न चल जाये या मोदी अम्बेडकर का नाम लेकर उनके दलित वोट बैंक को न खींच ले। बसपा ने इस बार राज्य में नये समीकरण बनाने की कोशिश की है और उनकी कोशिश है कि यदि मुस्लिम और दलित एकजुट हो जाये तो वह चुनाव जीत सकती हैं। मायावती ने अखिलेश सरकार की नाकामी, पीएम मोदी द्वारा चुनाव से पहले किये गये वादों, नोटबंदी, उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और अपने शासन में किये गये कार्यों को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया है। मायावती आरोप लगाती हैं कि राज्य में गुंडागर्दी हावी है, आम आदमी सुरक्षित नहीं। वह यह साबित करना चाहती है कि सीएम की कोई पकड़ नहीं है। बसपा ने एक बार फिर भाईचारा सम्मेलन शुरू कर दिये हैं। उन्हें अभी भी ब्राह्मण मतदाताओं से उम्मीद है। सतीश मिश्र पूरे राज्य का दौरा कर रहे हैं। बसपा की चिंता कांग्रेस को लेकर भी है कि कहीं दलित वोट कांग्रेस न हड़प ले। इसीलिए नोटबंदी जैसे मुद्दों पर संसद में कांग्रेस साथ खड़ी मायावती यूपी में कांग्रेस पर हमलावर हैं। बसपा के तमाम नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। मायावती को किसी तरह अपने वोट बैंक की रक्षा करनी है और इसके लिए वह सपा, भाजपा और कांग्रेस तीनों को दलित विरोधी बताती हैं।

मुस्लिम साथ
बसपा की सबसे बड़ी मजबूती यही है कि उसके बारे में यह आम धारणा है कि जब मायावती सत्ता में होती हैं तो कानून-व्यवस्था मजबूत रहती है। अधिकारियों पर अंकुश रहता है। दलित मतदाताओं का मायावती पर भरोसा उसकी ताकत है, लेकिन मुस्लिम मतदाता उसके साथ खड़े होंगे यह अभी संदेह में है।

अवसरवादी का ठप्पा
मायावती अभी पूरी तरह से मुस्लिम वोटरों का विश्वास नहीं जीत सकीं हैं। अभी उनके प्रति धारणा है कि वह अवसरवादी हैं और किसी से भी गठजोड़ कर सरकार बना सकती हैं। उनका आम लोगों को न मिलना भी पार्टी के लिए परेशानी हैं। बड़े नेता उनका साथ छोड़ चुके हैं।

congress copyकांग्रेस
गठबंधन की उधेड़बुन
विधानसभा चुनाव सिर पर आ चुके हैं, लेकिन कांग्रेस में अभी यह उधेड़बुन चल रही है कि सपा से गठबंधन कर चुनाव लड़ा जाये या नहीं। पार्टी के विधायक व वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि सपा से चुनावी गठजोड़ कर लिया जाये। इससे पार्टी को फायदा होगा। पिछले दिनों राहुल गांधी ने विधायकों की बैठक बुलायी थी। सभी ने एक स्वर में सपा से गठजोड़ करने की बात कही थी। लेकिन इस मुद्दे पर भी पार्टी दो फाड़ है। ज्यादातर चुनाव क्षेत्रों में टिकट मांगने वालों की संख्या भी काफी है, जो चुनाव लड़ना चाहते हैं और इसीलिए वह नहीं चाहते कि चुनावी गठजोड़ हो। चुनावी गठजोड़ से उनके टिकट को खतरा हो सकता है। कांग्रेस की चुनावी तैयारियां पिछले कई महीनों से चल रही है। पार्टी के रणनीतिकार प्रशांत किशोर चुनावी तैयारियों में लगे हैं और वह भी चुनावी गठजोड़ के पक्षधर हैं। इसीलिए चुनावी गठजोड़ की बातें चलती हैं, मामला कुछ आगे बढ़ता है, लेकिन फिर उसमें ब्रेक लग जाता है। जब राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में खाट यात्रा शुरू की थी, तब पार्टी ने यह तय कर लिया था कि उसे अकेले ही चुनाव मैदान में उतरना है। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस भाजपा पर तो हमलावर थीं ही सपा, बसपा पर भी हमले कर रही थी। लेकिन खाट यात्रा को जो समर्थन मिलना था नहीं मिला। इसके बाद इस बात पर चर्चा शुरू हुई क्या बिहार जैसा महागठबंधन उत्तर प्रदेश में भी बनाया जा सकता है। पार्टी फिलहाल नोटबंदी को बड़ा मुद्दा बनाने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस के नेता यूपी में जंगलराज की बात कहते हैं, इसके लिए वह अखिलेश सरकार को कठघरे में खड़े करते हैं। मायावती पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हैं। कांग्रेस ने किसानों से कर्जमाफी और बिजली के बिल आधे करने का वादा किया है। इस संबंध में एक संकल्प पत्र भी मतदाताओं से भरवाया जा रहा है। लेकिन कांग्रेस के सामने चुनौती यही है कि बगल के राज्य उत्तरांचल में कांग्रेस की सरकार है। वहां पर उत्तर प्रदेश में किये जा रहे वादों में से कितने धरती पर उतारे गये। कांग्रेस के सामने राह कठिन है। अब चुनाव में उसका यह नारा कितना दम दिखाता है ‘कर्ज माफ, बिजली हाॅफ’ यह समय ही बतायेगा।

प्रियंका से उम्मीदें
राज्य में कांग्रेस 27 साल से सत्ता में नहीं है। यह उसके पक्ष में जा रहा है। यदि प्रियकां गांधी प्रचार के लिए मैदान में उतरी तो इसका फायदा कांग्रेस को मिल सकता है। कांग्रेस एक मौका देने की बात कर रही है।

कमजोर संगठन
राज्य में कांग्रेस का नेतृत्व व संगठन कमजोर है। राहुल का असर ऐसा नहीं है जो समीकरण बदल दे। कांग्रेस के नेतृत्व वाली केन्द्र की पिछली यूपीए सरकार के दौरान हुए घोटाले अभी भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहे है।
राहुल का करिश्मा नहीं दिखता है।

BJP_Logo_1 copyभारतीय जनता पार्टी
न भ्रष्टाचार, न गुंडाराज, अब भाजपा सरकार
एक माह पहले तक लगता था कि भाजपा चुनावी तैयारियों में पिछड़ गई है, लेकिन अब चुनावी तैयारियों में भाजपा सबसे आगे निकल रही है। उसकी परिवर्तन यात्राएं पूरे प्रदेश में घूम रही हैं। पार्टी नेताओं से भाजपा मुख्यालय खाली हो चुका है। नेताओं से कह दिया गया है कि लखनऊ में रुकने के बजाय क्षेत्रों में रहें। पीएम मोदी राज्य में रैलियां कर रहे हैं। अमित शाह ने यूपी में डेरा डाल दिया है। भाजपा के निशाने पर अखिलेश सरकार और मायावती हैं। भाजपा नेतृत्व यह साबित करने में लगा है कि नोटबंदी का सबसे ज्यादा असर सपा और बसपा पर पड़ा हैं। इसके साथ ही भाजपा यह भ्ाी बताने में लगी है कि राज्य में जो विकास कार्य हो रहे हैं, वह केंद्र की बदौलत हो रहे हैं। केंद्र ने राज्य सरकार को इतनी मदद दी है कि अखिलेश सरकार कुछ काम करवा रही है। लखनऊ में मेट्रो उद्घाटन के पहले भाजपा की ओर से होर्डिंग्स लगे और मेट्रो को अपनी उपलब्धि बताया गया। भाजपा ने यह तय कर लिया है कि यूपी चुनाव मोदी के चेहरे के बल पर लड़ा जायेगा। इसीलिए केंद्र द्वारा किये गये कामों को विशेष मुद्दा बनाया जा रहा है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि नोटबंदी विपक्ष का भी हथियार है और भाजपा का भी। सपा, बसपा और कांग्रेस इस मुद्दे पर सरकार पर प्रहार कर रही हैं और भाजपा नेतृत्व यह बताने में लगा है कि कुछ बड़े लोग जो सब कुछ गंवाने जा रहे हैं, वही नोटबंदी के खिलाफ हैं। भाजपा फसल बीमा योजना, गोरखपुर में खाद फैक्ट्री के पुनः निर्माण, उज्ज्वला योजना, जनधन योजना, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे मुद्दों को लेकर लोगों के सामने जा रही है। भाजपा नेतृत्व फिलहाल 31 दिसम्बर तक का इंतजार कर रहा है। प्रधानमंत्री की 24 दिसम्बर को लखनऊ में होने वाली रैली को इसीलिए टाल दिया गया, क्योंकि पार्टी 31 दिसम्बर तक नोटबंदी के परिणामों की पूरी तरह समीक्षा कर लेना चाहती है। इसके बाद 3 जनवरी को लखनऊ में पीएम रैली करेंगे। भाजपा यूपी में कांग्रेस पर हमलावर कम है। यहां कांग्रेस की चुनौती उतनी गंभीर नहीं है। भाजपा इन दलों को भ्रष्टाचार का प्रतीक बता रही है और इसके साथ ही वह अखिलेश सरकार की कानून व्यवस्था पर हमला कर रही है, उसने नारा यही दिया है कि न भ्रष्टाचार, न गुंडाराज, अबकी बार भाजपा सरकार।

मोदी की छवि  
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की साफ- सुथरी छवि से भाजपा को मजबूती मिल रही है। पार्टी राज्य में साफ-सुथरी सरकार देने का वादा कर रही है। मतदाताओं पर उसका भरोसा जम सकता है। नोटबंदी ने लोगों का भरोसा भाजपा पर बढ़ाया है। हिंदू वोटों का भी उसे सबसे ज्यादा समर्थन मिल सकता है।

सीएम कौन?
सवाल यह है कि अगर भाजपा को चुनाव में बहुमत मिल जाता है तो पार्टी मुख्यमंत्री किसे बनाएगी। किसी बड़े स्थानीय चेहरे का न होना भी पार्टी की समस्या है। पार्टी पूरी तरह से मोदी और शाह पर निर्भर है।


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