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परिवार और पार्टी

Posted On December - 23 - 2016

पंजाब में चुनावी बिसात बिछ चुकी है। पंजाब के चुनाव का असर देश की सियासत पर भी पड़ना तय है। लगातार चुनावी हार का सामना करती आ रही कांग्रेस को वापसी की उम्मीद पंजाब से ही है। कैप्टन अमरेंद्र सिंह खुद कह चु्के हैं कि उनका यह अंतिम चुनाव होगा। वे 74 साल के हो गए हैं, इसके बाद चुनाव नहीं लड़ेंगे। कैप्टन के नेतृत्व में दो बार चुनाव हारी कांग्रेस इस बार मौका नहीं खोना चाहती है। प्रकाश सिंह बादल 89 साल के हो गये हैं। संभ्ावत: वे भी इसके बाद चुनाव न लड़ें। इन सबके बीच आम आदमी पार्टी ने पंजाब में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने लगातार रैलियां कर जिस तरह से महौल बनाया है उससे अकाली दल और कांग्रेस आप को चुनौती के रूप में देख रही है। इसका असर कांग्रेस की ओर से जारी उम्मीदवारों की सूची में देखने को भी मिला है। उसकी सूची में परिवारवाद  को ज्यादा तवज्जो नहीं दी गयी है। पार्टी ने एक परिवार के एक सदस्य को ही विधानसभा चुनाव का टिकट दिया हैहमीर सिंह की रिपोर्ट…

कैप्टन ही कांग्रेस के कप्तान
Amarinder Singh during an interview with Mail Today in Amritsar.पंजाब में आम आदमी पार्टी की ओर से विधानसभा चुनाव के लिए पूरी ताकत झोकने और प्रदेश में परिवारवाद का मुद्दा उठाने के बाद कांग्रेस के अब तक जारी किये उम्मीदवारों परिवारवाद का खात्मा होता नजर आ रहा है। कांग्रेस की ओर से जारी सूची में किसी भी नेता के परिवार के दो सदस्यों को विधानसभा का टिकट नहीं दिया गया है।  पार्टी की नीति एक परिवार को एक टिकट की नजर आ रही है। हालांकि, 2012 के विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह पटियाला से उमीदवार थे तो उनका बेटा रणइंदर सिंह समाना से चुनाव लड़ रहे थे। पत्नी परनीत कौर पटियाला लोकसभा क्षेत्र से सांसद थीं। पूर्व मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्ठल खुद उम्मीदवार थीं तो उनके दामाद बिक्रम बाजवा भी साहनेवाल विधानसभा क्षेत्र से उमीदवार थे। हालांकि, कांग्रेस सांसदों के बेटे या पारिवारिक सदस्य को विधानसभा टिकट देने पर रोक नहीं लगाई। प्रताप सिंह बाजवा का भाई फतेह जंग सिंह बाजवा, चौधरी संतोख सिंह का बेटा बिक्रम चौधरी समेत कई नेता टिकट की दौड़ में हैं।  एक परिवार में एक को टिकट का असर महिला नेताओं पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है। अमरिंदर सिंह के लोकसभा से त्याग पत्र देकर पटियाला से चुनाव मैदान मेंं आने से मौजूदा विधायक व उनकी पत्नी परनीत कौर का टिकट कट गया। नवांंशहर से विधायक इकबाल कौर का बेटा 2012 के चुनाव में छोटा था इस बार वह 25 साल के हो गये तो उनकी मां की टिकट कट गई और बेटा प्रत्याशी बन गया। प्रताप बाजवा की पत्नी चरनजीत कौर बाजवा विधायक थीं, लेकिन उनके भाई फतेहजंग सिंह बाजवा टिकट ले गये और भाभी का टिकट कट गया। मौजूदा तीन विधायक महिलाएं इस बार चुनाव मैदान से बाहर हो गई हैं।

अकाली दल : पार्टी ही परिवार कैसे निकले बाहर
अकाली दल इस वक्त ऐसे मोड़ पर है कि यह परिवारवाद से बाहर नहीं आ सकता। पार्टी का पूरा ढांचा परिवारवाद के इर्द-गिर्द बुना गया है। बादल मंत्रिमंडल काे ही ले लेंें। प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री हैं। बेटा सुखबीर सिंह बादल उपमुख्यमंत्री हैं,  दामाद आदेश प्रताप सिंह कैरों, सुखबीर बादल के साले बिक्रम सिंह मजीठीया और रिशतेदार जनमेजा सिंह सेखों सभी मंत्री हैं। बादल की पुत्रवधु केंद्र में मंत्री हैं। टिकटों के इस बंटवारे में सभी मंत्री फिर से चुनाव मैदान में होंगे। कृषि मंत्री जत्थेतार तोता सिंह के बेटे बरजिंदर सिंह को मोगा से टिकट दे दिया गया है। तोता सिंह खुद धर्मकोट से चुनाव लड़ रहे हैं। इसके इलावा सांसदों बलविंदर सिंह भूंदड़, सुखदेव सिंह ढींढसा, रणजीत  सिंह ब्रह्मपुरा, प्रेम सिंह चंदूमाजरा समेत सभी वरिष्ठ नेताओं के बेटों को टिकट से निवाजा जा चुका है। सुखदेव सिंह ढींढसा के बेटे परमिंदर सिंह ढींढसा तो बादल सरकार में वित्त मंत्री हैं। ब्रहमपुरा के बेटे को उपचुनाव में जिताकर विधानसभा भेजा गया था। भूंदड़ के बेटे 2012 में चुनाव हार गये थे। इस बार फिर सरदूलगढ़ से पार्टी के उम्मीदवार हैं। प्रेम सिंह चंदूमाजरा के बेटे हरिंदर पाल सिंह सनौर से पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। टिकटें काट दिए जाने के कारण सात विधायक अकाली दल को अलविदा भी कह चुके हैं। हाॅकी ओलंपियन प्रगट सिंह तो पहले ही अकाली दल से अस्तीफा दे चुके हैं और अब कांग्रेस में शामिल होकर टिकट के दावेदार हैं। बाघा पुरावा से विधायक महेशइंदर सिंह और निहाल सिंह वाला से विधायक राजविंदर कौर भागीके भी टिकट न मिलने के कारण कांग्रेस में चले गए हैं।

कैप्टन होंगे कांग्रेस का चेहरा
cong copyकांग्रेस के पंजाब में चेहरा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह होंगे। पार्टी की चुनाव मुहिम के प्रमुख प्रशांत किशोर ने पार्टी के बजाय कैप्टन को ही चेहरा पेश किया है। इसलिए ‘हलके में कैप्टन’, ‘काफी विद कैप्टन, चाहता है पंजाब’ और ‘कैप्टन की सरकार’ जैसे नारे दिए हैं। कांग्रेस में कैप्टन ही ऐसे नेता हैं जिनका पूरे प्रदेश में प्रभाव है। उनकी फैसला लेने की  क्षमता पर लोगों काे भरोसा है। लेकिन कैप्टन पर यह आरोप भी लगते रहे हैं कि वे बादलों के खिलाफ पहले जैसे तेवरों के साथ मैदान में नहीं आ रहे हैं। वे कुछ खास लोगों से ही घिरे रहते हैं, जिससे जनता और नेताओं को उन तक पहुंचने में परेशानी होती है। कांग्रेस प्रत्येक परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी या तीन साल तक 2500 रुपये बेरोजगारी भत्ता देने, किसानों का पूरा कर्ज माफ करने, नशे को तीस दिन के भीतर खत्म करने,  एसवाईएल को रोकने के वादे करके सत्ता में आने की उम्मीद लगाये हुए है।

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अकाली दल : परिवार ही करेगा बेड़ा पार
Parkash-Singh-Badal-INVC-NEWS copyअकाली दल इस वक्त ऐसे मोड़ पर है कि यह परिवारवाद से बाहर नहीं आ सकता। पार्टी का पूरा ढांचा परिवारवाद के इर्द-गिर्द बुना गया है। बादल मंत्रिमंडल काे ही ले लेंें। प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री हैं। बेटा सुखबीर सिंह बादल उपमुख्यमंत्री हैं,  दामाद आदेश प्रताप सिंह कैरों, सुखबीर बादल के साले बिक्रम सिंह मजीठीया और रिश्तेदार जनमेजा सिंह सेखों सभी मंत्री हैं। बादल की  पुत्रवधू केंद्र में मंत्री हैं। टिकटों के इस बंटवारे में सभी मंत्री फिर से चुनाव मैदान में होंगे। कृषि मंत्री जत्थेतार तोता सिंह के बेटे बरजिंदर सिंह को  मोगा से टिकट दे दिया गया है। तोता सिंह खुद धर्मकोट से चुनाव लड़ रहे हैं। इसके इलावा  सांसदों बलविंदर सिंह भूंदड़, सुखदेव सिंह ढींढसा, रणजीत  सिंह ब्रह्मपुरा, प्रेम सिंह चंदूमाजरा समेत सभी वरिष्ठ नेताओं के बेटों को टिकट से नवाजा जा चुका है। सुखदेव सिंह ढींढसा के बेटे परमिंदर सिंह ढींढसा तो बादल सरकार में वित्त मंत्री हैं। ब्रहमपुरा के बेटे को उपचुनाव में जिताकर विधानसभा भेजा गया था। भूंदड़ के बेटे 2012 में चुनाव हार गये थे। इस बार फिर सरदूलगढ़ से पार्टी के उम्मीदवार हैं। प्रेम सिंह चंदूमाजरा के बेटे हरिंदर पाल सिंह सनौर से पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। टिकटें काट दिए जाने के कारण सात विधायक अकाली दल को अलविदा भी कह चुके हैं। हाॅकी ओलंपियन प्रगट सिंह तो पहले ही अकाली दल से इस्तीफा दे चुके हैं और अब कांग्रेस में शामिल होकर टिकट के दावेदार हैं। वाघा पुराना से विधायक महेशइंदर सिंह और निहाल सिंह वाला से विधायक राजविंदर कौर भागीके भी टिकट न मिलने के कारण कांग्रेस में चले गए हैं।

अकाली दल के पास बादल ही विकल्प
tak copyअकाली-भाजपा गठबंधन की ओर से इस बार फिर प्रकाश सिंह बादल को ही मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जा रहा है। बादल का कोई विकल्प फिलहाल अकाली-भाजपा के पास नहीं है। सुखबीर इतने लंबे समय में सत्ता की कमान अपने हाथ में लेने के बावजूद चुनावी चेहरा नहीं बन पा रहे हैं, लेकिन पूरी चुनाव मुहिम उनके ही हाथ  में होगी। उन्होनें खुद को सीईओ की तरह पेश किया है। चुनाव को एक प्रबंधन के तौर पर देखने वाले सुखबीर बादल विपक्षी दलों में अपने व्यक्ति फिट करने और दूसरे दलों के बागियों को उत्साहित करने के माहिर के रूप में देखे जाते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदी की घटनाएं, किसान खुदकुशियां, दलित अंदोलन और बेरोजगारों की बड़ी फौज के कारण सत्ता विरोधी भावनाओं का सामना कर रहे अकाली-भाजपा गठबंधन ने सतलुज-यमुना लिंक नहर के जरिए पानी हरियाणा को न देने, धार्मिक यादगार और विकास के मुद्दों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है।

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