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यहां खत्म होती हैं दिलों की सरहदें

Posted On December - 8 - 2016

सरहद बांटने का काम ही करती हैं, लेकिन यहां एक सरहद जोड़ रही है, एक छत के नीचे लाकर वक्त के थपेड़े झेल रहे युवाओं को बेहतर भविष्य के मार्ग पर प्रशस्त कर रही है। महाराष्ट्र में पुणे स्थित एनजीओ सरहद ने हिंसा प्रभावित कश्मीर और आसाम सहित अन्य इलाकों के बच्चों को सही मायने में राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाया है। ये बच्चे बेशक विभिन्न इलाकों से हैं, लेकिन अब बेहतर नागरिक बनने की दिशा में अग्रसर हैं।

वह साल 1992 था, जोगिंदर सिंह तब महज 4 साल का था। जम्मू में डोडा स्थित उसके घर को आतंकवादियों ने घेर लिया। धांय…धांय गोलियां बरसने लगीं। जब गोलियों की आवाज बंद हुई तो घर में लाशों का ढेर लग चुका था। आतंकवािदयों ने जोगिंदर सिंह के परिवार के 16 लोगों को मार डाला था। आतंकियों ने उसके पिता से बदला लेने के लिए यह कांड अंजाम दिया था। अब जोगिंदर बीकॉम फाइनल ईयर का स्टूडेंट है।
वहीं कश्मीर में बड़गांव का मुख्तार अहमद अपने स्कूल जाने के लिए 6 किलोमीटर का रास्ता पार करता था। उसके रास्ते में आर्मी का कैंप पड़ता था। बहुत बार सीमा पार से गोलीबारी होती, एक बार एक गोली उसके चाचा के बेटे के पैर से निकल गई। उनके सामने दो रास्ते थे, घर बैठो या फिर गोली खाओ। लेकिन अखबार में एक विज्ञापन ने उनकी जिंदगी को बदल दिया।
जोगिंदर, मुख्तार और इन्हीं जैसे तमाम बच्चों की जिंदगी में अब उम्मीद का सवेरा खिल चुका है। और यह काम किया है सरहद के संचालक दम्पति सुषमा और संजय नाहर ने। उनके एनजीओ के तहत करीब 200 बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे हैं। इन बच्चों की कहानी।

पुणे में कश्मीर और दूसरे प्रदेशों के युवाओं के साथ एनजीओ सरहद के संचालक संजय नाहर।

पुणे में कश्मीर और दूसरे प्रदेशों के युवाओं के साथ एनजीओ सरहद के संचालक संजय नाहर।

वे देश को देखने और समझने निकले थे। जल्द ही उनकी समझ में आ गया कि जितना दिखाई देता है, उससे कहीं ज्यादा बड़ा यह देश है। सबसे अहम बात थी कि देश के प्रति उनका दृष्टिकोण अब कुछ कर गुजरने का था। कश्मीर की उस यात्रा ने उनके मन में एक ऐसी संस्था के बीज बोए जोकि उन जरूरतमंद बच्चों की मदद करेगी जोकि हिंसा से पीड़ित और प्रभावित हैं। ऐसे बच्चों के लिए जरूरी था कि उन्हें शिक्षा और रोजगार के साधन मिलें ताकि उनका जीवन सही राह पर चले। और आज से 16 साल पहले सुषमा और संजय नाहर ने सरहद नाम से एनजीओ की स्थापना की।
संजय कहते हैं, यह आसान नहीं था। कश्मीर में रह रहे लोगों को यह विश्वास दिलाना आसान नहीं था कि पुणे में उनके पास रह रहे बच्चे सकुशल और आगे बढ़ रहे हैं। हम इन बच्चों को लेकर शहर के प्रतिष्ठित संस्थानाें में गए। हालांकि उनकी बैकग्राउंड काे देखते हुए काफी स्कूलों ने उन्हें प्रवेश देने से इनकार कर दिया। इसके बाद हमने तय किया हम अपना खुद का स्कूल संचालित करेंगे। इसके पश्चात हमने अपना कॉलेज भी शुरू किया। इन संस्थानों के लिए हमने अपने स्थानीय स्टूडेंट‍्स से फीस के जरिये संसाधन जुटाए, ये बच्चे हमारी ताकत हैं।
संजय बताते हैं कि वर्ष 1990 में उन्होंने आतंकवाद प्रभावित कश्मीर में काम शुरू किया था। उस समय वे 25 वर्ष के थे। उन्होंने पाया कि घाटी में अशिक्षा, अविश्वास, बेरोजगारी लोगों को हिंसा की तरफ ले जाकर हथियार उठाने को मजबूर कर रही है। उन्ाके मुताबिक जिस समय वे आतंकवाद प्रभावित पंजाब में काम कर रहे थे, तब वहां सीनियर आईपीएस एसएस विर्क ने कहा था कि घाटी में आतंकवाद पुरजोर हो रहा है और वहां ऐसे मजबूत इरादों के जवानों की जरूरत है जोकि लोगों को गलत दिशा में बढ़ने से रोक सकें। इसके बाद मैंने कश्मीर का रूख किया।
नाहर याद करते हैं, हमारे एनजीओ का नाम सरहद है। जिस समय घाटी में मैंने लोगों से कहना शुरू किया कि वे अपने बच्चों को उनके एनजीओ में भेजें तो वे सरहद नाम सुनकर भी हिचकते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि हम उन्हें सरहद यानी बॉर्डर पर भेज रहे हैं। हालांकि उनके लगातार आग्रह के बावजूद वे परिवार इसके लिए तैयार हुए। संजय के मुताबिक एनजीओ के लिए वे कोई सरकारी मदद नहीं लेते हैं, उनके स्कूल और कॉलेज बच्चों की ओर से दी गई फीस से संचालित होते हैं।
और ऐसे बदल गई जिंदगी

जाहिद भट‍और जावेद वानी।

जाहिद भट‍और जावेद वानी।

लॉ के स्टूडेंट जाहिद भट‍्ट बताते हैं, मैं वर्ष 2004 में पुणे आया था, मुझे देश के संबंध में कोई जानकारी नहीं थी, मुझे िसर्फ यह पता था कि कश्मीर के गांव-देहात में लोग कैसे रहते हैं। जिस समय मैं पुणे आया, तब मुझे पता लगा कि देश होना क्या होता है, और कश्मीर से बाहर लोग कैसे रहते हैं। इस समय घाटी में जो हालात हैं, उनको देखते हुए मैं कश्मीरी युवाओं से कहना चाहता हूं कि वे देश के दूसरे हिस्सों में आएं और देखें कि बदलाव क्या होता है।
वहीं अंग्रेजी में पोस्टग्रेजुएट जावेद वानी कहते हैं, मैं अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद घाटी में लौटना चाहता हूं, मैं वहां लोगों के भले के लिए काम करना चाहता हूं। घाटी की इस बदहाली के लिए उद्याेग-धंधों का अभाव बड़ी वजह है। बॉर्डर पार के कुछ स्वार्थी लोग घाटी में हमारे लोगों को बहकाते हैं।
एनजीओ के तहत फिजियोथेरेपिस्ट की ट्रेनिंग ले रहे मुख्तार कहते हैं, दिलों से घृणा को खत्म करना इतना आसान नहीं है। मेरी खुद की फैमिली भ्ाी उन लोगों के प्रभाव में है। वे कहते हैं- इंडियंस तुम लोगों को बदल देंगे। लेकिन मैं उन्हें आश्वस्त करता हूं कि यह सब गलत है। यहां हमें बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है।
वहीं 4 साल की उम्र में पुणे आई 17 साल की चिर्पी नसरीन कहती है, भारत-पाकिस्तान के कि्रकेट मैच के वक्त ही हमें ख्ाीज होती है, वरना यहां हम सब एक तरह से सोचते हैं। कश्मीर में लोगों की सोच तंग है। यहां पुणे में हमारी आई (सुषमा) हमें अपने बच्चों की तरह प्यार करती हैं, हम स्कूल में कार्यक्रम के दौरान उनकी साड़ी पहन लेते हैं, हमारे पास गणपति, कुरान, बुद्धा है। साथ-साथ बैठे वे भी कभी नहीं लड़ते। यही हमारा घर है। आसाम से जब बोडो बच्चे यहां आए तब वे बातचीत कर पाने में नाकाम रहते थे लेकिन कश्मीरी बच्चों ने उनकी जिम्मेदारी ले ली और अब वे सब मिलजुल कर रहते हैं।
घाटी में पत्थर फेंक कर कमाई करने को मजबूर युवा
तुफैल भट‍्ट बीकॉम फाइनल ईयर के स्टूडेंट हैं, कहते हैं- घाटी में कुछ ही लोगों के पास पैसा है, और जिनके पास पैसा है वे दूसरों से अपने अनुसार काम कराते हैं। उनके अनुसार घाटी में सेना और पुलिस के ऊपर पत्थर फेंकने वाले युवा ऐसा करके कमाई करते हैं। उनसे पत्थर फेंकवाए जाते हैं, बेरोजगारी के चलते इसके अलावा उनके पास कोई और आय का जरिया भी नहीं होता। ऐसे में वे युवा पकड़े जाते हैं, घायल हो जाते हैं, या फिर मारे जाते हैं, लेकिन असल दोषी सुरक्षित बने रहते हैं। घाटी से आई लड़कियां भी इस बात को मानती हैं और चाहती हैं कि वहां रोजगार के साधन उपलब्ध कराए जाएं।
 वंदना शुक्ला, पुणे


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