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‘जया’ के बाद किसकी ‘जय’

Posted On December - 9 - 2016

जयललिता के निधन के साथ ही तमिलनाडु की राजनीति में एक खालीपन आ गया है। करुणानिधि से बहुत आगे निकल चुकी जयललिता तमिलनाडु की राजनीति में करिश्माई व्यक्तित्व थीं। उनकी लोकप्रियता शिखर पर थी। बाकी नेता उनके साये में रह रहे थे। अब उनके जाने से एआईडीएमके में असमंजस की स्थिति है। ओ पनीरसेल्वम मुख्यमंत्री बन गए हैं। पार्टी नेताओं ने दिखाया कि सब कुछ बहुत आराम से हो गया है, लेकिन जयललिता के अंतिम संस्कार में हर जगह शशिकला छाई रहीं। अब देखना यह है कि सत्ता के इस संघर्ष में किसकी जय होती है… विनय ठाकुर

अम्मा का सियासी सफर
10912cd _jayalaitha 1991 first cmजयललिता ने वर्ष 1982 में एमजीआर की मदद से राजनीति में प्रवेश किया। अन्ना-द्रमुक की सदस्य बनीं और 1983 में उन्हें पार्टी के प्रचार सचिव के रूप में नियुक्त किया गया। अगले साल वे राज्यसभा की सदस्य बनीं। एमजीआर के निधन के बाद उन्होंने पार्टी के भीतर ही अपमान और अभद्रता का एक दौर देखा। उनकी प्रतिस्पर्धी पार्टी द्रमुक के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने भी उनका अपनाम करने में कसर नहीं छोड़ी। इन सब बातों से जनता के मन में उनके प्रति हमदर्दी पैदा हुई। इतने अपमान और दुर्व्यवहार से उनके मन में काफी कड़वाहट भर गयी थी। उनके व्यक्तित्व में अजब असहिष्णुता पैदा हो गयी। वे किसी प्रकार का विरोध सहन नहीं कर पाती थीं। दूसरी ओर, उनके इर्द-गिर्द के लोगों ने चाटुकारिता का जो मंजर पेश किया वह अनोखा था। वर्ष 1991 में जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, तो उन्होंने राजसत्ता का पूरा इस्तेमाल अपने प्रचार-प्रसार के लिए किया। इस सरकार का पहला साल पूरा होने पर 1992 में तमिलनाडु के शिक्षामंत्री ने घोषणा की कि हर जिले में श्रेष्ठ शिक्षा देने वाले आदर्श विद्यालय खोले जायेंगे, जिनका नाम जयललिता विद्यालय होगा। राज्य के कृषि वैज्ञानिकों ने सुगंधित धान की नयी किस्म तैयार की जिसका नाम ‘जया-जया-92’ रखा गया। आवास मंत्री ने हर जिले में ‘जया नगर’ बसाने की घोषणा की। शहरों में जया के नाम से स्टेडियम, विवाह मंडप खुल गये।
दत्तक पुत्र की शादी से खुली पोल, पहली बार जेल
10912cd _jayalalitha_71996 के चुनाव में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा और जयललिता अपनी सीट तक नहीं बचा पाईं। इसकी बड़ी वजह उनके दत्तक पुत्र सुधाकरन की शादी में हुआ करोड़ों रुपयों का ख़र्च माना गया। 1996 से 2001 के बीच डीएम के की करुणानिधि सरकार ने आय से अधिक संपत्ति के क़ानून के तहत जयललिता के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के दर्जनों और मामले दर्ज किए। इनमें से एक था ‘कलर टीवी घोटाला’ – जयललिता पर मुख्यमंत्री रहते हुए ऊंचे दामों पर कलर टीवी की ख़रीद का आरोप था। इसके तहत वो और उनकी क़रीबी दोस्त शशिकला पहली बार दिसंबर 1996 में गिरफ़्तार किए गए। हालांकि साल 2000 में दोनों को इस मामले में बरी कर दिया गया और 2008 में हाईकोर्ट ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील भी ख़ारिज कर दी थी।
खुद सीएम न बन पायीं तो पनीरसेल्वम को बनाया
1996 से 2001 के बीच दायर मामलों में एक और था ‘तनसी घोटाला’ जिसके तहत 1999 में जयललिता पर अपनी कंपनी के लिए सरकारी ज़मीन ख़रीदने के लिए मुख़्यमंत्री पद के दुरुपयोग का आरोप था। साल 2000 में वो और शशिकला इस मामले में दोषी पाई गईं और उन्हें जुर्माने के साथ दो साल की सज़ा सुनाई गई। मद्रास हाईकोर्ट में अपील दायर कर जयललिता ने अगले साल विधानसभा चुनाव लड़ा। जयललिता के मुताबिक़ ये सारे मामले राजनीतिक बदले की भावना से दायर किए गए थे. जनता ने उनके दावे को पसंद किया और 2001 विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को फिर जीत मिली। पर तनसी घोटाले में दोषी पाए जाने की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने जयललिता के मुख्यमंत्री बनने पर रोक लगा दी। जिस वजह से ओ.पनीरसेलवम को पहली बार तमिलनाडु का मुख़्यमंत्री बनाया गया। दिसंबर 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में जयललिता को बरी कर दिया और उन्होंने मुख़्यमंत्री का पद संभाला।
सत्ता मिलते ही करुणानिधि की गिरफ़्तारी
साल 2001 में सत्ता में दोबारा आईं जयललिता ने भी उसी तरह अपने प्रतिद्वंदी करुणानिधि को गिरफ़्तार करवाया। आधी रात के बाद पुलिस करुणानिधि के घर पहुंची और फ़्लाईओवर बनाने को लेकर हुए भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। करुणानिधि के साथ उस व़क्त केंद्रीय मंत्री रहे मुरासोली मारन और टी.आर.बालू को भी गिरफ़्तार किया गया। साल 2006 में डीएमके से हार के बाद एआईएडीएमके 2011 में फिर से तमिलनाडू की सत्ता पर काबिज़ हुई और जयललिता फिर मुख्यमंत्री बनीं। उनका ये कार्यकाल मानहानि के मुक़दमे दायर करने के लिए चर्चा में रहा।
आय से अधिक संपत्ति मामले में 4 साल की सज़ा
बतौर मुख्यमंत्री इसी कार्यकाल के दौरान सितंबर 2014 में जयललिता को आय से अधिक संपत्ति (क़रीब 63 करोड़ रुपए) के मामले में दोषी पाया गया और सौ करोड़ के जुर्माने के साथ चार साल की सज़ा हुई। कर्नाटक हाईकोर्ट ने अगले साल जयललिता को ज़मानत दे दी, जिसके बाद वो फिर मुख्यमंत्री बन गईं और 2016 के विधानसभा चुनाव में जीत भी हासिल की। अपील के बाद इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा है।
पनीरसेल्वम
10912cd _pnsपनीरसेल्वम जयललिता के सबसे वफादर सहयोगी रहे। 65 साल के पनीरसेल्वम के बारे में कुछ बातें सत्ता के गलियारों में लंबे समय से कही सुनी जाती रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह पनीरसेल्वम ने भी चाय बेची है। उनके पिता अन्नाद्रमुक के संस्थापक स्वर्गीय एमजी रामचंद्रन के लिए काम करते थे। पनीरसेल्वम ने चाय की दुकान से फुरसत निकालकर ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। पनीरसेल्वम पहली बार शशिकला के रिश्तेदार टीटीके दिनाकरन के जरिए जयललिता की नज़र में आए थे। कहा जाता है कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए पनीरसेल्वम कभी भी उस कुर्सी पर नहीं बैठे जिस पर जयललिता बैठा करती थीं। पनीरसेल्वम थेवर समुदाय से आते हैं, जिनका दक्षिणी तमिलनाडु में अच्छा प्रभाव माना जाता है। ओ पनीरसेल्वम का कोई व्यक्तिगत आधार नहीं है। पनीरसेल्वम जयललिता के नाम पर चुनाव जीतते आ रहे हैं। अभी चुनाव में काफी वक़्त है। इसलिए अभी इन्हें निकट भविष्य में किसी चुनाव का सामना नहीं करना है। नेतृत्व का मसला चुनाव के समय ज्यादा पैदा होता है। इडापाडी के. पलनीस्वामी जैसे जमीनी नेताओं की उपस्थिति के बावजूद पनीरसेल् वम के सिर पर ताज शशिकला के आशीर्वाद का नतीजा माना जा रहा है। मन्नारगुड़ी गुट (शशिकला के नजदीकी लोगों का तंत्र) के अचानक से परिदृश्य में खुलकर सामने आने से नाराजगियों की सुगबुगाहट तो है पर उसमें अभी बगावत की मजबूती नहीं है। एक मजबूत महिला के नेतृत्व में चलने वाली एआईडीएमके की राजनीति उसकी मजबूत इरादों वाली महिला साथी के हाथों में किताना रह पाएगी इसका फैसला अभी होना है। जयललिता के निधन के बाद शशिकला के पति नटराजन भी सक्रिय हो गये हैं। उनके अचानक आने से समीकरण और उलझ सकते हैं।
शशिकला
10912cd _sasikalaजब जयललिता जीवित थीं तो तमिलनाडु में वीके शशिकला को उनका साया कहा जाता था। क़रीब तीन दशक पहले एक वीडियो पार्लर चलाने वाली शशिकला आज जयललिता के समान ताकतवर मानी जाती हैं और पार्टी में इनकी एक अहम जगह है। माना जाता है कि शशिकला ही ‘एआईएडीएमके’ पार्टी के सभी मामले देखती हैं। एआईएडीएमके तमिलनाडु में सत्ता में है तो इसके मायने हैं कि एक प्रकार से वो सरकार के कामकाज पर भी नज़र रखती हैं। मोटे तौर पर उन्हें ‘जयललिता की आंखें’ कहा जाता था। जयललिता के बीमारी के दिनों से ही इस बात के कयास लगाये जा रहे थे कि शासन की बागडोर किसके हाथ में है। हालांकि, प्रशासन तो ऑटोपॉयलट मोड में चल रहा था और जिन हाथों में उसका संचालन था उनका चयन जयललिता के द्वारा ही किया गया था। पर इसे भी निरीक्षण करने वाले लोग थे। अंतिम संस्कार समारोह ने सारी बातों का खुलासा लगभग कर दिया कि सूत्र संचालन वस्तुत: शशिकला के हाथों में ही थी। जयललिता के अस्पताल में भरती होने के बाद से ही उसने उसके इलाज से संबंधत जानकारी से लेकर उससे मिलने जुलने वालों को सख्ती से नियंत्रित कर रखा था। इस बीच कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई जिनमें उपचुनाव से लेकर नोटबंदी तक जिनके बारे में एआईडीएमके की राय राजनीति के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उपचुनावों में जहां तीन विधानसभा सीटों पर एआईडीएमके के उम्मीदवारों की जीत हुई। शशिकला के जयललिता से मिलने और उसके बाद उसके तौर तरीके से इस बात का खुलासा होता है कि शशिकला भले पढ़ी लिखी नहीं हो पर अवसरों का फायदा उठाने की कला में वह माहिर है। उसे अपनी कमजोरियों के आभास के साथ ही इस बात का भी आभास है कि उसकी शक्ति का स्रोता कहां है। अपनी ताकत को सुरक्षित रखने के लिए वह झुकने के लिए तैयार रहती है उसमें उसका अहम आड़े नहीं आता है।
भाजपा और कांग्रेस की पैनी नज़र
10912cd _modiजयललिता के जाने के बाद से भाजपा और कांग्रेस की नजरें तमिलनाडु के सियासी समीकरणों पर हैं। जयललिता के दो महीने पहले अस्पताल में भर्ती होने से लेकर उनके निधन तक पूरे घटनाक्रम के दौरान भाजपा ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई है, वह किसी से छिपी नहीं है। ये सच है कि केंद्र की मोदी सरकार के साथ जयललिता के संबंध अच्छे थे, लेकिन मोदी सरकार ने उनकी तबीयत को लेकर जो चिंता ज़ाहिर की वह सिर्फ अच्छे संबंधों की वजह से नहीं थी। इसके राजनीतिक कारण भी थे जो ‘अच्छे संबंधों’ से कहीं बड़े थे। यही वजह है कि इस साल सितम्बर में जयललिता के अस्पताल में भर्ती होने के बाद एक तरह का दबाव बनाया गया था कि एआईएडीएमके को अब अपना नया नेता चुन लेना चाहिए। राजनीतिक गलियारों में 10912cd _Rahulआमतौर पर इस बात को स्वीकार किया जाता है कि केंद्र के दबाव की वजह से जयललिता के निधन से पहले ओ पनीरसेल्वम को अम्मा का उत्तराधिकारी बनाकर आधी रात को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। इसकी एक साफ़ वजह ये नज़र आती है कि जयललिता के निधन के बाद एआईएडीएमके के ‘भ्रमित’ सांसदों को डीएमके की ओर देखने से रोका जाए। विश्लेषक इस बात से इनकार नहीं कर रहे हैं कि जयललिता के निधन के बाद भाजपा अपनी जगह तलाशने की हरसंभव कोशिश कर रही है। ऐसे में तमिलनाडु में नई पारी की शुरुआत के लिए भाजपा के पास बेहतरीन अवसर है। उधर, कांग्रेस भी इसे अपने लिए अवसर मान रही है। यही कारण है कि राहुल गांधी अपना यूपी दौरा बीच में छोड़कर जया से मिलने चेन्नई पहुंचे थे। तब यह सवाल भी उठा था कि राहुल ने जया की सेहत के बारे में तो पूछा, लेकिन करुणानिधि से नहीं मिले जो बीमार चल रहे थे। जयललिता के निधन के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी अंतिम विदाई में पहुंचे।
डीएमके और एआईएडीएमके पर असर
10912cd _jayalजयललिता के निधन का मतलब है उनकी विरोधी पार्टी डीएमके अब कुछ चैन की सांस ले सकती है। एआईएडीएमके के पास अब हमेशा एक ऐसे नेता की विरासत रहेगी, जिसने राजनीति में रुचि नहीं होने के बावजूद डीएमके के करुणानिधि जैसे धुरंधर नेता को पटखनी दी। लेकिन एआईएडीएमके की विडंबना ये है कि उसके पास दूसरी पंक्ति के उस तरह के नेता नहीं हैं जिस तरह डीएमके के पास हैं। करिश्माई नेता ‘अम्मा’ के जाने के बाद एआईएडीएमके किस तरह आगे बढ़ेगी या बिखर जाएगी, इस बारे में आशंकाएं बनी रहेंगी।
किसे मिलेगी 113 करोड़ की संपत्ति
68 साल की जयललिता अपने पीछे लाखों समर्थक और अन्नाद्रमुक पार्टी को छोड़कर गई हैं। अब आम और ख़ास में चर्चा इस बात की है कि उनकी कितनी संपत्ति है और वो किसे मिलेगी? फ़िलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि क़ानूनी तौर पर उनका कोई वारिस है या नहीं। इसलिए उनकी संपत्ति किसको मिलेगी, इसको लेकर भी कयासों का दौर जारी है। 2016 के विधानसभा चुनाव के दौरान जयललिता ने चेन्नई के डॉ. राधाकृष्णन नगर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। विधानसभा चुनाव के दौरान भरे गए हलफ़नामे के मुताबिक जयललिता की कुल संपत्ति का मूल्य 113 करोड़ रुपये था। हलफ़नामे के मुताबिक जयललिता के पास हलफ़नामा भरते वक्त 41 हज़ार रुपये कैश में थे। इसके अलावा बैंक खातों में दस करोड़ तिरेसठ लाख रुपये जमा थे। जयललिता की संपत्ति में 27 करोड़ रुपये से अधिक के बांड, डिबेंचर और कंपनियों के शेयर थे। लेकिन ख़ास बात ये है कि जयललिता ने अपना बीमा नहीं कराया था और ना किसी दूसरे तरह का कोई बीमा उन्होंने कराया था। चल संपत्ति में जयललिता के पास दो टोयटा प्राडो एसएयूवी, एक कंटेसा, एक एंबेसडर, महिंद्रा बोलेरो और महिंद्रा जीप सहित कुल नौ गाड़ियां हैं, जिसका बाज़ार मूल्य करीब 42 लाख रुपये बताया गया है। जयललिता के पास करीब 21 किलो सोना मौजूद था, जिसे कर्नाटक के राजस्व विभाग ने जब्त कर लिया था। इसके अलावा जयललिता के पास बारह सौ पचास किलो चांदी के आभूषण थे, जिसका बाज़ार मूल्य तीन करोड़ 12 लाख 50 हज़ार रुपये बताया गया है।
हिंदी को बताती थीं अपनी दूसरी भाषा, स्कूल में ही सीख ली थी
10912cd _jn3जयललिता हिंदी को अपनी दूसरी भाषा मानती थी। उन्होंने इस बात का खुलासा उस समय किया जब वे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की रैली में आयीं। उन्होंन रैली के दौरान हिंदी में ही लोगों को संबोधित किया। यह पहला मौका था जब जयललिता अपने राजनीतिक कैरअर में पहली बार किसी रैली को हिंदी में बोलीं। वे अपनी भाषा (तमिल) में तेज-तर्रार भाषण के लिए जानी जाती थीं। उनका वह भाषण चर्चा का विषय बन गया था। जयललिता ने 23 अप्रैल 2007 को यूपी के इलाहाबाद में यह भाषण दिया। उस समय यूपी में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार हो रहा था और जयललिता प्रचार के तहत ही इलाहाबाद आई थीं। वे मुलायम सिंह यादव के बुलावे पर आई थीं। हालांकि उन्होंने इस दौरान पहले से लिखी हुई स्पीच ही रैली के दौरान पढ़ी। रैली के बाद जब पत्रकारों ने उनसे हिंदी में भाषण देने के बारे में उसने पूछा तो उन्हांेने कहा कि हिंदी उनकी सेकेंड लैंग्वेज है। वे स्कूल में हिंदी ही बोला करती थीं। जयललिता स्कूल के दिनों में बॉलीवुड अभिनेता शम्मी कपूर की दीवानी हुआ करतीं थीं। शम्मी कपूर की फिल्म ‘जंगली’ उनकी ऑल टाइम फेवरिट फिल्म है। वे उस समय हिंदी फिल्में देखा करती थीं। उन्होंने एक बॉलीवुड फिल्म में भी काम किया। उनकी पहली हिंदी फिल्म ‘इज्जत’ थी। इसमें उन्हाेंने उस समय के मशहूर अभिनेता धर्मेंद्र के साथ किया। इस फिल्म की शूटिंग हिमाचल के कुल्लू-मनाली में हुई थी। डेढ़ माह तक मनाली की वादियों में शूटिंग करते हुए उन्हें यहां की वादियां इस कद्र भा गई थीं कि वह हमेशा मनाली की खूबसूरती की भी चर्चा किया करती थीं। तमिल और कन्नड़ फिल्मों में वे इतनी मशहूर हुई कि उन्होंने इज्जत फिल्म के बाद उन्होंने कभी हिंदी फिल्मों का रुख नहीं किया।


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