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गुजरात-महाराष्ट्र में रणनीति की जीत

Posted On December - 2 - 2016

अतुल सिन्हा

10212cd _bjp_flag_story_647_051016025911नो टबंदी के 25 दिन बाद भी देश भले ही लाइन में खड़ा हो, लेकिन अब लोगों को यह एक ऐसा सच लगने लगा है, जिसे उन्हें न चाहते हुए भी अपने जीवन का हिस्सा बनाना पड़ रहा है। कतार में लगे लोगों में से ज्यादातर की प्रतिक्रिया अब कुछ नई उम्मीदों से भरी दिख रही है। आम लोगों की परेशानियों को मुद्दा बनाते हुए विपक्ष ने भले ही इस फैसले को लेकर कड़े तेवर अपनाए हों, लेकिन जिस तरह के विरोध की उम्मीद की जा रही थी, वह देखने को नहीं मिल रहा है। और अब जबकि महाराष्ट्र और गुजरात में हुए नगर निकाय चुनाव में लोगों ने भारी बहुमत के साथ फिर से भाजपा को जिताया, उससे विपक्ष का उत्साह ढीला पड़ गया है। खासकर जिस गुजरात को लेकर ये अटकलें लगाई जा रही थीं कि वहां पार्टी कमज़ोर हुई है, अंदरूनी झगड़ों की शिकार है, नेतृत्व परिवर्तन की मजबूरी और तमाम तरह के आरोपों से घिरी होने की वजह से चुनाव में पार्टी के खिलाफ जनमत दिखेगा, वैसा कुछ नहीं हुआ। बल्कि यहां अमित शाह की रणनीति काम करती नज़र आई। नोटबंदी का भी कोई असर नहीं दिखा और एक बार फिर भाजपा ने 126 में से 109 सीटें जीतकर अपना परचम लहरा दिया। यहां कांग्रेस सिमट कर 16 सीटों पर आ गई है। ऐसा ही कुछ नज़ारा दिखा महाराष्ट्र में और यहां शिवसेना के साथ अंदरूनी खींचतान के बाद भी पार्टी ने अपनी मज़बूती का अहसास करा दिया। 6 राज्यों में हुए उपचुनाव के नतीजे भी पार्टी के लिए बेहद उत्साह बढ़ाने वाले हैं।
तो क्या मोदी ने जिन 50 दिनों की मोहलत मांगी है और देश की तस्वीर बदल देने का जो दावा किया है, उसका असर दिखने लगा है? क्या तमाम मुसीबतें झेलकर भी लोगों ने मोदी के इस फैसले को देशहित में मान लिया है या काला धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाई जा रही इस मुहिम के साथ आम आदमी भी जुड़ गया है? महाराष्ट्र और गुजरात के स्थानीय चुनावों के नतीजे से कम से कम भाजपा का उत्साह तो बढ़ा ही है। खासकर गुजरात में इसे लेकर पार्टी बेहद आशावान है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर जिस तरह पिछले कुछ सालों से पार्टी ने यहां अपना जनाधार खोया, मोदी और अमित शाह को लेकर जिस तरह की नाराज़गी दिखने लगी थी और पाटीदार आंदोलन के साथ- साथ दलितों के अत्याचार के जो सवाल उठने लगे थे, उससे खुद मोदी बेहद आहत थे, लेकिन अमित शाह ने पिछले कुछ महीनों से जिस तरह दिन-रात लगकर यहां संगठन को मजबूत बनाने का काम किया, उसका असर नज़र आया। पाटीदार आंदोलन की आग बुझ गई, दलितों के मुद्दे सतह पर आना बंद हो गए और अब नोटबंदी के ऐलान के बाद से आम गुजरातियों को भी लगने लगा है कि शायद अब उनका जीवन कुछ सुधर जाए। इसी उम्मीद के साथ हाल के स्थानीय चुनाव में पार्टी के प्रति लोगों ने एक बार फिर आस्था जताई है।

गुजरात

गुजरात

कुछ ऐसा ही महाराष्ट्र में भी देखने को मिला है। मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस इस समय बेहद उत्साह में हैं और माना जा रहा है कि इन चुनाव नतीजों ने उनके हौसले को और बढ़ाया है। खासकर अपनी ही सहयोगी शिवसेना के साथ उनके जो मतभेद बीच-बीच में उभरते रहे, उसे कम करने में भी ये नतीजे शायद कारगर साबित हों। प्रधानमंत्री के नोटबंदी के फैसले का शिवसेना ने सबसे पहले विरोध किया था और इसे बिना सोचे समझे लिया गया फैसला करार दिया था। लेकिन धीरे-धीरे मीडिया की खबरों ने भी असर दिखाया है। ज्यादातर चैनल और यहां तक कि पूरा देश इस फैसले को अब धीरे-धीरे सही ठहरा रहा है।
जाहिर है, ये सारी स्थितियां विपक्ष को नए सिरे से सोचने और जनता को अपने पक्ष में करने के नए रास्ते तलाशने को मजबूर कर रही हैं। शायद इसीलिए न तो ममता बनर्जी की आवाज़ में अब वो दम दिख रहा है, न केजरीवाल में। कांग्रेस को फिलहाल जनता ने हाशिये पर धकेल रखा है।
लेकिन क्या 50 दिनों में सचमुच देश की आर्थिक तस्वीर बदल जाएगी, ये सवाल सबके जहन में है और सब इसका इंतजार कर रहे हैं। फिलहाल तो अपने ही पैसे को लेकर सामान्य आदमी मारामारी कर रहा है, बैंक पहुंच नहीं पा रहा, कतारें खत्म नहीं हो रहीं और सारे ज़रूरी काम अटक गए हैं। बेहतर हो 50 दिनों तक इंतज़ार करें।


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