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फतेहगढ़ का अखाड़ा देता है सेना, पुलिस को जवान

Posted On December - 19 - 2016

दलेर सिंह, जींद
11912cd _IMG_20161213_165544जुलाना-नंदगढ़ लिंक रोड पर छोटा-सा गांव फतेहगढ़। आसपास के इलाके में इस गांव को ‘छान्या’ के नाम से जाना जाता है। शाम करीब 6 बजे का समय है और गांव से बाहर सरकारी स्कूली से सटी खाली जमीन (निर्माणाधीन मिनी स्टेडियम) पर दर्जनों बच्चे कुश्ती और कबड्डी के दांव पेंच लगा रहे हैं। इन बच्चों के लिये सरकार के खेल विभाग का कोई कोच नहीं बल्कि गांव का ही युवक संजीत कौशकि और एक वृद्ध पहलवान जयभगवान खेलों के दांव पेंच सीखा रहे हैं। माहौल पूरी तरह से खेलमय है। पसीने से तर-बतर सभी खिलाड़ियों की आंखों में कुछ खास करने का सपना है। क्योंकि इसी गांव की मिट्टी ने पिछले 19 वर्षों में कई सेना और पुलिस के जवान दिये हैं तो कई खिलाड़ियों ने अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर अपना दमखम दिखाकर नाम कमाया है। इस अखाड़े के शुरू होने की दास्तां है तो मार्मकि, लेकिन इसके शुरू  होने से गांव के बच्चों का स्वास्थ्य तो मजबूत हो ही रहा है, उन्हें जीवन में आगे बढ़ने की नयी राह भी मिल रही है।
इसी अखाड़े की मिट्टी में पसीना बहाने वाली मनीषा दलाल वर्ष 2010 के एशियाड खेलों में कबड्डी गोल्ड मेडल जीतने वाली टीम की सदस्या रही। मनीषा इस समय हरियाणा पुलिस में इंस्पेक्टर के पद पर तैनात है। सुदेश दुहन ने कुश्ती खेलते हुए  4 विदेशी टूर किये और 800 मीटर की दौड़ में स्टेट अवार्ड जीता। इसके बाद वह कुश्ती कोच के पद पर नियुक्त हुई। इस तरह से फतेहगढ़ के अखाड़े से नकिले कई युवा हरियाणा, दिल्ली व चंडीगढ़ पुलिस में तैनात हैं तो कई युवा भारतीय सेना में जाकर देश की रक्षा कर रहे हैं।
गांव वालों का कहना है कि इन अखाड़े ने युवाओं की दशा और दिशा बदल दी है। यहां से उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा मिल रही है और मार्गदर्शन भी। अखाड़ा संचालक संजीत कौशकि के मुताबकि जो युवा मिट्टी में कड़ी मेहनत कर लेगा वह अनेक बुराइयों से अपने आप ही बच जाता है। कुश्ती और कबड्डी दोनों ऐसे खेल हैं जिनमें शारीिरक शक्ति का भरपूर प्रयोग होता है। इससे जीवन संयमित बनता है और स्टेमना बढ़ता है। संजीत कुमार के मुताबकि युवाओं को सही रास्ते पर लाने का खेलों से बेहतर दूसरा माध्यम नहीं हो सकता।

पिता का सपना पूरा किया

अखाड़ा संचालक संजीत कौशकि

अखाड़ा संचालक संजीत कौशकि

अखाड़े के संचालक संजीत कौशकि (41) बताते हैं कि उनके पिता भैयाराम कौशकि सरकारी स्कूल में हिंदी अध्यापक थे। उनकी खेलों के प्रति गहन रूचि थी। इसके चलते वे स्कूल में बच्चों को बैडमिंटन और कुश्ती के  लिये न केवल प्रेरित करते थे, बल्कि समय नकिालकर उन्हें इन खेलों के गुर भी सिखाते थे। उनके पिता का सपना था कि गांव के बच्चे खेलों में अंतराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाएं, लेकिन अचानक वर्ष 1990 में एक सड़क दुर्घटना में उनकी आकस्मकि मौत हो गयी। संजीत ने बताया कि उस दौरान वह नौवीं कक्षा का छात्र था। कुछ वर्ष बाद मन में आया कि क्यों न पिताजी का सपना साकार किया जाए। इसी सपने को जहन में लेकर अपने खेत के एक कोने मे 5-7 बच्चों को ही कबड्डी और कुश्ती के गुर सिखाने लगे। इस कार्य में अपने जमाने के नामी पहलवान रहे गांव निवासी जयभगवान (63) ने सहयोग देना शुरू किया। गांव के बच्चों को खेलों के प्रति जागरूक किया गया और देखते ही देखते उनके अखाड़े में बाल खिलाड़ियों की संख्या बढ़ने लगी। बाल खिलाड़ी युवा हुए तो वे राज्य, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम कमाने लगे।

अब 2 जगह पर चल रहे हैं अखाड़े
संजीत कौशकि ने बताया कि 3 साल पहले गांव में पंचायती जमीन में मिनी खेल स्टेडियम मंजूर हुआ था। स्टेडियम के नाम पर उस जमीन पर कुछ खास काम तो नहीं हुआ, लेकिन उसी जमीन के एक टुकड़े पर अब अखाड़ा चलाया जा रहा है, जिसमें सुबह-शाम दर्जनों बच्चे खेल के गुर सीखते हैं। इसी तरह से जुलाना कस्बे में जेबीएम स्कूल के खेल मैदान में भी अखाड़ा शुरू किया गया है। यहां जुलाना कस्बा और नकिटवर्ती गांवों के युवा कुश्ती और कबड्डी खेलने आते हैं। दोनों ही स्थानों पर वे अपनी सहयोगियों के साथ बच्चों को खेल के गुर निरंतर सीखा रहे हैं।

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