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थॉमस अपने फर्ज के लिए लड़े थे, सेना ने भी इसे समझा और निभाया

Posted On December - 8 - 2016
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केरल में सेकेंड लेफ्टिनेंट ई थॉमस के परिजनों को सम्मानित सेना के अधिकारी व इनसेट में ई थॉमस।

लैंड में तैनात सेकेंड लेफ्टिनेंट ई थॉमस जोसेफ की कहानी सेना के अपने देश और समाज के प्रति फर्ज को व्यक्त करती है। जोसेफ वर्ष 1992 में विद्रोहियों के हमले का जवाब देते हुए शहीद हो गए थे। वे केरल के रहने वाले थे, हालात ऐसे बने कि शव को उनके घर नहीं भेजा सका और वहीं उन्हें दफना दिया गया। माता-पिता भी उम्र और आर्थिक हालत के चलते नागालैंड पहुंचने में नाकामयाब रहे। बाद में उन्होंने अपना घर भी बदल लिया। लेकिन सेना ने अपने शहीद जवानों की शहादत को सम्मान देते हुए जोसेफ के माता-पिता को तलाश लिया और न केवल उन्हें सम्मािनत किया बल्कि नागालैंड से जोसेफ के अंतिम अवशेष केरल पहुंचाए। जोसेफ के माता-पिता कहते हैैं- वह कभी नहीं लौटेगा लेकिन अब इतना तो है कि वह हमारे बेहद करीब है। शव को उसी गांव में दफनाया गया है जहां जोसेफ के माता-पिता रहते हैं।
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उस दिन हुआ यह था कि जोसेफ केरल के कोट‍्टयम स्थित अपने घर छुट‍्टी पर जाने के लिए तैयार थे। इस दौरान मैस में अपने दूसरे साथियों के साथ वे शाम का आनंद ले रहे थे। पांचवीं गोरखा राइफल्स की फर्स्ट बटालियन के साथ तैनात जोसेफ अपना पहला साल पूरा कर चुके थे। तभी इलाके में विद्रोहियों की हरकतों का पता चला। यूनिट एक्शन में आ गई और विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी शुरू हो गई। कमांडिंग ऑफिसर ने क्िवक रिएक्शन टीम को सजग कर दिया। इस बीच जोसेफ को कार्रवाई में शामिल होने के लिए नहीं कहा गया क्योंकि वे अपनी पोस्िटंग के ऑर्डर पहले ही पा चुके थे और रवाना होने की तैयारी में थे। लेकिन उन्होंने खुद इसका फैसला लेते हुए अपनी टीम का साथ निभाने का निर्णय लिया। वे सोच रहे थे कि अभी मैं विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए चला जाता हूं और सुबह जल्द केरल के लिए रवाना हो जाऊंगा। हालांकि इसके बावजूद अफसरों ने उसे रोका लेकिन वे नहीं माने।
अगली सुबह खबर आई कि जोसेफ नहीं रहे। विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई में वे शहीद हो गए। यह खबर शिलांग भी पहुंची जहां, जोसेफ के पिता सूबेदार मेजर एटी जोसेफ तैनात थे। इस खबर ने उन्हें स्तब्ध कर दिया और वे नागालैंड के लिए रवाना हो गए। वे कहते हैं, मैं जब वहां पहुंचा, मेरे साथ कुछ लोग थे। उसकी मौत को 3 दिन पहले ही बीत चुके थे, मैं वहां 4 बजे पहुंचा था और रात 8 बजे वापस लौट आया।
इस दौरान केरल में ई थॉमस जोसेफ की मां और बहनें उनका बेसब्री से इंतजार कर रही थीं, जिस समय उन्हें इसकी जानकारी मिली तो वे भी सुधबुध खो बैठी। आईएमए में जोसेफ की ट्रेनिंग के दौरान से उनके जानकार कर्नल साजन मोईदीन ने इस परिवार की कहानी अपने ब्लॉग में लिखी। उन्होंने कहा कि जोसेफ की माता अपने बेटे के अंतिम संस्कार स्थल को देखना चाहती थी लेकिन लंबी दूरी और उस पर होने वाले खर्च को वे पूरा कर पाने में अक्षम थे। यह कहानी यहीं खत्म हो जाती लेकिन इसी वर्ष जून में भारतीय सेना की रजत जयंती के उपलक्ष्य में समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें उन सभी शहीदों को याद करते हुए उनके परिजनों को सम्मानित करने का फैसला लिया गया जोकि बीते वर्षों में शहीद हुए हैं।
सेना ने शहीद ई थॉमस जोसेफ के परिवार से भी संपर्क साधा लेकिन वे नहीं मिले। लेकिन लगातार प्रयास के बाद रिटायर्ड सूबेदार एटी जोसेफ और उनकी पत्नी का पता चल गया। शहीद जोसेफ की मां अब भी बेहद सदमे में थी और उन्हें इसका और ज्यादा दुख था कि वह अब तक अपने बेटे की कब्र तक नहीं देख सकी है। इसके बाद बीते 8 अक्तूबर काे सेना की ओर से एटी जोसेफ, उनकी पत्नी और दो बेटियों, जोकि अब टीचर हैं को कोहिमा ले जाया गया, जहां उन्होंने अपने बेटे और भाई को श्रद्धासुमन अर्पित किए। इसके बाद उनके आग्रह पर शहीद सेकेंड लेफि्टनेंट ई थॉमस के अंतिम अवशेष उनके केरल स्थित गांव पहुंचा दिए गए।
 भा.भू.चंडीगढ़


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