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पाठकों का प्यार ही पुरस्कार

Posted On December - 20 - 2016

वंदना सिंह
12012CD _FBहिंदी में कम ही लेखक ऐसे हैं जो साहित्येतिहास की ओर मुड़े हैं और गंभीरता से काम कर रहे हैं। कहा जाता है कि अपनी विरासत को समृद्ध करना जितना आवश्यक है, उतना ही अपनी विरासत को संभालना और उसको सहेजकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है। विरासत को जब हम अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं तो उसका एक संस्कार बनता है और वही संस्कार कालांतर में सृजन की जमीन तैयार करता है। हिंदी में ऐसे ही लेखक हैं डॉ. देवेन्द्र कुमार शर्मा।
करीब दो साल पहले उनकी किताब हिन्दी साहित्य का विकास, ऐतिहासिक दृष्टिकोण प्रकाशित हुई थी। इसमें इलाहाबाद जैसा ऐतिहासिक शहर था और उसकी परिधि में 1900 से लेकर 1950 तक की साहित्यिक-सांस्कृतिक घटनाओं का लेखा-जोखा पेश किया गया था। देवेन्द्र शर्मा ने मदनमोहन मालवीय पर भी कार्य किया है। अभी कुछ दिनों पहले अंग्रेजी में उनकी एक किताब पार्टीशन एंड रिफ्यूजी रिसेटलमेंट आई है। इस किताब में उन्होंने बंटवारे के बाद की विस्थापन नीतियों को केंद्र में रखा है।
देवेन्द्र साहित्य के समकालीन परिदृश्य को बहुत उत्साहजनक नहीं मानते। उनका मानना है कि जिस तरह से इस वक्त साहित्य में खेमेबाजी, अपने-अपने खेमे के लेखकों को स्थापित करने की जोड़-तोड़ या फिर खुद को येनकेन प्रकारेण आगे बढ़ाने की ललक दिखाई देती है वो साहित्य के लिए खतरनाक है। इनका मानना है कि इस वक्त कई साहित्यकार आत्मप्रशंसा और आत्मश्लाघा के शिकार नजर आ रहे हैं। इसका नतीजा ये हो रहा है कि उनको अपेक्षित मान-सम्मान नहीं मिलता। इससे उनके अंदर कुंठा घर करने लग जाती है, जो अंतत: उनकी रचनात्मकता को प्रभावित करती है।
उनका मानना है कि लेखकों को अपनी कृति को पाठकों की अदालत में फैसले के लिए छोड़ देना चाहिए। बहुतायत में कविता लिखे जाने को वे बेहतर मानते हैं। उनका कहना है कि इन दिनों तो इंटरनेट के माध्यम से कविता कर्म का विस्तार हो रहा है। लोग तो अब व्हाट्सएप पर कविताएं लिख रहे हैं। सूचना क्रांति के इस युग में इतने लोगों का कविताएं लिखना संतोष की बात है लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि इन माध्यमों पर लिखने वाले लेखक साहित्य की जटिलताओं या यो कहें कि गंभीरता को नहीं समझ पा रहे हैं। कई बार तो ये लगता है कि अच्छी और गंभीर कविताएं इन बुरी कविताओं की भीड़ में खो जाएंगी। अच्छी कविताएं समय के साथ साहित्य में और पाठकों के बीच अपना स्थान बनाएंगी। उनके मुताबिक जो लोग खुद को अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे थे वे अब ब्लाग, फेसबुक जैसे माध्यमों के जरिए पाठकों तक पहुंच रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया की अराजकता पर ध्यान देने की जरूरत है।
इन दिनों साहित्य में विचारधारा की जो कथित टकराहट दिख रही है, उसको वे कुछ लेखकों की कुंठा मानते हैं। विचारधारा की टकराहट में जो एक किस्म की उग्रता दिखाई देती है, दरअसल वो व्यक्तिगत खुंदक है। जब केंद्र में सरकार बदली तो लंबे समय से साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं पर कब्जा जमाए बैठे एक खास विचारधारा के लोगों को रुख्सत किया जाने लगा। इसकी वजह से विचारधारा के आवरण में विरोध शुरू हो गया। दरअसल गंभीरता से सृजनकर्म में लगे लेखकों को इन बातों से ज्यादा लेना-देना नहीं होता क्योंकि उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार पाठकों का प्यार है।


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