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पाणिनि के भारत का बिंब

Posted On December - 20 - 2016

12012CD _20161220_153741डॉ. जय नारायण कौशिक हरियाणा साहित्य जगत में आदर के साथ लिया जाना वाला नाम है। विभिन्न विधाओं में लिखी तकरीबन अस्सी पुस्तकें उनके रचनाकर्म की गवाही देती नजर आती हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक रह चुके कौशिक सांस्कृतिक अकादमी व हरियाणा इन्साइक्लोपीडिया के सलाहकार रह चुके हैं। कोश कला में गहरी पैठ रखने वाले कौशिक हरियाणा हिंदी कोश, वैदिक हरियाणवी कोश, लोकनाट्य कथा कोश, हरियाणा प्रत्यय कोश, देवी भागवत सूक्तिसुधा कोश का संपादन कर चुके हैं। ‘राइन नदी से सिन्धु तक’ व ‘एक पंथ दो काज’ पर उन्हें राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार मिल चुका है। भारतीय साहित्य परिषद ने  इनकी पुस्तक ‘मेरी कैलाश मानसरोवर यात्रा’ पर पुरस्कार दिया। उम्र के आठ दशक पार चुके कौशिक अभी भी हिंदी, अंग्रेजी व हरियाणवी में लेखन जारी रखे हुए हैं।
यूं तो डॉ. कौशिक निरंतर अध्ययनशील रहते हैं। यह पूछे जाने पर कि पिछले दिनों क्या पढ़ा जिसे नई पीढ़ी से पढ़ने का आग्रह करना चाहेंगे? उन्होंने डॉ. वासुदेव शरण ने अग्रवाल की शोधकार्य की परिवर्धित रचना- पाणिनि कालीन भारतवर्ष की महत्ता पर प्रकाश डाला। जिसका मूलाधार पाणिनिकृत अष्टाध्यायी है। इसके चार हजार सूत्र तत्कालीन भारतीय सामाजिक जीवन, भूगोल, आर्थिकी, शिक्षा, राजनीति, धार्मिक व आध्यात्मिक जीवन का चित्र उकेरते हैं। रचनाकार ने पाठकों की सुविधा के लिये सारगर्भित टिप्पणी के साथ आठ अध्यायों में इस ज्ञान को समेटने का प्रयास किया है। वस्तुत: शलातपुर (अफगानिस्तान) में जन्मे पाणिनि अत्यंत मेधावी व प्रतिभा संपन्न आचार्य थे। पहले अध्याय में पाणिनि के शास्त्र का जिक्र है। दूसरे  अध्याय में तत्कालीन भूगोल का उल्लेख है। तीसरे अध्याय में तत्कालीन सामाजिक जीवन का विस्तृत विवरण उल्लिखित है। चौथे अध्याय में तत्कालीन आर्थिक दशा का विवरण है। इसमें भूमि प्रबंधन की इकाई भी शामिल है। इसी तरह पांचवें अध्याय में शिक्षा व साहित्य का विवेचन है। इसमें वैदिक शिक्षा संस्थाओं का जिक्र है, जो गुरुकुल से लेकर विश्वविद्यालयी स्वरूप दर्शाती है। इसी प्रकार छठे अध्याय में धर्म के अंतर्गत यज्ञीय कर्मकांड एवं देव पूजा संबंधी सामग्री है। शासन और राजतंत्र सातवें अध्याय का विवेचन विषय है।
पाणिनि ने अष्टाध्यायी में सूत्रों के माध्यम से वैदिक जन, कुल, ब्राह्मणकालीन जनपद, संघ के जरिये राज्य को सुनियोजित ढंग से चलाने का जिक्र किया है। जनता राजा के प्रति आदर का भाव रखती थी। सामाजिक जीवन में गोत्र का भी महत्व था। लोक संस्थाओं के भिन्न-भिन्न रिवाज थे। जिन्हें परिभाषिक शब्दावली में सामयिक कहते थे। इन समूहकृत नियमों को राजकृत नियमों जैसा सम्मान मिलता था।  शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए लाग, ताग (तागड़ी) पाग (पगड़ी), पुच्छी (पशु) उगाही, हलों की संख्या, चूल्हा टैक्स आदि लगान थे। कानून व्यवस्था की देखरेख सैनिक करते थे तो समाज में शक्ति द्वारा बलात‍् हरण करने वाला तबका भी था। छोटे समूह लूटपाट भी करते थे। अष्टाध्यायी में आयुधजीवी समुदाय की विस्तृत जानकारी भी है। इसके अलावा तत्कालीन समाज के विभिन्न संघों का जिक्र भी है।
पाणिनि कालीन भारतवर्ष की इस कृति के आठवें अध्याय में पाणिनि और कौटिल्य, पाणिनि और बुद्ध, मनुष्यों के नाम, पाणिनि और मध्य मार्ग जैसे विषयों पर रोचक जानकारी उपलब्ध है। रचना में तत्कालीन समाज को समझने के लिए चित्र भी प्रकाशित किये गये हैं। परिश्रमपूर्वक तैयार की गई पुस्तक नई पीढ़ी के लिए बेहद उपयोगी है।


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