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जीवन नये सिरे से जीने की कला…

Posted On December - 25 - 2016

काॅफी पर गपशप

हरीश खरे

सभी िचत्रांकन :   संदीप जोशी

सभी िचत्रांकन : संदीप जोशी

दिल्ली के उप-राज्यपाल नजीब जंग ने एक बहुत ही ‘अ-भारतीय’ काम कर डाला : उन्होंने एक काफी महत्वपूर्ण काम छोड़ दिया। दिल्ली के राज निवास को छोड़ने के पीछे उन्होंने जो कारण बताया, वह भी एक बार फिर ‘अ-भारतीय’ ही है: वह अपने परिवार के साथ वक्त गुजारना चाहते हैं। जिस देश में परिवार के हित की खातिर हर कायदे-कानून को तोड़-मरोड़  दिया जाता हो, जंग साहब ने उसके एकदम उलट काम किया है।
दिल्ली के उप-राज्यपाल के तौर पर नजीब जंग ने खुद अपने आपको हंसी का पात्र बनाया और आम आदमी पार्टी के दिल्ली में सत्ता में आने के बाद उनके लिए हालात लगभग असंभव से हो गये। और जब भाजपा और कांग्रेस का मटियामेट कर आम आदमी पार्टी विशाल बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में लौटी तो उप-राज्यपाल की मुश्किलें और भी बढ़ गईं। अब क्योंकि नरेंद्र मोदी को आप के हाथों पहली चुनावी हार का सामना करना पड़ा था तो यह स्वाभावकि-सी बात थी कि केंद्र केजरीवाल सरकार के काम में टांग अड़ायेगी। आप सरकार के रोजमर्रा के काम में केंद्र का अड़चनें डालना तय था। एकदम स्पष्ट-सी बात। और अरविंद्र केजरीवाल क्योंकि खुद राष्ट्रीय नेतृत्व की उलझन का मजा लेते हैं, इसलिए उन्होंने अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी का बड़े योजनाबद्ध तरीके से इस्तेमाल करते हुए प्रधानमंत्री को खिझाया और परेशान किया।
उप-राज्यपाल के रूप में जंग ने खुद को अहं, स्वभाव और एजेंडे के इस बेमेल उतार-चढ़ाव के बीच फंसा पाया। और फिर न तो केंद्र और न ही दिल्ली सरकार को उनके प्रति क्षुद्रता और धृष्टता से कोई परहेज था, ऐसे में राजनिवास में रह पाना दूभर हो गया।
जंग मुख्यत: एक सभ्य और सुसंस्कृत आदमी और संवेदनशील आत्मा हैं, ऐसे में उन्होंने खुद को दो अपरिपक्व और निष्ठुर लोगों की लड़ाई के बीच फंसा पाया। और यह लड़ाई—मुख्यत: एक राजनीतकि जंग— हर रोज की बात हो गई थी। संभवत: इससे पार पाना उनके बस की बात नहीं थी।
इस तरह के राजनीतकि खेल का शरीर, मन और नैतकिता पर असर तो पड़ता ही है। और फिर एक ऐसा वक्त आता है जब आपको  फैसला करना होता है : कि क्या नेताओं और उनकी आधारच्युत व्यस्तताओं की निरर्थक और आत्मा को मारने वाली मांगों के आगे नतमस्तक हुआ जाये या नहीं। हालांकि उन्होंने खुद को ऐसे काम में लगा पाया जो कि एक राजनीतकि जिम्मेदारी बन गया था, लेकनि उन्हें यह निश्चित तौर पर मुश्किल लगा होगा क्योंकि वह एक राजनेता नहीं हैं । और फिर 60 की उम्र में कोई राजनेता बन भी नहीं सकता।
24 dec 3उनके लिए यह एक ईर्ष्याविहीन काम हो गया था। केंद्र के नामित बसूले के रूप में उन्होंने क्या किया और क्या नहीं किया, इस पर बहस संभव है, लेकनि मुझे खुशी है कि उन्होंने पद छोड़ने और खुद को पुन: पाने का फैसला किया। उन्होंने खुद को काम में भस्म नहीं होने दिया। और इस बात की सराहना की जानी चाहिए।
चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला में बड़ी संख्या में सैन्य बलों के पूर्व कर्मी रहते हैं। यह बिल्कुल भी हैरानी की बात नहीं है कि क्षेत्र के पूर्व सैन्य कर्मियों की बिरादरी पूर्व वायुसेना प्रमुख से किये गये व्यवहार और नये सेना प्रमुख की नियुक्ति में वरिष्ठतम जनरल की अनदेखी किये जाने से खफा है। दोनों ही मामलों में एक तरह से अलिखित संहिता को तिलांजलि दी गई लगती है। सैन्य बलों के सभी कर्मी, विशेषकर अधकिारी वर्ग इज्जत की अवधारणा को आत्मसात किये जाने में गौरवान्वित महसूस करते हैं— परंपरा और पद के सम्मान के लिए एक अलिखित लेकनि अच्छी तरह समझ में आने वाला प्रोटोकाल—जो कि ‘फौजी बिरादरी’ को दूसरों से भनि्न  दर्शाता है। एक वर्दीधारी आदमी के लिए मेहनत से कमाई गई इज्जत उम्रभर का तमगा है। लेकनि इन दोनों ही मामलों में इज्जत की इस अवधारणा के साथ अचानक बड़े ही घमंडपूर्ण तरीके से खिलवाड़ किया गया है।
पूर्व वायुसेना प्रमुख की गिरफ्तारी विशेष रूप से दुखद है। सीबीआई की जैसी भी परकिल्पित संस्थागत स्वायत्तता हो, इसमें ऐसे पुलिसकर्मी तैनात होते हैं, जनिमें से अधकितर संदिग्ध संरक्षकों के साथ चोंचलेबाजी करने के बाद इस जांच एजेंसी में पहुंचते हैं। एक पुलिसकर्मी पर इज्जत की भावना का सम्मान करने का भरोसा नहीं किया जा सकता। मैं कभी भी सिविल सोसायटी और अन्य स्वयंभू भ्रष्टाचार विरोधी जेहादियों के उस बड़े विश्वास को कभी भी पूरी तरह समझ नहीं पाया हूं जो कि वे ‘स्वायत्त’ सीबीआई पर भ्रष्टाचार, कालेधन आदि जैसी हमारी सभी समस्याओं के जवाब के रूप में उस पर करते हैं। यह कुछ और नहीं बल्कि पुलिस राज की एक पटकथा है। डीएसपी स्तर का एक अधकिारी ‘जांच’ से इस तरह बड़ी कुटिलता से छल कर सकता है कि पूर्व वायुसेना प्रमुख जैसा अधकिारी भी एक आम चोर के स्तर तक पहुंचा दिया गया और उसी तरह के व्यवहार का सामना करते पाता है। ‘सीबीआई को इस मामले की जांच करने दो’ रूपी इस मंत्र के प्रति फर्जी जुनून में कोई गंभीर चूक तो हैं।
कोई नहीं जानता कि सरकार ने लेफ्टनिेंट जनरल प्रवीण बख्शी के दावे को न•ज़रअंदाज क्यों किया। सरकार के फैसले के पीछे के इरादों पर सवाल उठाना तो सही नहीं होगा लेकनि मौजूदा सत्ताधीशों ने वरिष्ठता के सिद्धांत का पहले बड़ा राग अलापा था। सरकार की जो भी सोच रही हो लेकनि यह कहना हर आदमी का फर्ज है कि सरकार ने बेवजह अल्हड़पन से काम लिया है। हो सकता है कि मनोहर पर्रकिर के रक्षा मंत्री बनने के बाद सशस्त्र बलों और इनकी परंपराओं के प्रति ऐसा तिरस्कार अवश्यंभावी था। हो सकता है कि सरकार को लगा कि सेवानिवृत्त हो रहे सेना प्रमुख द्वारा राजनीतकि आकाओं के आदेशों को सिरोधार्य करने का खाका तैयार कर देने के चलते पक्षपातपूर्ण वकिल्प चुनना उसका अधकिार है। इसकी भूख तीव्र हो गई है।
‘विश्लेषक’ सशस्त्र बलों को एक संस्था मानने से अामतौर पर बचते हैं। कोई झगड़ा नहीं। जो लोग संस्थागत सम्मान चाहते हैं — और इसके हकदार हैं—उनमें अपनी इज्जत की रक्षा की खातिर उठ खड़े होने का साहस और तर्कशीलता होने चाहिए।
चंडीगढ़वासियों ने पिछले हफ्ते नगर निगम के चुनाव में मतदान किया। चुनाव में भाजपा को बड़ी जीत मिली। चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव नोटबंदी पर जनता का पहला ‘लोकप्रिय’ फैसला था। कोई आश्चर्य नहीं कि इस चुनावी नतीजे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसले की विशाल स्वीकार्यता बताया जा रहा है। ऐसा होने दो।
चंडीगढ़ के नतीजों के बाद एक बहुत ही जायज सवाल उठ खड़ा हुआ है : कि क्या यह भाजपा के लिए बादलों के अकाली दल के बोझ से मुक्त होने का सही वक्त नहीं है? भाजपा-अकाली गठबंधन में कुछ अरसा पूर्व ही दरार आ गई थी, हालांकि, एक समय पंजाब को इस मित्र भाव से फायदा भी हुआ। राजनीति में हालांकि कुछ भी स्थायी नहीं है लेकनि अकाली-भाजपा गठबंधन सिर्फ इसी वजह से लम्बे समय तक चल पाया क्योंकि भाजपा के तीन ‘प्रबुद्ध लोगों’—अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवाणी ने इस रिश्ते को खूब सींचा था। इस सीमावर्ती राज्य में कई दशकों की अशांति और हिंसा के बाद इस गठबंधन ने राज्य में एक बेहद जरूरी राजनीतकि स्थायित्व पैदा किया। लेकनि हाल  के वर्षों में यह अानंदपूर्ण गठबंधन सुविधा की व्यवस्था बन कर रह गया था। अब दोनों का तलाक कोई असंभव बात नहीं जान पड़ती। अौर इस रिश्ते के भविष्य की संभावना इस बात से बढ़ जाती है कि क्योंकि भाजपा ने पड़ोसी हरियाणा में चौटाला का प्यार छोड़ अपने बूते विधानसभा चुनाव लड़ा अौर शानदार जीत हासिल की।
बादलों के साथ गठबंधन जारी रखना है या नहीं, इस बात पर हाल के महीनों में पंजाब भाजपा में खूब वाद-विवाद हो चुका है। लेकनि फिलहाल यथास्थिति बनाये रखने वालों की चली है। भाजपा को विशेष रूप से मई 2014 के बाद से बादलों का साथ शर्मनाक लगने लगा है। अकािलयों की दागपूर्ण छवि भाजपा के सुशासन आैर अच्छी राजनीित के दावों से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती।
दूसरी ओर अकालियों ने बेवजह ही अपनी भूमकिा पंजाब तक सीमित कर ली है। मेरा मानना है यदि भाजपा के साथ गठबंधन की मजबूरियां न होतीं तो मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी भूमकिा निभा सकते थे । वह देश में इस वक्त संभवत: सबसे अधकि अनुभव वाले राजनीितक व्यक्ति हैं। और फिर एक सीमावर्ती राज्य और एक बहुत ही महत्वपूर्ण धार्मकि सम्प्रदाय से संबंध के चलते इन पिछले दो अशांत दशकों में हर कोई बादल की सलाह को अच्छी तरह सुन और मान सकता था। लेकनि अब उम्र के चलते संभवत: राष्ट्रीय स्तर पर शायद ही उनकी कोई भूमकिा शेष रह गई है।
लेकनि यहीं बस नहीं, भाजपा नेतृत्व भी बड़ी चतुराई से इस बात को जान गया है कि बड़े बादल की अब केवल एक ही इच्छा है: कि अपने बेटे का राजनीतकि भविष्य किस तरह सुनिश्चित  किया जाये।
यह कोई नहीं जानता कि पंजाब विधानसभा के आगामी चुनावों में नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता बादलों को बहुमत दिला पाने में मददगार साबित होगी या नहीं, लेकनि यह बात निश्चित है कि भाजपा अब अधकि देर तक गठबंधन रूपी यह फंदा अपने गले में डालकर रखने वाली नहीं है।
हमने आज ही क्रिसमस मनायी। एक दनि के लिए हम अपने क्षुद्र चातुर्य को छोड़ सकते हैं। यह दनि हमें प्रसन्न और हंसमुख रहने का लाइसेंस है। यह अच्छा और नेक बनने के लिए एक न्योता और लगभग एक आदेश भी है—तो अाइये और मेरे साथ एक कप काॅफी का आनंद लीजिए।


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