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गुरबत के जीवंत चित्र उकेरती रचना

Posted On December - 27 - 2016

12712cd _022यूनाइटेड नेशन्स डेवलेपमेंट प्रोग्राम की फेलो रही वीणा भाटिया का साहित्य के क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम है। वीणा भाटिया ने बाल साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है और बेहतरीन बाल कविताएं लिखी हैं। इसी साल इनकी किताब ‘वेश्या एविलन रो’ आई है, जिसमें ब्रेख्त की कुछ चुनिंदा कविताएं हैं। अपनी संस्था साहित्य चयन से इन्होंने कुछ दुर्लभ किताबों का प्रकाशन किया है, जिनमें मुल्कराज आनंद की ‘ऑन एजुकेशन’ और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ‘पायोनियर इन एजुकेशन’ प्रमुख हैं। ये थिएटर से भी जुड़ी हैं। स्लम के बच्चों के साथ समय-समय पर लिटरेरी वर्कशॉप भी करती रहती हैं। ये लाइब्रेरी मूवमेंट से भी जुड़ी हैं। खुद को लिटरेरी एक्टिविस्ट कहने वाली वीणा भाटिया फिलहाल, साहित्य चयन की निदेशिका हैं।
वीणा ने बताया कि इधर दोबारा गुरदयाल सिंह के उपन्यासों को पढ़ रही हूं। गुरदयाल सिंह भारतीय साहित्य की यथार्थवादी परंपरा के ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया में पंजाबी उपन्यास और कथा साहित्य को एक विशिष्ट पहचान दिलाई। विश्व साहित्य में इन्हें प्रेमचंद, गोर्की और लू शुन के समकक्ष माना जाता है। उन्होंने कहा कि यह अलग बात है कि ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें निर्मल वर्मा के साथ साझे में मिला, पर साहित्य में उनका जो योगदान है, उसके आगे बड़े से बड़े पुरस्कार का कोई महत्व नहीं रह जाता है। वे कहती हैं कि उनके उपन्यासों को पढ़े बिना पंजाब के ग्रामीण जीवन को नहीं समझा जा सकता। उनका पहला उपन्यास ‘मढ़ी दा दीवा’ 1964 में प्रकाशित हुआ। यह उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति है। आलोचकों ने इसे टॉल्सटॉय की अमर कृति ‘युद्ध और शांति’ के समकक्ष माना है। रूसी भाषा में जब इस उपन्यास का अनुवाद हुआ तो उसकी 10 लाख प्रतियां प्रकाशित हुईं। इस उपन्यास पर राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम ने फिल्म बनाई जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उन्होंने बताया कि ‘मढ़ी का दीवा’ में शोषित-गरीब लोगों के जीवन का जैसा यथार्थ चित्रण हुआ है, वह और कहीं नहीं मिलता।
बचपन में गुरदयाल सिंह ग़रीबी की वजह से पढ़ाई नहीं कर सके और बढ़ईगीरी का पुश्तैनी काम करने लगे। पर बाद में उन्होंने पढ़ाई शुरू की और उच्च शिक्षा हासिल कर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हुए। लेखन में लगातार उपलब्धियां हासिल करने के बावजूद उनका जीवन बहुत ही सहज और सरल रहा। दरअसल ‘मढ़ी का दीवा’ में एक दलित और एक विवाहित जाट महिला के प्रेम का चित्रण है, पर इसके केंद्र में दलितों की भयानक ग़रीबी और उनका शोषण है। वे कहती हैं कि इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। इसमें दबे-कुचले उत्पीड़ित लोगों की आवाज सामने आई है। वे कहती हैं कि गुरदयाल सिंह की तुलना मक्सिम गोर्की से ठीक ही की जाती है, क्योंकि उन्होंने भी गोर्की की तरह ही बहुत खाक छानी थी और तरह-तरह के काम किए थे। गुरदयाल सिंह अंतिम समय तक लेखन करते रहे। वे बहुत मुश्किल हालात और ग़ुरबत से होकर निकले थे। वे आंखों देखी सच्चाई को अपने उपन्यासों में उकेरते थे। उन्होंने कहा कि गुरदयाल सिंह गांवों, किसानों, कामगारों और तमाम दबे-कुचले लोगों के लेखक थे, पर किसी वाद या इज्म में उनका भरोसा नहीं था। आखिरी दम तक उनका संघर्ष जारी रहा।


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