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दुख की चिंता क्यों सताती है

Posted On December - 14 - 2016

11312CD _LONELY_AND_SADNESS_MANदुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसने अपने जीवन में कभी निराशा का दंश न झेला हो। निराशा का तन और मन दोनों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। धर्मवीर भारती के नाटक ‘अंधायुग’ का एक संवाद याद आ रहा है- ‘मर्यादा मत तोड़ो, तोड़ी हुई मर्यादा, कुचले हुए अजगर-सी, कौरव वंश को, अपनी गुंजलिका में लपेटकर, सूखी लकड़ी-सा तोड़ डालेगी।’ निराशा का भी कुछ ऐसा ही प्रभाव हम पर पड़ता है। निराशा भी अपने आगोश में जकड़कर अंदर से तोड़ डालती है। निराशा उत्साह सोखकर निस्तेज, कांतिहीन बना देती है और अंत में एक विषैले सर्प की भांति डस लेती है। वहीं, यदि हम हार न मानकर अपनी कल्पना व सकारात्मक चिंतन जारी रखें तो कई बार निराशा की स्थिति में हमारे हाथ वो उपयोगी सूत्र लग जाता है, जिससे पूरा जीवन ही बदल जाता है।
Caucasian businesswoman stretching at deskसमय के साथ-साथ परिस्थितियां भी बदल जाती हैं। कुछ लोग बदली हुई परिस्थितियों से तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाते और निराशा के गहरे भंवर में फंसकर डूबने लगते हैं। परिवर्तन के अभाव में न तो समाज और राष्ट्र ही आगे बढ़ पाते हैं और न व्यक्ति। निराशा से बचने के लिए ही नहीं, आगे बढ़ने के लिए भी जरूरी है कि हम बदली हुई परिस्थितियों को स्वीकार कर उनके अनुरूप खुद को भी परिवर्तित करने का प्रयास करें। इसी से हमारा अस्तित्व बचा रह सकेगा।
सुख-दुख, प्रसन्नता-पीड़ा, सफलता-असफलता अथवा संयोग-वियोग खेतों में कुएं से पानी निकालने वाली रहट की बाल्टियों के समान हैं। प्रत्येक चक्र में हर एक बाल्टी एक बार पूरी तरह से खाली होकर नीचे जाती है और नीचे से पानी से भरकर दोबारा ऊपर वापस आती है। जीवन में भी सही सब होता है। किसी भी प्रकार की निराशा से बचने के लिए इसे समझना और स्वीकार करना अनिवार्य है। निदा फ़ाज़ली कहते हैं-

रात अंधेरी भोर सुनहरी यही ज़माना है,
हर चादर में दुख का ताना सुख का बाना है
आती सांस को पाना, जाती सांस को खोना है,
जीवन क्या है चलता-फिरता, एक खिलौना है,
दो आंखों में एक से हंसना एक से रोना है।

यदि एक वाक्य में कहें तो जीवन में उत्थान-पतन स्वाभाविक है अतः निराशा भी स्वाभाविक है, लेकिन सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण का विकास कर उसे सहजता से स्वीकार करके हम पूरी तरह से निराशा व उसके दुष्प्रभावों व दुष्परिणामों से बच सकते हैं।
11412cd _Featured_Images_Post_wishबड़ी न सही छोटी-छोटी खुशियां ढूंढें

  • सब कुछ खत्म हो गया, अब क्या होगा, ये कहने के बजाय सोचें कि अब क्या करना है।
  • सबसे पहले निराशा का विश्लेषण करें और उसे दूर करने के उपायों पर सोचें। उन्हें व्यावहारिक रूप दें।
  • अपनी असफलताओं का विश्लेषण कर हार के कारणों का पता लगाएं। अपनी रुचि के काम चुनें और उनमें आगे बढ़ने का प्रयास करें।
  • समस्याओं को हल करने की दिशा में बढ़ें। बहुत सारी समस्याएं हों तो एक-एक करके उनसे निपटने का प्रयास करें।
  • यदि असावधानीवश जीवन में कोई गलत कदम उठ गया है तो उसके लिए पश्चाताप करने के बाद उसे भूल जाएं और सामान्य होकर जीवन में नयी शुरुआत करें।
  • उत्साहहीनता के क्षणों में कुछ नकारात्मक करने के बजाय शांत-स्थिर होकर बैठें और आराम से समय व्यतीत करें।
  • समस्याओं के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलें। प्रेरणा देने वाला साहित्य पढ़ें और खुद को तरोताज़ा व उत्साहित करने का प्रयास करें।
  • दूसरों से अधिक अपेक्षाएं करने के बजाय उन्हें अधिक स्पेस देने की कोशिश करें। पति-पत्नी अथवा बच्चों पर अपनी इच्छाओं का बोझ न लादें।
  • बिगड़े हुए संबंधों अथवा स्थितियों को और ज्यादा न बिगाड़ें। जहां तक संभव हो सके तो उन्हें सम्मानजनक स्थिति या अच्छे परिणाम तक पहुंचाने का प्रयास करें।
  • सर्वोत्कृष्ट करने की जिद छोड़कर कुछ भी करें और उसमें उत्कृष्टता लाने की कोशिश करें।
  • जीवन में कोई एक बहुत बड़ी खुशी पाने के लिए असंख्य छोटी-छोटी खुशियों की उपेक्षा करना मूर्खता है।
  • दूसरों से तुलना करके निराश होने के बजाय खुद को और बेहतर बनाने की दिशा में अग्रसर हों।
  • प्रकृतिप्रदत्त अपनी स्वाभाविक कमियों और अल्पज्ञता के लिए हीन भावनाओं को अपने ऊपर हावी न होने दें।
  • हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के बजाय कुछ काम करें। किसी रचनात्मक कार्य में व्यस्त रहें।
  • एकांत में पड़े रहने के बजाय घर के सदस्यों के बीच रहें और उनसे अपनी समस्याओं के बारे में चर्चा करके उन्हें दूर करने के लिए उनका सहयोग मांगें।
  • अत्यधिक भौतिकवादी व महत्वाकांक्षी न बनें। अपने चारों ओर छद्म या काल्पनिक महानता का घेरा न बनाएं।
  • अपने अहंकार को कम करें और आत्मविश्वास के स्तर में वृद्धि करने का प्रयास करें।
  • बदली हुई परिस्थितियों को स्वीकार कर खुद को उनके अनुरूप परिवर्तित करने का प्रयास करें। परस्पर विरोधी स्थितियों में संतुलन बनाने का प्रयास करें।
  • अपने को भावनात्मक रूप से सुदृढ़ बनाएं। हर वियोग अथवा बिछोह को झेलने व नया स्वीकार करने की क्षमता उत्पन्न करें।
  • अच्छे-बुरे हर दौर को स्वीकार कर अच्छे की प्रतीक्षा करें। किसी भी स्थिति में आशा का त्याग न करें। निराशा के कोहरे से शीघ्र मुक्ति मिलने वाली है, ये विश्वास बनाए रखें।

- सीताराम गुप्ता


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