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तब अलाव जलाकर बैठ जाते और सुख-दुख साझा हो जाता

Posted On December - 29 - 2016
दीपचंद्र शर्मा

दीपचंद्र शर्मा

ठंड का मौसम कभी पास-पड़ोस और सामाजिक ताने-बाने को जोड़ने का काम करता था। आग पर हाथ सेकते हुए बातों की गर्मजोशी भाईचारा मजबूत करती थी। एक-दूसरे की तकलीफ का अंदाजा होता था और फिर कोई समाधान भी निकल आता।
लोहारू में 88 वर्षीय साहित्यकार वैद्य दीपचंद्र शर्मा ने बीते दौर को याद कर रहे हैं। कहते हैं, आज से 20 साल पहले की भी बात करें तो सर्दी बेहद कड़ाके की होती थी, अब तो कोई भी मौसम हो, लगता है जैसे कुछ खास नहीं है। तब लोग अपने घरों के आंगन में अलाव जलाकर बैठ जाते थे। घर में बच्चे-बुजुर्ग या फिर जवान सदस्य इस अलाव के चारों ओर बैठकर सुख-दुख की चर्चा करते थे। शर्मा कहते हैं, तब गन्ने के रस से गुड़ बनाने के लिए कोल्हू भी काफी होते थे। दूर से ही भाप उड़ती दिखती तो ठंड दूर भाग जाती। खेतों में हरे साग की बहुतायत होती और लोग कच्ची सरसों और बथुआ तोड़ कर लाते। यह साग मक्की या बाजरे की रोटियों के साथ लाजवाब स्वाद देता। पूरा परिवार इसका आनंद लेता।
उनके अनुसार आज न तो अलाव रहा और न ही संयुक्त परिवार। कहीं सौभाग्य से किसी गांव में संयुक्त परिवार मिल भी जाए तो अब अलाव की जगह बिजली के हीटर व गैस के स्टोव ने ले ली। घरों के टुकड़े होकर जगह इतनी कम रह गई है कि अलाव जला पाना भी संभव नहीं रहा। वैसे हम कोशिश कर सकते हैं कि वैसे दिन फिर लौट आएं, मौका मिले तो मिल बैठकर अलाव जलाकर सुख-दुख जरूर साझा करें। ये पल हमें काफी कुछ देकर जाएंगे।
 सुशील शर्मा, लोहारू


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