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मैं चाहता था ऐसा दूसरों के साथ न घटे

Posted On December - 29 - 2016

harman sidhu 2 copyपीजीआई चंडीगढ़ में बैड पर लेट हुए जब मेरी कमर के निचले हिस्से में सूई चुभने जैसा दर्द होता तो मैं एक ऐसे अहसास से भर जाता जोकि मुझे दूसरों के लिए कुछ करने को प्रोत्साहित करता। कैसी अजीब बात थी कि मैं खुद ऐसी हालत में था कि उठ भी न सकूं लेकिन चाहता था कि मेरे साथ जो बीता है, वह किसी और के साथ न घटे। चंडीगढ़ में ट्रैफिक जागरूकता के लिए काम कर रही संस्था अराइव सेफ के संचालक हरमन सिंह सिद्धू यह बताते हैं तो उनकी आंखों में दर्द साफ झलकता है। उनके मुताबिक अस्पतालों में आंकड़े देखे जाएं तो मालूम होगा कि सड़क हादसों के मामले सर्वाधिक आते हैं। इस बात ने मुझे प्रेरित किया कि लोगों को ट्रैफिक नियमों के पालन के लिए सचेत किया जाए और हम जुट गए।

क्या हुआ था उस शाम
वे कहते हैं, 24 अक्तूबर, 1996 की वह शाम मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। तब मैं महज 26 साल का था। उस दिन हम हिमाचल में रेणुका झील से चंडीगढ़ लौट रहे थे, गाड़ी में तीन लोग थे। रास्ते में एक तेंदुए का बच्चा नजर आया। और हम उसे और नजदीक से देखने के लिए जंगल में उसके पीछे लग गए। कुछ आगे जाकर एकाएक गाड़ी का संतुलन बिगड़ गया और वह लुढ़क गई। मैं ड्राइवर के ठीक पीछे बैठा था। गाड़ी लुढ़क कर करीब 70 फुट नीचे गिर चुकी थी और हम बेसुध थे। मुझे कमर में गहरी चोट आई थी। जान बच गई थी लेकिन तय था कि इसके बाद का जीवन व्हीलचेयर पर कटेगा।
दोनों दोस्तों ने हाल ही में एमबीबीएस की डिग्री पूरी की थी और वे मेरी हालत को समझते थे। वे मुझे जैसे-तैसे निकाल कर रोड तक लेकर आए। अंधेरा गहरा चुका था और जंगली जानवरों का खतरा भी बढ़ गया था। तब हमें एक ट्रक ड्राइवर वहां मिला, जिसने हमें पावंटा साहिब तक पहुंचाया। वहां आकर मुझे मेिडकल मदद मिली। उस समय मैं बस यही सोच रहा था कि कब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो पाऊंगा। हालांकि लग रहा था कि मेरी टांगें टूट चुकी हैं।

जाना चाहते थे कनाडा

CHANDIGARH: Harman Singh Sidhu, who has been confined to a wheelchair for the past 20 years following a car crash in Himachal Pradesh, is satisfi ed with with the Supreme Co urt order banning sale of liqu or on national and state high ways. He, however, feels there is still a long way to go before any perceptible change can be seen on the ground. A mechanical engineer by profession, Sidhu had become the first person to drag a state (Punjab) to court seeking ban on the sale and location of li quor vends along highways in December 2012. “States' excise departments are smart eno ugh to locate the shops just metres away so that they can't be seen from the main road and have no direct access. We found this when we surveyed about 60,000 km in the past two years. We will carry out the survey again to see whether states are actually complying with the apex court order,“ Sidhu told TOI. His NGO, ArriveSafe had filed a PIL in Punjab and Haryana High Court seeking ban on opening of liquor shops on state and national highways in 2012. Photo: BALISH AHUJA

सिद्धू बताते हैं मैं कनाडा जाकर वहां इंडस्ट्री लगाने की सोच रहा था। 2 नवंबर के लिए मेरी हवाई टिकट बुक हो चुकी थी लेकिन इस हादसे ने मेरी सारी योजनाओं को चौपट कर दिया। टिकट कैंसिल कर दी गई। हालांकि कुछ दिन बाद डॉक्टर ने मुझे एक खुशखबरी दी। खबर यह थी कि मैं व्हील चेयर पर रहकर अपनी बाद की जिंदगी व्यतीत कर सकता था। हालांकि यह किसी पक्षी के पंख कतरने जैसी बात थी, लेकिन मुझे हालात को स्वीकार करना पड़ा। मैं करीब 2 साल पीजीआई और इसके बाहर बैड पर रहा। लेकिन इस हादसे ने मेरी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया था। मुझे स्पाइनल इंजरी थी।

भाई ने दिया कम्प्यूटर
अस्पताल से लौटने के बाद मैं यही सोच रहा था, अब क्या करूं। एक दिन भाई ने मुझे कम्प्यूटर गिफ्ट किया और मुझे एक राह नजर आई। मैं वेबसाइट डिजाइन करने लगा। इसके जरिये मुझे अलग ही दुनिया नजर आई। मेरी नजर देश और दुनिया भर में होने वाले सड़क हादसों पर गई और मैं हैरान रह गया। मुझे पता लगा कि मेरे जैसे काफी संख्या में लोग हैं। इसके बाद मैंने ट्रैफिक सेफ्टी के प्रति जागरूक करने के लिए अभियान शुरू किया। वे बताते हैं, हम साधारण तरीके से बोर्ड आदि लेकर यहां-वहां खड़े होकर वाहन चालकों को समझाते थे लेकिन तब चंडीगढ़ के एसपी ट्रैफिक अमिताभ ढिल्लों ने एक दिन मुझे कहा- आप वेबसाइट बनाकर काम कीजिए, ज्यादा लोगों तक पहुंचोगे। इसके बाद हमने वेबसाइट तैयार की, जिस पर 3 महीने के अंदर 1 लाख लोगों ने विजिट किया और अपनी जागरूकता साबित की।

अौर फिर एक बड़े कदम ने बदले हालात
सिद्धू बताते हैं कि नेशनल हाईवे के किनारे बने शराब के ठेके सड़क हादसों को बढ़ावा देने की वजह बन रहे थे। ट्रक चालक शराब का सेवन करके ड्राइविंग करते थे। मैंने एडवोकेट रवि कमल गुप्ता के सहयोग से पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में नेशनल हाईवे के किनारे शराब के ठेके हटवाने के लिए याचिका दायर की। कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। लेकिन दो राज्यों की सरकारों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कर दी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और हाईवे के किनारे शराब के ठेके प्रतिबंधित कर दिए। हरमन सिद्धू बताते हैं, हमने सुप्रीम कोर्ट को इसकी जरूरत समझाई कि सड़क हादसों के पीछे हाईवे पर शराब के ठेके होना किस तरह गलत है।

सिद्धू कहते हैं, हमारी जीत हुई थी लेकिन सरकारों के नजरिये से बेहद दुख भी हुआ। शराब की बिक्री से अपनी आय को नुकसान होते देखकर सरकारों ने प्रतिबंध का विरोध किया था। इस आदेश के बाद मुझे काफी संतोष है कि आखिर हम सड़क हादसों की कुछ हद तक रोकथाम करने में कामयाब हो सके हैं। उनके मुताबिक मेरा काम अभी भी जारी है। हालांकि जिंदगी का अकेला सफर कभी-कभी डरा जाता है लेकिन मैंने समय को टुकड़ों में बांटना सीख लिया है। 6 घंटे का एक पीरियड मैं तय करके चलता हूं, जोकि कभी 15 मिनट के एक शेड‍्यूल में बदल जाता है। इस तरह से मैं खुद को व्यस्त रखता हूं।
सिद्धू के घर के बाहर एक पुलिस मैन तैनात रहता है। शराब लॉबी से चेतावनी के बाद उन्हें सुरक्षा मुहैया कराई गई है। हालांकि, वे अब भी ट्रैवल करने का शौक रखते हैं और अपनी इनोवा में ड्राइवर के साथ निकल पड़ते हैं, नये रास्ते खोजने।
इसे समझिए
185 शराब ठेके थे वर्ष 2012 में जब अराइव सेफ ने हाईकोर्ट में याचिका डाली। पानीपत से लेकर जालंधर तक 291 किलोमीटर के हाईवे पर स्थित इन ठेकों की वजह से काफी हादसे होते थे।
हरमन कहते हैं, जिंदगी कीमती है। देश में रोड का नेटवर्क बढ़ रहा है, आर्थिक विकास का अाधार बेहतर रोड है लेकिन हादसे हमारी जिंदगियों को तहस-नहस कर देते हैं। हाईवे के किनारे ठेकों पर प्रतिबंध के बावजूद हम इसे जांचते हैं और जहां भी वे खुले मिलते हैं, इसकी सरकार से शिकायत करते हैं।
 मोना, चंडीगढ़


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