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तब 1 रुपया जुर्माना व हुक्के में चिल्म भरने की सजा देते थे

Posted On December - 22 - 2016
12212cd _Prem Chand Sharma

प्रेम चंद शर्मा

आज की तुलना में 50-60 साल पहले की बात करूं तो अपराध मामूली ही था। तब शहरों में बेशक वारदातें घटती रही हों लेकिन गांव-देहात में तो एक सिपाई भी चला जाता तो पूरा गांव खाली हो जाता।
एक तहसीलदार से ज्यादा अहमियत नम्बरदार को दी जाती थी। ग्रामीण थाने, तहसील तो दूर शहर तक में नहीं आते थे। गांव प्रह्लादपुर निवासी 75 वर्षीय प्रेमचंद शर्मा पुरानी यादों को साझा कर रहे हैं। उनके मुताबिक उस समय अगर गांवों में कोई झगड़ा, चोरी या अन्य अपराध हो जाता था तो उसे गांव के पंच निपटा लेते थे। तब पंचों की ओर से अपराधी को सजा देने के नियम तय थे और सभी उन्हें मानते भी थे। आरोपी पक्ष पर पंचायत 1 रुपये का जुर्माना या हुक्के में चिलम भरने का दंड सुना दिया करती थी। साथ ही दोनों पक्षों को एक दूसरे के गले मिलाकर आपसी रंजिश समाप्त करा दी जाती थी।
तब चोरी भी फसल या पशु आदि की होती थी। चोरी हो जाने पर पीडि़त पक्ष पंचों के पास न्याय की गुहार लगाता था। पंच पीपल के पेड़ के नीचे आरोपी के हाथ में गंगाजल का लोटा देकर उससे कसमें खिलाते थे। आरोपी जब अपनी गलती मान लेता था तो चोरी किए गए सामान को वापस कराने के पश्चात दंड के रूप में उसे पूरे गांव की चिलम भरने जैसे दंड दिए जाते थे। उन्होंने बताया कि उस समय लोग कोर्ट-कचहरी में यकीन नहीं रखते थे। पंचों के फैसले पर सभी की सहमति होती थी। यदि किसी दुकानदार से किसी ने सामान उधार लिया और वह उसकी रकम नहीं दे रहा थो पंच उस दुकानदार को उसकी रकम दिलाने में भी सहायता करते थे।
 विजय सिंगला, पलवल


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